Friday, December 9, 2022
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कहानियों की अपनी जुबान होती है !

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हाल ही में सुरेश सलिल द्वारा अनुदित और संपादित पुस्तक ‘अपनी जुबान में ’(संभावना प्रकाशन, हापुड़) पढ़ी। इस संग्रह में विश्व की विभिन्न भाषाओं के प्रतिनिधि कथाकारों की कहानियां हैं। लीबिया, सूडान, मिस्र, सीरिया, ईरान, हंगरी, रूसी, जर्मन, स्पेनिश, यिद्दिश, जापानी और बर्मा की कहानियों के अतिरिक्त इस संग्रह में बोडो (असम की जनजातीय भाषा) और बांग्ला की भी कहानियां हैं। इस संग्रह को पढ़ने से पहले सुरेश सलिल पर कुछ बात। सुरेश सलिल की पहली कविता 1956 में प्रकाशित हुई। उनकी सक्रियता को साढ़े छह दशत बीत चुके हैं। इस दौरान उन्होंने कविताएं लिखीं, शायरी की और बहुत सी विदेशी कविताओं के अनुवाद हिन्दी पाठकों के लिए किए। इस सारी सक्रियता के बावजूद उनके मिजाज में कहीं कोई शोर- शराबा या दिखावा नहीं है। वह बेहद खामोशी, प्रतिबद्धता और गंभीरता से अपने काम में लगे हैं। कहानियों का यह संग्रह भी उनके तीन-चार दशक की मेहनत का परिणाम है। समय-समय पर उन्होंने कहानियों का अनुवाद किया। ये कहानियां अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। लेकिन अनुवाद करते समय सलिल के जहन में यह बात नहीं रही होगी कि कभी इनका कोई संग्रह भी प्रकाशित हो सकता है। लेकिन अब जब यह संग्रह प्रकाशित हो गया है, तो इसपर बात करना नितांत जरूरी हो जाता है।

संग्रह की 27 कहानियों में पाठकों को स्त्री होने के दुख (बलात्कार), उसे उपभोग की वस्तु समझने की पीड़ा (खुदकुशी), स्त्री के जन्म के साथ शुरू होने वाली उपेक्षा (लड़की ही है), मृत्यु के बाद के डर (मरने के बाद), युद्ध की छायाएं (जंग के खतूत), स्त्री के बच्चे को गिराए जाने के अर्थ (गिरना), पुरुष के साथ होकर भी साथ न होने की पीड़ाएं (शिकारी), नागरिक जीवन से पलायन की सोच(नागरिक जीवन से पलायन), बच्चों की खुशी कैसे आपको भी जीवन देती है (संतरे), प्रेम की समृतियां (दिल ढले का प्रेम), हुकूमतों द्वारा आम लोगों पर किए जाने वाले अत्याचार(भूमिदान) और आम लोगों द्वारा आम लोगों का किया जा रहा शोषण (खजूर) जैसी कहानियां हैं। संग्रह में कुछ कहानियां फैंटेसी का स्पर्श करती हैं। काशान का फिन गार्डन, बच्चा और पीली चिड़िया, मैं और मेरा बिल्ला और पुनर्मिलन ऐसी ही कहानियां हैं।

अरबी (सीरिया) के लेखक जकरिया तामेर की कहानियों में व्यंग्य की चोट दिखाई देती है। उनकी कहानियों में राजनीतिक, सामाजिक समस्मयाएं और गरीबों के उत्पीड़न को दर्ज किया गया है। वह बच्चों की कहानियां भी लिखते हैं। संग्रह में एक कहानी है ‘खुदकुशी’। पति-पत्नी के रिश्तों की इस कहानी में पति निरंतर पत्नी को टीवी देखने, गाड़ी चलाने, फैशन पत्रिका देखने से इनकार करता है। वह कहता है, खुदा और पैगम्बर उस औरत से नफरत करते हैं, जो अपने खाविन्द की वाजिब जरूरतें पूरी नहीं करती।

शौहर की दिलजोई करना हर औरत का पहला फर्ज़ माना गया है मजहब में। पत्नी अपने आंसू पोंछती है और अपनी टांगें और जांघें पूरी तरह खोल देती है। उसे अहसास होता है कि वह एक बार फिर खुदकुशी की कोशिश कर रही है। ‘सदमा’ ऐसी कहानी है जिसमें अपने बच्चे की मौत का दुख उस वक्त महसूस होता है, जब दूसरा बच्चा उसके अपने बच्चे को याद करता है। ‘शर्मनाक जुर्म’ में व्यंग्यात्मक लहजे में यह दिखाया गया है कि हुकूमत के खिलाफ रैली में गिरफ्तार किए गए एक युवक के पिता को उस समय बड़ी राहत मिलती है, जब पता चलता है कि बेटा वास्तव में तवायफ के यहां से गिरफ्तार किया गया है।

