Wednesday, March 18, 2026
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नगर निगम में भ्रष्टाचार पर ‘ममता’ की छांव

  • नगर निगम के सभी भ्रष्टाचारों की एक ही अफसर को जांच
  • डेढ़ साल में एक भी जांच पूरी नहीं कर सकीं अपर नगरायुक्त

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके नगर निगम में एक गबन रुकता नहीं कि दूसरा शुरू हो जाता है। सबसे कमाल की बात तो यह है कि सभी भ्रष्टाचारों की अंदरूनी जांच का जिम्मा एक ऐसे अधिकारी के सुपुर्द किया जाता है, जिसकी खुद की कर्तव्यनिष्ठा संदिग्ध है, लेकिन आला अफसर का कृपा पात्र होने की वजह से इसी अधिकारी के पास तमाम भ्रष्टाचारों की जांचें सौंपी जाती हैं। डेढ साल से अधिक की अवधि में इस अधिकारी को सौंपी गई एक भी मामले की तह तक पहुंचना गवारा नहीं किया गया है।

नगर निगम में इन दिनों इतने भ्रष्टाचार हो रहे हैं कि कोई भी अनुभाग इससे अछृूता नहीं है। यहां जलकल अनुभाग, स्वास्थ्य अनुभाग, हाउस टैक्स अनुभाग, स्टोर अनुभाग, मार्ग प्रकाश अनुभाग, लेखा अनुभाग मुख्य हैं। हर विभाग में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। इन अनुभागों में प्रभारी की नियुक्ति भी होती है, लेकिन जब नीचे से लेकर ऊपर स्तर तक कायदे-कानूनों को तिलांजलि देकर सिर्फ अपने ही स्वार्थ की पूर्ति करने की कोशिश की जायेगी तो फिर जितनी मर्जी हो, गबन कर लो। कोई रोकने और टोकने वाला नहीं होगा।

सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि यदि निचले स्तर पर कोई भ्रष्टाचार होता है तो इस गबन से प्रभावित होने वाले लोग अधिकारी के पास इस उम्मीद में पहुंचते है कि वह इंसाफ करेंगे, लेकिन शिकायतकर्ता यह भूल जाता है कि जब उच्च स्तर पर बैठा अधिकारी ही भ्रष्टाचारियों को शरण देगा तो फिर कितना भी हो हल्ला करते रहें, कोई सुनवाई नहीं होगी। ऐसे ही भ्रष्टाचारियों को शरण देने में इन दिनों नगर निगम में अपर नगर आयुक्त के पद पर नियुक्त अधिकारी ममता मालवीय हैं।

नगर आयुक्त के सबसे करीबी अधिकारियों में शुमार ममता मालवीय नगर आयुक्त की इतनी विश्वासपात्र अधिकारी हैं कि यहां भ्रष्टाचार के सभी मामलों की जांच सिर्फ इनको ही सौंपी जाती है। क्योंकि जनता के बीच यह मैसेज जाना है कि जांच चल रही है, जबकि ममता मालवीय को जांच सुपुर्द करने का मकसद सिर्फ भ्रष्टाचार को दबाना ही है। आइये ममता मालवीय के समय में नगर निगम में हुए भ्रष्टाचार के कुछ मामलों की हकीकत का जायजा लेते हैं।

हाउस टैक्स में चल रहा है सबसे बड़ा गबन

नगर निगम में सबस बड़ा गबन हाउस टैक्स अनुभाग में चल रहा है। इस अनुभाग में एंटी करेप्शन की टीम ने तीन माह पूर्व नगर निगम मुख्यालय जोन में छापा मारकर मेरठ के व्यापारी सुधांशु महाराज के हाउस टैक्स का बिल कम करने के नाम पर डेढ लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए दो बाबुओं को रंगे हाथों पकड़ा था। टीम इन दोनों बाबुओं को पकड़कर अपने साथ ले गई थी। थाना देहली गेट में लिखा-पढ़ी की गई। ऐसे ही गंगा नगर में भी एक बाबू को हाउस टैक्स कम करने के नाम पर रिश्वत लेते हुए एंटी करेप्शन की टीम ने रंगे हाथों पकड़ा था।

