Monday, March 16, 2026
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गंगा दशहरे पर बन रहा खास संयोग

  • इस दिन धरती पर गंगा का हुआ था अवतरण
  • इस दिन गंगा स्नान और दान करने से दूर हो जाते हैं सभी कष्ट

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष के दिन पवित्र नदी गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। इस वर्ष गंगा दशहरा नौ जून को मनाया जाएगा। गंगा दशहरे पर इस वर्ष रवि योग बन रहा है। जिसमें दान और पुण्य करने का चौगुना लाभ मिलेगा। हिंदू धर्म में गंगा दशहरे का काफी महत्व है। इस दिन गंगा स्नान करने के साथ ही दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

हिंदू कैलेंडर के मुताबिक ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरे का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि राजा भागीरथ के पूर्वजों का उद्धार करने के लिए गंगा दशहरे के दिन मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। इस दिन गंगा स्नान करने से हर पाप से मुक्ति मिलने के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है।

गंगा के धरती पर अवतरित होने की कथा

मान्यता है कि अयोध्या में एक चक्रवर्ती सम्राट महाराजा सगर रहते थे उनके 60 हजार पुत्र थे। एक बार उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया। इंद्र ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में छिपा दिया। उनके ऐसा करने से अश्वमेध यज्ञ में रुकावट आ गई। महाराजा सगर के 60 हजार पुत्रों ने मिलकर यज्ञ को पूरा करने के लिए आश्रम में घोड़े को ढूंढना शुरू किया ढूंढते ढूंढते हुए महर्षि कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे।

जिस वक्त वह उस आश्रम में पहुंचे उस वक्त महर्षि कपिल अपने ध्यान में थे। 60 हजार पुत्रों में जब घोड़े को बंधा देखा तो उन्होंने महर्षि कपिल होने को चोर समझ लिया और वहां जोर-जोर से चिल्लाने लगे उनके चिल्लाने पर महर्षि कपिल मुनि का ध्यान भंग हुआ और उन्हें क्रोध आने लगा। उनके क्रोध से 60 हजार पुत्र भस्म हो गए और महाराजा सगर का अश्वमेध यज्ञ खंडित हो गया।

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उसके बाद सगर ने अपने पुत्रों की आत्मा की शांति के लिए मां गंगा को धरती पर लाने का प्रयास किया उस समय अगस्त ऋषि पृथ्वी का सारा पानी पी लिया जिसकी वजह से धरती में सूखा पड़ गया और पानी की एक बूंद ना बची। महाराजा सगर के साथ-साथ अंशुमान और महाराजा दिलीप ने भी कठोर परिश्रम किया, जिससे मां गंगा धरती पर अवतरित हो सकें, लेकिन उनके सारे प्रयास व्यर्थ गए।

अंत में महाराजा दिलीप के पुत्र भगीरथ ने ब्रह्मा की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और मां गंगा को उनके कमंडल से मुक्त किया। मां गंगा के प्रबल वेग प्रवाह को रोकने के लिए भगीरथ ने भगवान शिव की शरण ली और उनकी शिखाओं में मां गंगा को स्थान दिया तब एक शिखा से मां गंगा धरती पर प्रभावित हुई। इस प्रकार महाराजा सगर के 60 हजार पुत्रों का तर्पण किया गया और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

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