Tuesday, May 19, 2026
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ताकि मनरेगा में पारदर्शिता आए

 

Nazariya 6


Zahid Khan 1मनरेगा को भ्रष्टाचार से बचाने और योजना में सरकारी धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए विशेष बंदोबस्त किए गए हैं। योजना की संरचना में ही पर्यवेक्षण और निरीक्षण का खास खयाल रखा गया है। इसके लिए फील्ड में जाकर जमीनी हकीकत की जांच-पड़ताल, मस्टररोल का सार्वजनिक निरीक्षण, योजना के अंतर्गत पूरे किए जा चुके एवं चल रहे कामों को नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित एवं प्रचारित करना और सामाजिक अंकेक्षण पर विशेष जोर दिया गया है। मस्टररोल को सार्वजनिक करने की व्यवस्था इसलिए की गई है, ताकि भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सके। लेकिन इसका हर जगह पालन नहीं हो रहा है। यही नहीं मनरेगा के कार्यों की निगरानी के लिए हर जिले में लोकपाल की नियुक्ति का भी प्रावधान है, केंद्र सरकार के बार-बार आदेश-निर्देश के बाद भी ज्यादातर जिलों में लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई है। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने इसको लेकर अब सख़्त रवैया अपनाने का निर्णय लिया है।

अगले वित्तीय वर्ष से केंद्र सरकार महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत उन राज्यों को राशि आवंटित नहीं करेगी, जो कम से कम 80 फीसदी जिलों में मनरेगा लोकपाल नियुक्त नहीं कर सके हैं। यह एक न्यूनतम सीमा है, जिसे राज्यों को व्यवहार में लाना ही होगा। इसके साथ ही सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लोकपाल ऐप का उपयोग करने की भी अपेक्षा की गई है। ताकि मनरेगा को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए। योजना में भ्रष्टाचार की शिकायतें दूर करने के लिए यह जरूरी भी है।

गौरतलब है कि मनरेगा का उद्देश्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की आजीविका सुरक्षा को बढ़ाने के लिए एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी प्रदान करना है। मनरेगा पहले चरण में दो फरवरी, 2006 से देश के सबसे पिछड़े 200 जिलों में लागू हुई थी। बाद में इसे एक अप्रैल, 2007 और 15 मई, 2007 से क्रमश: अतिरिक्त 113 और 17 जिलों तक बढ़ा दिया गया था। बाकी जिलों को एक अप्रैल, 2008 से कानून के तहत शामिल किया गया था। फिलहाल देश के लगभग सभी ग्रामीण जिले इस कानून के अंतर्गत आते हैं। योजना का व्यापक असर हमारे गांवों पर हुआ।

लोगों को अपने ही गांव में एक निश्चित रोजगार मिला। लेकिन जैसा कि हर अच्छी योजना के साथ होता है, मनरेगा में भी भ्रष्टाचार घर कर गया। नकली जॉबकार्ड्स से लेकर फर्जी मस्टररोल्स बनाने के मामले आये दिन सामने आते रहते हैं। जिन लोगों की जिम्मेदारी इस योजना को जमीन पर अमलीजामा पहनाने की है, वही इसमें भ्रष्टाचार कर रहे हैं। यह लोग फर्जी जॉबकार्ड बनाकर, मस्टररोल एवं डेली अटेंडेंस रजिस्टर में फर्जी एंट्री करते हैं और सरकारी पैसे की आपस में बंदरबांट कर लेते हैं। कई इलाकों से सरकारी अधिकारियों द्वारा मजदूरों की मजदूरी का एक हिस्सा कमीशन के रूप में काट लेने की बात भी सामने आती रहती है। कहने को मनरेगा में भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल की नियुक्ति का प्रावधान है, लेकिन अफसोस इसका कहीं पालन नहीं हो रहा है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अनुसार, राज्यों को केंद्रिय ग्रामीण विकास मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार शिकायतें प्राप्त करने, पूछताछ करने और राशि पारित करने के लिए प्रत्येक जिले के लिए एक लोकपाल नियुक्त करना अनिवार्य है, जो कि रोजगार गारंटी कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए नोडल मंत्रालय है। जाहिर है कि आदर्श रूप में राज्यों को मनरेगा के तहत अपने सभी जिलों में लोकपाल नियुक्त करना चाहिए।

बेरोजगारों को रोजगार प्रदान करने वाली इस महत्वपूर्ण योजना के प्रति राज्य सरकारों की लापरवाही कहिए या फिर उदासीनता, उन्होंने अपने यहां अधिकांश जिलों में लोकपाल नियुक्त नहीं किए हैं। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के ही आंकड़ों के मुताबिक भाजपा शासित गुजरात, अरुणाचल प्रदेश और गोवा, टीआरएस शासित तेलंगाना और केंद्र शासित प्रदेशों-पुदुचेरी, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप और दादर एवं नागर हवेली में मनरेगा के लिए एक भी लोकपाल नहीं है। इसी तरह कांग्रेस शासित राजस्थान की तरह कई राज्य हैं, जहां बहुत कम जिलों में लोकपाल नियुक्त किए गए हैं।

तृणमूल कांग्रेस शासित पश्चिम बंगाल में योजना के अंतर्गत आने वाले 23 में से केवल चार जिलों में लोकपाल नियुक्त किए गए हैं। मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा-पंजाब में योजना के तहत 22-22 जिले हैं, लेकिन हरियाणा में केवल चार और पंजाब में सात जिलों में लोकपाल हैं। मनरेगा में पारदर्शिता रहे और किसी तरह का भ्रष्टाचार न हो, इसके लिए मनरेगा कानून में लोकपाल और सोशल आॅडिट का प्रावधान किया गया था। लोकपाल का काम पूरी तरह से मनरेगा के कार्यों में पारदर्शिता लाना और निगरानी तंत्र को मजबूत करना है। लोकपाल का काम न सिर्फ़ योजनाओं की मॉनीटरिंग करना है, बल्कि इससे जुड़ी शिकायतों का तत्काल समाधान करना भी है।

लेकिन राज्य सरकारें इनके प्रति कतई गंभीर नहीं हैं। सरकारें न तो लोकपाल की नियुक्ति करना चाहती हैं और न ही उनका इरादा सोशल आॅडिट यूनिट की स्थापना करना है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त कार्यालय में दर्ज शिकायतों का बोझ बढ़ता जा रहा है। लेकिन न तो जांच हो पा रही है, और न ही उन पर कोई कार्रवाई। कोविड महामारी के बाद मनरेगा जिस तरह से रोजगार का सबसे बड़ा जरिया बन कर सामने आई है। ऐसे समय में यह जरूरी है कि मनरेगा के कार्यों में पूरी तरह से पारदर्शिता बरती जाए और इसमें कोई गड़बड़ी न हो। ताकि जो लोग जरूरतमंद हों, उन्हें ही काम और अपनी मेहनत का वाजिब मेहनताना मिले।

जाहिद खान


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