जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी भी आरोपी को चार्जशीट का हिस्सा बनने वाले दस्तावेजों तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे दस्तावेजों को छिपाने से आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए सेवानिवृत्त मेजर जनरल वी.के. सिंह को कुछ अत्यधिक गोपनीय दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। सिंह 2007 में दर्ज आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 के एक मामले में अभियोजन का सामना कर रहे हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम निष्पक्ष सुनवाई
सीबीआई ने दस्तावेज देने का विरोध करते हुए कहा था कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अत्यंत गोपनीय दस्तावेज हैं और उनकी प्रतियां सार्वजनिक होने का खतरा है। हालांकि, अदालत ने पाया कि सीबीआई ने यह नहीं कहा कि दस्तावेज मुकदमे के लिए अप्रासंगिक हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार आरोपी को उन सभी दस्तावेजों तक पहुंच मिलनी चाहिए जो चार्जशीट का हिस्सा हैं और मुकदमे से संबंधित हैं। अदालत ने माना कि ऐसे दस्तावेजों को छिपाने से निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्रभावित हो सकता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द
मेजर जनरल वी.के. सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें दस्तावेजों की प्रतियां देने के बजाय केवल उनका निरीक्षण करने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश में संशोधन किया और दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
शर्तों के साथ दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश
अदालत ने कहा कि दस्तावेजों का उपयोग केवल मुकदमे की कार्यवाही के लिए किया जा सकेगा। इन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया या किसी अन्य माध्यम से सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। साथ ही, आरोपी को इस संबंध में एक लिखित राजीनामा ट्रायल कोर्ट में जमा करना होगा।
मामला क्या है?
सीबीआई ने सितंबर 2007 में वी.के. सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आरोप था कि उन्होंने अपनी पुस्तक “India’s External Intelligence – Secrets of Research and Analysis Wing” में संवेदनशील और गोपनीय जानकारी का खुलासा किया। अप्रैल 2008 में आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी।
बाद में सिंह ने सीआरपीसी की धारा 207 के तहत आवेदन देकर उन दस्तावेजों की प्रतियां मांगी थीं जो चार्जशीट का हिस्सा थे, लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराए गए थे। लंबे कानूनी विवाद के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया है।

