Wednesday, April 15, 2026
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बच्चों को हार स्वीकारना भी सिखाएं

उषा जैन ‘शीरी’

बच्चों का मन कोमल और भावुक होता है। उन्हें समझने की जरूरत है और माता पिता से बेहतर उन्हें कौन समझ सकता है। अपनी आकांक्षाओं को उन पर लादने के बजाय उनका मन टटोलें। लगातार मिलने वाली हार से परेशान बच्चा कई बार निरूत्साहित होकर प्रयास करना ही छोड़ देता है। डांट डपट उन पर उलटा असर करती है। जिद में आकर वे विद्रोह पर उतर आते हैं या डिप्रेस्ड रहने लगते हैं। अन्तमुर्खी बन जाते हैं।

ऐसे में यह बेहद जरूरी हो जाता है कि आप उन्हें विश्वास में लें। उन्हें बताएं जताएं कि आप उनके वैलविशर हैं, आप उनकी हर तरह से मदद करेंगे लेकिन प्रयास तो उन्हें स्वयं ही करना है। प्रयास करने पर कुछ भी मुश्किल नहीं है। प्रैक्टिस करते करते ही परफेक्शन प्राप्त किया जा सकता है।

बच्चे का एप्टीट्यूड देखें

किसी एक ही क्षेत्र में न उलझे रहें। बच्चे का एप्टीट्यूड, उसकी प्रतिभा को परखें और तद्नुसार उसे आगे बढ़ाएं। क्या हुआ अगर वह डिबेट में अपना सिक्का नहीं जमा पाया। अगर आर्ट्स में वो अच्छा है, एक नन्हा सा आर्टिस्ट उसमें सर उठाए आगे बढ़ने को तत्पर है तो उसे ड्राइंग काम्पीटीशन में भाग लेने के लिए प्रेरित करें। गरज यह कि बच्चे को किसी भी तरह की हताशा से बचाएं। उसे व्यस्त रखें। एक किसी विषय में हार जाने से उसका मनोबल न टूटने दें।

हर समय लेक्चर न दें

बच्चों को सबसे ज्यादा एलर्जी होती है मां बाप के अनवरत दिए जाने वाले प्रवचन तथा लेक्चर से। स्कूल में भी लेक्चर, घर पर भी लेक्चर। भले ही ये उनकी भलाई की खातिर दिए जाते हैं लेकिन बहुत ज्यादा भलाई फिर भलाई नहीं रह जाती जब इससे बच्चे का व्यक्तित्व ही आहत होने लगे। समझाएं जरूर मगर एक दोस्त की तरह। थोड़े में बात कहें ताकि बच्चा आपकी बातों से ऊबने न लगे। कुछ दिलचस्प उदाहरण देकर बात करेंगी तो उसका पॉजिटिव असर होगा।

बच्चे का मनोबल बढ़ाएं

कई बच्चे बेहद प्रतिभाशाली होते हैं। उनमें कई गुण छुपे होते हैं जिन्हें छुपे रूस्तम कहते हैं। कुछ इसी तरह लेकिन नेचर से कुछ शर्मीले और दब्बू किस्म के होने के कारण उनमें आत्मविश्वास की कमी आ जाती है। अपने से धाकड़ मगर प्रतिभा में शून्य सहपाठियों के आगे वे मात खा जाते हैं, सिर्फ इसलिए कि उनमें वो किलर इंस्टिंक्ट नहीं होती जो प्रतियोगिता जीतने के लिए जरूरी है। ऐसे में उन्हें जरूरत होती है मॉरल सपोर्ट की जो यार दोस्त, मां बाप तथा बहन भाई ही दे सकते हैं। वे ही अपनी बातों से उन्हें उत्साहित कर उसे ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं। अपना इलेक्ट्रिफाइंग असर छोड़ कर उत्साह से भर सकते हैं। संघर्ष के लिए जज्बा पैदा कर सकते हैं। मनोबल बढ़ाने के लिये महापुरूषों की जीवनियां व प्रेरक प्रसंग भी बच्चे को पढ़ने के लिए दिए जा सकते हैं। इनका बहुत पॉजिटिव असर होता है।

पहले खुद समझें माता पिता

जब वे खुद ही हार को ग्रेसफुली लेना नहीं सीखेंगे तो बच्चों को क्या सिखाएंगे। कई पढ़े लिखे मां बाप बच्चों के साथ खेलते हुए बच्चों का दिल न दुखे, यह सोच खुद जानबूझ कर हार जाते हैं और इस तरह उन्हें केवल जीतने की खुशी मनाना ही सिखाते हैं। यह बच्चों के हक में उचित नहीं। उन्हें हारने भी दें और उस हार को स्वीकारना बताएं। उन्हें समझाएं कि ह्यदिस इज नॉट द एंडह्ण। अगली बार सही, नहीं तो फिर सही। इस तरह खेल में हार जीत चलती रहती है। इसलिए हारने पर रोना कैसा। बच्चे के खेल की तारीफ करें। भले ही वो हार गया तो क्या। केवल कभी हार जाने से उसका खेल कम अच्छा नहीं हो गया। हार जीत कई बार चांस की बात भी होती है।

उसे योग व ध्यान की महत्ता समझाते हुए अपने साथ ये एक्सरसाइज करवाएं। इससे उसे आत्मनियंत्रण में मदद मिलेगी। हार जीत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बच्चे के लिए समझ लेना जरूरी है कि जीत की तरह हार भी खेल का हिस्सा है और यह कि गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में, वो तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले। बच्चों को हमेशा जीतने देने से उन्हें हारने का डर लग सकता है। कभी-कभी जानबूझकर उन्हें हराएं और फिर हार को संभालने का कौशल सिखाएं। उन्हें सिखाएं कि जीत क्षणिक है और दूसरों का सम्मान करना (हाथ मिलाना/बधाई देना) अधिक महत्वपूर्ण है। हार स्वीकार करने से बच्चों में धैर्य, सहानुभूति और आत्मविश्वास विकसित होता है, जो उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

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