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नगर निगम मुख्यालय जोन में तो हाउस टैक्स अनुभाग में कई बार एंटी करेप्शन टीम रिश्वत लेने वालों को रंगे हाथ पकड़ चुकी है। महापौर हरिकांत अहलूवालिया के इसी वर्ष फरवरी माह में हाउस टैक्स में दो कर्मचारियों के रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने के प्रकरण पर नाराजगी जताते हुए पूछताछ करने पर नगर आयुक्त ने इस भ्रष्टाचार की जांच अपर नगर आयुक्त ममता मालवीय के सुपुर्द कर दी।

ममता मालवीय को जांच सौंपने के पीछे मंशा यह ही होती है कि इस प्रकरण को ठंडे बस्ते में डाल देना है। लिहाजा होता भी ऐसा ही है। जांच के आदेश देते हुए महापौर को जो पत्र भेजा गया था, उसमें कहा गया था कि हाउस टैक्स में रंगे हाथ रिश्वत लेने के प्रकरण की जांच अपर नगर आयुक्त के सुपुर्द की गई है तथा एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई की जायेगी, लेकिन तीन माह निपटने के बाद भी यह एक सप्ताह अब तक पूरा नहीं हो सका है।

भ्रष्टाचार की सड़क भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी

गंगानगर ए ब्लॉक में सड़क निर्माण का कार्य ठेकेदार आकाश गुप्ता की सन शाइन फर्म के पास है। ठेकेदार ने रोड का निर्माण कार्य करवा दिया। सुबह लोगों ने देखा कि सड़क में प्रयोग होने वाली निर्माण सामग्री की गुणवत्ता खराब है। सड़क की चौड़ाई भी कम कर दी। शाम को प्रोफेसर अभिषेक डबास, अशोक चौधरी, मोहित मलिक, सुधीर मावी, रामेंद्र सिंह आदि स्थानीय लोगों ने हंगामा कर दिया। उन्होंने सड़क की परत को हाथ से हटा दिया।

उन्होंने साफ कहा कि इस तरह से हम सड़क नहीं बनने देंगे। सभी लोग इकट्ठा होकर कुछ दूरी पर स्थित महापौर हरिकांत अहलूवालिया के आवास पर गए, परंतु वह नहीं मिले। लोगों ने कहा कि इस मामले में जिलाधिकारी से शिकायत की गई। जब क्षेत्र वासियों ने इसकी शिकायत पार्षद दीपिका शर्मा से की तो उन्होंने सड़क को दोबारा बनवाने का आश्वासन दिया। इस मामले की पार्षद के माध्यम से नगर आयुक्त को शिकायत की गई। नगर आयुक्त को इस मामले में ठेकेदार का ही पक्ष लेना था,

लेकिन जनता को भी यह दिखाना था कि हम ईमानदार हैं। लिहाजा उन्होंने अपने ठेकेदार को बचाने के लिए इस मामले की जांच भी अपनी चहेती अपर नगर आयुक्त ममता मालवीय के ही सुपुर्द की। हमेशा की तरह ममता मालवी इस मामले को भी ठंडे बस्ते के हवाले करके चुप्पी साधकर बैठ गई हैं।

शासन तक पहुंच चुकी है ममता के भ्रष्टाचार की शिकायत

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अपर नगर आयुक्त ममता मालवीय जब से मेरठ नगर निगम में आई हैं, तब से वह नगर आयुक्त की कृपा पात्र होने के साथ-साथ नगर निगम के भ्रष्टाचारी बाबुओं का भी खुलकर बचाव करती हैं। ममता मालवीय के पास इस समय जलकल अनुभाग का जिम्मा है। जमीन से नीचे कितना नीचे बोरिंग है। पाइप किस क्वालिटी का डलता है। पाइप कितना नीचे खुदाई करके दबाया गया है। नगर निगम में सबसे ज्यादा गबन जलकल अनुभाग में होने के ही चांस होते हैं। क्योंकि सब कुछ जमीन के नीचे दबा होता है। अगर किसी प्रकरण की जांच होगी भी तो उपर स्तर से ही होगी।

आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में अपर नगर आयुक्त ममता मालवीय की शासन स्तर पर भी शिकायत की गई है। शासन स्तर पर भी इस मामले को गंभीर मानते हुए गोपनीय स्तर पर इसकी तहकीकात की जा रही है। जांच इस मुद्दे पर भी चल रही है कि नगर निगम के सभी भ्रष्टाचारों की एक ही अफसर को जांच आखिर क्यों और किन हालातों में सौंपी जाती है। जाहिर है कि कहीं न कहीं बड़े स्तर पर घोटाला हो रहा है।

