अस्सी-नब्बे के दशक में बॉलीवुड में अन्याय और भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने, गरीबों के हक में लड़ने वाले और एक ही समय में दस-बीस गुंडों को ढेर करने वाले हीरोज का बोलबाला था। एंग्री यंग मैन वाला नायक मेनस्ट्रीम सिनेमा में खूब पॉपुलर हुआ और उसका दौर काफी लंबा भी चला। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी की ‘सूबेदार’ उसी तेवर की फिल्म है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि यहां ‘सूबेदार’ के रूप में एक एंग्री ओल्ड मैन है और मानना पड़ेगा कि अनिल कपूर जैसे काबिल अभिनेता ने अपने स्टाइल, स्वैग, आक्रोश और हीरोइज्म से इसे यादगार बनाया है।
कहानी रिटायर्ड आर्मी आफिसर सूबेदार अर्जुन मौर्य (अनिल कपूर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो वर्षों की सेवा के बाद अपनी बिखरी जिंदगी समेटने के लिए मध्य प्रदेश के एक अंदरूनी कस्बे में अपने घर लौटता है। उसकी कॉलेज जाने वाली बेटी श्यामा (राधिका मदान) अभी तक अपनी मां (खुशबू) की एक्सीडेंट में हुई मौत के सदमे से उबर नहीं पाई है। अर्जुन का दोस्त प्रभाकर (सौरभ शुक्ला), जो एक सुरक्षा एजेंसी चलाता है, उसे बॉडीगार्ड की नौकरी दिलाने के लिए इलाके के दबंग सॉफ्टी (फैसल मलिक) और प्रिंस भैया (आदित्य रावल) के पास ले जाता है। ये दोनों स्थानीय रेत माफिया से जुड़े हैं और पूरे इलाके में इनका आतंक है। इस नेटवर्क की असली सरगना बबली दीदी (मोना सिंह) है, जो दो हत्याओं के मामले में जेल में बंद होने के बावजूद वहीं से पूरे अवैध कारोबार को नियंत्रित कर रही है।
अर्जुन जल्द ही समझ जाता है कि इलाके में फैली अराजकता और सिस्टम की बदहाली के पीछे इस माफिया का भी बहुत बड़ा हाथ है। आम लोग इनके आतंक के साये में जीने को मजबूर हैं। उधर श्यामा भी अपने कॉलेज में गुंडागर्दी का सामना कर रही है। कहानी तब निर्णायक मोड़ लेती है, जब बिगड़ैल प्रिंस मस्ती में अर्जुन की जिप्सी कार को नुकसान पहुंचाता है और उस पर मूत्र कर देता है। यह वही जिप्सी है, जो उसकी पत्नी ने अपनी वर्षों की मेहनत की कमाई से खरीदी थी। यह अपमान अर्जुन को भीतर तक झकझोर देता है और वह रेत माफिया के इन दरिंदो के खिलाफ खुली जंग छेड़ देता है।
निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने अपनी फिल्म में उन तमाम मसालों का इस्तेमाल किया है, जिसके लिए मेनस्ट्रीम सिनेमा जाना जाता है, पर दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने इसे एक नए अंदाज में पेश किया है। हालांकि, समस्या वन लाइनर कहानी की है, जिसे ढाई घंटे की फिल्म का रूप दे दिया गया है। फिल्म का नायक अपने लिए लड़ता है, मगर वह लोकनायक के रूप में उतनी मजबूती से उभर कर सामने नहीं आ पाता। हालांकि, पिता-पुत्री के बीच के रिश्ते को निर्देशक ने काफी बारीकी से दशार्या है। फिल्म का फर्स्ट हाफ तेज-तर्रार है, मगर सेकंड हाफ में कहानी बिखर जाती है, जब श्यामा का ट्रैक मेन ट्रैक से जुड़ जाता है। दो गुटों के बीच की भयानक शह और मात पूरी फिल्म में टेंशन को बनाए रखने में कामयाब रहती है। निर्देशक ने छोटे कस्बे की धूल-धक्कड़ और बेतरतीबी को विश्वसनीय अंदाज में फिल्माया है। तकनीकी दृष्टि से फिल्म बहुत ही स्टाइलिश है।
सिनेमेटोग्राफर अजय सक्सेना के टॉप एंगल से लिए हुए शॉट कमाल के हैं। ‘लल्ला’ और ‘बलम सूबेदार’ जैसे गाने फिल्म के कोर को बनाए रखते हैं। बैकग्राउंड स्कोर तनाव को कम नहीं होने देता। फिल्म के मिजाज के हिसाब से क्लाइमैक्स थोड़ा और ड्रैमेटिक हो सकता था। अंत में फिल्म सीक्वल का इशारा भी करती नजर आती है।
कलाकारों का अभिनय फिल्म के लिए तारणहार का काम करता है। अनिल कपूर अपनी भूमिका में नायाब साबित होते हैं। उनका गुस्सा, चुप्पी और फिर दुश्मन को चित करने वाला अंदाज शानदार है। खौफनाक प्रिंस की भूमिका में आदित्य रावल खूब जंचे हैं। ‘दलदल’ के बाद एक अभिनेता के रूप में यहां वे और परिपक्व नजर आते हैं। राधिका मदान ने हमेशा की तरह शानदार काम किया है। दीदी के रूप में मोना सिंह के किरदार को और विकसित किया जाना चाहिए था। हालांकि मोना ने अपने चरित्र के साथ पूरा न्याय किया है। प्रभाकर के रूप में सौरभ शुक्ला और सॉफ्टी के रोल में फैसल मलिक उत्तम साबित हुए हैं। खुशबू अपनी भूमिका से ताजगी लाती हैं। मानव कॉल को आइटम सॉन्ग में ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिला। लेकिन नाना पाटेकर की कैमियो एंट्री सरप्राइज जरूर करती है। सपोर्टिंग कास्ट भी दमदार है।

