Saturday, March 7, 2026
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Supreme Court ने भाजपा की याचिका खारिज की, कहा ‘राजनीतिक लड़ाई के लिए कोर्ट का उपयोग न करें’

जनवाणी ब्यूरो |

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा तेलंगाना) द्वारा तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ दायर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। यह याचिका तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी जिसमें रेड्डी के खिलाफ मानहानि के मामले को खारिज कर दिया गया था।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

भारत के मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अनुपस्थिति में, मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की “इस अदालत को राजनीतिक लड़ाई का मंच न बनाएं।”
“अगर आप एक राजनेता हैं, तो आपके पास इन सब चीजों को सहने के लिए मोटी चमड़ी होनी चाहिए।”

क्या था मामला?

भाजपा तेलंगाना के महासचिव ने मई 2024 में रेवंत रेड्डी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान रेड्डी ने एक भड़काऊ और अपमानजनक भाषण दिया।

रेड्डी ने कथित तौर पर कहा था कि “अगर भाजपा तेलंगाना में सत्ता में आती है, तो वह आरक्षण समाप्त कर देगी।” भाजपा का आरोप था कि यह बयान झूठा, भ्रामक और पार्टी की छवि को धूमिल करने वाला है।

निचली अदालत और हाईकोर्ट में क्या हुआ था?

निचली अदालत (2023)

अदालत ने माना कि रेड्डी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125 के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

हाईकोर्ट (2024)

रेड्डी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि “राजनीतिक भाषणों को अक्सर अतिशयोक्ति के साथ देखा जाता है। ऐसे भाषणों को मानहानि मानना स्वयं एक अतिशयोक्ति होगी।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता भाजपा की राष्ट्रीय इकाई का अधिकृत प्रतिनिधि नहीं था, इसलिए उसकी शिकायत वैधानिक नहीं मानी जा सकती।

अब क्या फैसला हुआ?

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए भाजपा की याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट ने दोहराया कि “शीर्ष अदालत राजनीतिक बयानबाज़ी के मामलों में हस्तक्षेप करने का मंच नहीं है।”

यह फैसला स्पष्ट संकेत देता है कि न्यायपालिका राजनीतिक मतभेदों और प्रचार से जुड़ी बातों में सीमित दखल ही देना चाहती है, जब तक कि मामला आपराधिक रूप से गंभीर न हो। साथ ही यह भी कि राजनीतिक व्यक्तित्वों को आलोचना और विरोध का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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