Wednesday, March 18, 2026
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साहब, मैं और बकरी

 

Ravivani 15


Mukesh Rathorइससे पहले कि साहब की बारह बजे, मैंने फटाफट एक सेल्फी लेकर भेजी। आॅफलाइन होकर बेडलाइन होता इससे पहले ही साहब का फिर मैसेज आया। प्रेषित फोटो की ओर इशारा करते हुए लिखा-ये क्या है? फोटो में तो सिर्फ ब्लैकआउट पसरा है। मैंने कहा, सर अंधेरे की वजह से फोटो बिगड़ गई होगी।
साहब किसी भी महकमे के हों ‘उपस्थिति पंजी’ के दायरे से बाहर होते हैं। माने ‘जहां खड़े हों, लाइन वहीं से शुरू’ टाइप। साहबों का काम आदेश देना हैं। वे हमेशा घोड़े पर बैठे होते हैं। उनका हर आदेश ‘अत्यावश्यक’ होता है। एक बार ‘चुनाव अत्यावश्यक’ की टीप लगा आदेश मिले तो समझ भी आता है, क्योंकि सब जानते हैं चुनाव से ज्यादा जरूरी कोई काम है, लेकिन साहब मातहतों को बुल्गारिया में मरी बकरी के लिए श्रद्धांजलि सभा रखने का आदेश भी अत्यावश्यक बताकर तामील करवाएं तो पूछने का मन करता है कि इतनी ‘अति’ आवश्यक है क्या?
बहरहाल, ग्रीष्मावकाश के दौरान एक रात साहब का व्हाट्सएप पर आदेश आया कि लगातार बढ़ते तापमान को देखते हुए ऊपर से पौधारोपण का निर्णय लिया गया है, सो आप अपने कार्यालय परिसर में आज ही पौधारोपण कर तत्काल फोटो वाट्सएप करें। याद रहे रात बारह बजे तक जानकारी आॅनलाईन करनी है। ऊपर मेरी बात खराब नहीं होनी चाहिए। माने इहलोक से ज्यादा परलोक की चिंता। मैंने मोबाइल देखा तो रात के दस बज चुके थे। बिजली भी गुल। कुछ समझ नहीं आ रहा था। इस बीच साहब का दूसरा मैसेज आ धमका कि ‘क्या हुआ?’ मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था। एक तरफ अंधेरी रात, दूसरी तरफ साहब की बात।

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इससे पहले कि साहब की बारह बजे, मैंने फटाफट एक सेल्फी लेकर भेजी। आॅफलाइन होकर बेडलाइन होता इससे पहले ही साहब का फिर मैसेज आया। प्रेषित फोटो की ओर इशारा करते हुए लिखा-ये क्या है? फोटो में तो सिर्फ ब्लैकआउट पसरा है। मैंने कहा, सर अंधेरे की वजह से फोटो बिगड़ गई होगी। यह जानते हुए भी कि काम भले बिगड़ जाए फोटू नहीं बिगड़ना चाहिए। लेकिन करता भी क्या? साहब बोले-कल आकर देखता हूं

अब मेरी नींद उड़ गई। क्यों न उड़ती? साहब जब देखने की खुली चुनौती दें, तो नींद उड़ना लाजिमी है। अगले दिन मैं बमुश्किल दफ्तर पहुंचा और साहब मौका मुआयना करने आ पड़े। नियमानुसार मैंने जलपान का पूछा लेकिन साहब के

दिमाग पर पौधे सवार थे।
साहब:दिखाओ पौधारोपण?
मैं: साहब अंधेरा था,सो याद नहीं आ रहा।
साहब: कार्यालय परिसर में ही लगाए थे या घर?
मैं: साहब, कहीं तो लगाएं थे।

साहब: पौधारोपण अभियान का मखौल उड़ाने और भ्रामक जानकारी देने के लिए मैं तुम्हारी निलंबन कार्रवाही प्रस्तावित कर ऊपर भिजवाता हूं। मजाक बनाकर रखा है…साहब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। मैं डर गया। लेकिन कहते हैं डर के आगे जीत है। उनकी बातों और दांतों से लगा कि वे पान-गुटखा खाते होंगे।
मैं: साहब, जल नहीं तो ‘पान’ तो लीजिए?

साहब: (नरम पड़े) पान में हाथ लाल हो सकते हैं। गुटखा ले लेंगे। गाड़ी में रखवा दो।

मैंने सेवा-सुरक्षा के भाव से ‘डबल पन्नी वाला गुटखा’ गाड़ी में रखा। साहब गुटखा चबाने लगे। अब वे सुनने और मैं बोलने की स्थिति में आ गया। गुटखा खाने के बाद आदमी का मुंह बंद हो जाता है, जबकि दारू पीने के बाद खुल जाता है। हालांकि मैंने दारू नहीं पी थी।

मैं: साहब, वो देखो बकरी। हम बरसों से पौधें लगा रहे हैं और ये कम्बख़्त खा रही है। निलंबित करना है तो इसे कीजिए।
साहब: मुझे भी ऐसा ही लगता है। एक काम करो स्पष्टीकरण के साथ इसका फोटो लगा देना। पौधे डकारने में इसी का मुंह है।
साहब (जाते-जाते): और हां जब ‘राशि उपयोगिता प्रमाणपत्र’ देने आओ तो बड़े साहब का गुटखा भी लेते आना। वे भी खाते हैं।

अपनी शिकायत हो जाने से बेखबर बकरी खाली मुंह हिला रही थी। साहब गुटखा खा रहे थे। …मेरा गुटखा खाना अभी बाकी था। न भी खाऊं तो मजबूरी हैे|

मुकेश राठौर


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