जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: भ्रष्टाचार के मामलों में किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले मंजूरी को अनिवार्य बनाने वाले प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने खंडित फैसला सुनाया है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की संशोधित धारा 17A की संवैधानिक वैधता को लेकर अदालत की दो जजों की पीठ अलग-अलग राय पर पहुंची।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने अपने फैसले में धारा 17A को असांविधानिक करार देते हुए कहा कि यह प्रावधान भ्रष्टाचार निवारण कानून की मूल भावना के खिलाफ है और इससे भ्रष्टाचार की जांच बाधित होती है।
जांच पर रोक से भ्रष्ट लोगों को मिलता है संरक्षण: जस्टिस नागरत्ना
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जांच शुरू करने से पहले पूर्व स्वीकृति की शर्त भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देती है। उन्होंने कहा, “ऐसे प्रावधान भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उद्देश्य को कमजोर करते हैं और निष्पक्ष जांच के रास्ते में बाधा बनते हैं।” उनके अनुसार, यह व्यवस्था भ्रष्टाचार से लड़ने के बजाय उसे बढ़ावा देती है, इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए।
ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा जरूरी: जस्टिस विश्वनाथन
वहीं, खंडपीठ के दूसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन ने धारा 17A को संवैधानिक बताया। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि यह प्रावधान ईमानदार अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण और बेबुनियाद शिकायतों से बचाने के लिए आवश्यक है। जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिकारियों को संरक्षण देना जरूरी है ताकि वे डर के बिना अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।
अब बड़ी बेंच करेगी अंतिम सुनवाई
दोनों न्यायाधीशों की राय में मतभेद के चलते अब इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखा जाएगा। मुख्य न्यायाधीश मामले की अंतिम सुनवाई के लिए एक बड़ी बेंच गठित करेंगे, जो धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला सुनाएगी।
क्या है भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A
गौरतलब है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A को जुलाई 2018 में जोड़ा गया था। इस प्रावधान के तहत किसी भी लोक सेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए फैसलों या की गई सिफारिशों को लेकर सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के बिना किसी भी तरह की पूछताछ या जांच पर रोक लगाई गई है।
जनहित याचिका पर आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह खंडित फैसला गैर-सरकारी संगठन सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (CPIL) द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया है, जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संशोधित धारा 17A की वैधता को चुनौती दी गई थी।

