
उस दिन उससे मेरी मुलाकात करीब तीन दशकों बाद हुई थी। पर लग नहीं रहा था जैसे इतना समय गुजर गया हो। बस उसकी आँखों की चमक कुछ कम हो गई थी और गॉगल्स की जगह रीडिंग ग्लास ने ले ली थी। मैंने पूछा, ‘इतने सालों बाद? कैसे इंडिया आना हुआ?’
उसने मुस्कुराकर कहा, ‘…कहां जा सका…बस, यही गांव के एक कॉलेज में प्रोफेसर हूं… अभिमन्यु से स्टूडेंट्स के लिए कुछ नोट्स चाहिए थे, इसीलिए उसने घर आने को कहा था।’
मैंने हंसते हुए कहा, ