नमस्कार,दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। देशभर में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट घोटालों (Digital Arrest Scams) पर अब सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जॉयमल्या बागची की पीठ ने सोमवार को कहा कि ऐसे साइबर अपराधों की व्यापकता को देखते हुए इनकी जांच अब सीबीआई (CBI) को सौंपी जा सकती है। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से इन मामलों में दर्ज एफआईआर (FIR) की जानकारी मांगी है।
सीबीआई को मिल सकती है जांच की कमान
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “इन अपराधों का नेटवर्क देशव्यापी है और कई मामलों की जड़ें विदेशी ठिकानों से जुड़ी हुई हैं, इसलिए अब जांच का दायरा सीबीआई स्तर तक बढ़ाया जाना जरूरी है।” सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि इन साइबर ठगी के तार म्यांमार और थाईलैंड तक फैले हैं।
कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह इस तरह के मामलों की जांच के लिए एक ठोस कार्य योजना (Action Plan) तैयार करे और अदालत के समक्ष पेश करे। साथ ही कहा, “हम सीबीआई की जांच की प्रगति की निगरानी करेंगे और जरूरत पड़ने पर आगे के निर्देश भी जारी करेंगे।”
सुप्रीम कोर्ट ने खुद लिया था संज्ञान
सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि उसने 17 अक्टूबर को इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया था। अदालत ने कहा था कि “डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराध जनता के न्याय व्यवस्था पर भरोसे की जड़ पर वार करते हैं।”
अंबाला केस से शुरू हुई थी चर्चा
यह मामला तब सुर्खियों में आया जब हरियाणा के अंबाला में एक वरिष्ठ नागरिक दंपति को फर्जी न्यायिक आदेश दिखाकर 1.05 करोड़ रुपये की ठगी का शिकार बनाया गया। कोर्ट ने कहा कि यह कोई सामान्य अपराध नहीं, बल्कि संगठित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क है, जिसके खिलाफ राज्य और केंद्र सरकारों दोनों को मिलकर कार्रवाई करनी होगी।
अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 3 नवंबर को तय की है। तब तक सीबीआई से रिपोर्ट और कार्ययोजना मांगी गई है।