अरबी (सूडान) कहानी ‘खजूर’ में एक बच्चे द्वारा अपने दादा द्वारा एक अन्य व्यक्ति की जमीनों पर कब्जे का विरोध बहुत प्रतीकात्मक अर्थों में दिखाया गया है। कहानियों में मानव जीवन के विभिन्न पहलु न हों तो कहानियों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। मैसेदोनी (मैसेदोनिया) के मिले नेदेल्कोस्की की कहानी ‘लावारिस’ मानवीय पक्ष को शिद्दत से चित्रित करती कहानी है। बूढ़े मियो को नदी में एक छोटी उम्र की बच्ची की लाश मिलती है। गांव के लोग इस बात की खोज में जुट जाते हैं कि बच्ची किसकी है।

उन्हें लगता है कि बच्ची दूसरे गांव से बहकर यहां आ गई है। दूसरे गांव के लोग भी उस बच्ची को अपना मानने से इनकार कर देते हैं। बूढ़ा मियो बराबर कहता है कि यह उसकी बच्ची है। लेकिन सब जानते हैं कि मियो के कोई बच्चा नहीं है। गांव के लोग बच्ची के शव को दफ्ना देते हैं और मियो नदी की रेत पर पड़ा सुबकियां भरता रहता है। इस कहानी में एक तरफ मियो की पीड़ा है, जो अपना बच्चा न होने की वजह से एक लावारिस बच्ची को अपना मानकर उसके दुख को महसूस करना चाहता तो और दूसरी तरफ सामाजिक नियम कायदे उस बच्ची को मियो को नहीं सौंपना चाहते।

कहानी जो दीख रहा है, उतनी ही नहीं होती, बल्कि लेखक को उसके परे जाकर देखना होता है। वही कहानियां कालजयी बनती हैं। तौफीक अल-हकीम अरबी (मिस्र) की एक बेहद खूबसूरत और बेहतरीन कहानी है ‘तरबूजों का मौसम’। कहानी में नायक एक बारबर के यहां शेव बनवाने जाता है। बारबर उस्तरे पर सान चढ़ाते हुए नायक से अपना दुख बताता है कि उसके खब्ती भाई को पगलखाने में बंद कर दिया गया है, क्या तुम उसे छुड़वाने में मेरी मदद कर सकते हो। भाई के के दिमाग में यह फितूर भर गया था कि सिर वास्तव में तरबूज है। वह व्यक्ति भी बारबर था। नायक डरा हुआ शेव बनवाता रहता है।

नायक शेव बनवाकर बाहर आ जाता है और सोचता है कि तरबूजों के मौसम में वह अपनी शेव खुद किया करेगा। सिर को तरबूज समझना एक फैंटेसी है, जो अचानक नहीं आई बल्कि इसके पीछे हुकूमत द्वारा किए गये या किए जा रहे शोषण से उपजी है। जो भी बारबर के यहां आता है, बारबर को लगता है उसका सिर एक तरबूज है और उसे काट देना चाहिए। संग्रह में ऋत्विक घटक की भी तीन कहानियां हैं-झंकार, प्रेम और मार। ये कहानियां किसी फिल्म के फ्रेम की तरह चलती हैं। एक अन्य बांग्ला कहानी है राजशेखर बसु की-पांसे की तीसरा खेल। राजशेखर बसु रवीन्द्रनाथ टैगोर के समवयस्क अग्रणी कथाकार माने जाते हैं। इस कहानी में युधिष्ठर द्वारा शकुनी-दुर्योधन से पांसे को दो दांव हारने के बाद राजशेखर बसु ने एक तीसरे पांसे की कल्पनी की है।

कहानियों की दरअसल अपनी जुबान होती है। दु:ख और पीड़ाओं को समझने और व्यक्त करनो वाली जुबान, प्रतिरोध की जुबान, शोषण के खिलाफ बोले जाने वाली जुबान, स्मृतियों की जुबान, स्त्री शोषण के विरुद्ध खड़ी जुबान, मानवीयता के पक्ष में खड़ी जुबान, जिजीविषा की जुबान…। सुरेश सलिल द्वारा संपादित और अनुदित यह संग्रह दरअसल यही बताता है कि कहानियों की इसी जुबान को समझना बहुत जरूरी है। यह संग्रह इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि अलग-अलग देशों की जुबानों से ऊपर है कहानी की जुबान।


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