23 फर्जी कर्मचारियों की नहीं हो सकी जांच

नगर निगम में एक बड़ा महाघोटाला 23 कर्मचारियों की फर्जी नियुक्ति से जुड़ा हुआ है। इसमें पद न होने के बावजूद भी फर्जी तरीके से बंदरबांट करते हुए कर्मचारियों को अलग-अलग पदों पर भर्ती कर लिया गया। कमाल की बात तो यह है कि इन सभी फर्जी तरीके से भर्ती हुए कर्मचारियों की समय-समय पर पदोन्नति व वेतन वृद्धि भी होती रही। इस मामले में नगर निगम में तैनात रहे एक नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने जब चार्ज लिया तब उनके सामने भी यह मामला आया कि फर्जी तरीके से कर्मचारियों की भर्ती करके उनको अलग-अलग अनुभागों में भेज दिया गया है।

यह नगर स्वास्थ्य अधिकारी अपने कार्यकाल में सबूत जुटाते रहे। रिटायर होने के बाद इन अधिकारी ने सबूतों के साथ शासन को शिकायत का पुलिंदा भेजा। इसमें इतनी बारीकी से यह भी उल्लेख किया गया था कि कौन सा कर्मचारी इस समय किस पद पर और किस जगह कार्यरत है। इस शिकायत पर शासन ने सख्त रूख अपनाया। शासन का पत्र मिलने के बाद मंडलायुक्त ने इस मामले में नगर आयुक्त से जवाब तलब किया।

मंडलायुक्त को गुमराह करते हुए नगर आयुक्त ने इस मामले की जांच ममता मालवीय के सुपुर्द करके इसको ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसी वर्ष फरवरी में हुई नगर निगम कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा पार्षद ने यह मुद्दा उठाकर ममता मालवीय से पूछा कि आपको 23 फर्जी कर्मचारियों की जांच सौंपी गई थी तो नगर आयुक्त ने कह दिया कि शासन की जांच चल रही है। इसलिए हमारी जांच का कोई औचित्य नहीं?

डंपर खरीद में साढ़े चार करोड़ का गबन

नगर निगम में डंपर खरीद का मामला इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में है। अशोक लीलेण्ड के डंपरों के स्थान पर महेन्द्रा के दस डंपरों की चोरी छिपे सप्लाई ले ली गई है। गत वर्ष सितंबर 2023 में अशोक लीलेण्ड डंपरों की खरीद का वर्क आॅर्डर जारी किया गया, लेकिन अशोक लीलेण्ड कंपनी से नगर निगम के अधिकारियों को मनमुताबिक कमीशन नहीं मिल रहा था। इसलिए महेन्द्रा कंपनी के डंपर मंगवा लिये गये। डंपर नगर निगम पहुंच भी गये।

फिर जब पोल खुली तो इन सभी डंपरों को दिल्ली रोड डिपो के सरस्वती लोक स्थित ज्वाइंट डिपो में खड़ा करने के लिए भेज दिया गया। साफ साबित है कि अधिकारियों ने खुद इस महालूट को छुपाने के लिए पूरा कुचक्र रचा है। और ठेकेदार को कसूरवार ठहराकर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि वह पाक साफ हैं। जबकि हकीकत में इस खरीद से जुड़े, वर्क आॅर्डर रिलीज करने वाले तथा भौतिक सत्यापन करने वाले सभी अधिकारी इसमें पूरी तरह शामिल हैं। उधर शासन ने भी इस मामले में सख्त रूख अपनाया।

मामले की शिकायत मिलने के बाद मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद ने नगर आयुक्त को नोटिस जारी किया है। इसमें नगर आयुक्त से शिकायत संदर्भ संख्या-12138240042235 के बारे में पूछा गया है कि वाहनों की आर्डर के विपरीत खरीद क्यों की गई है? तथा इसमें वर्तमान में क्या स्थिति है। पूरे पांच महीने तक नगर निगम मुखिया इस घोटाले को दबाये रहे। लेकिन जब शासन स्तर पर पूछताछ शुरू हुई

तो मामले की जांच अपर नगर आयुक्त के सुपुर्द की गई। यह जांच अभी तक ठंडे बस्ते में ही पड़ी है। उधर शासन को एक अलग पत्र प्रभारी नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा.हरपाल सिंह की तरफ से भेजकर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गई है कि जांच चल रही है। हकीकत यह है कि मामला ठंडा होने का इंतजार किया जा रहा है।

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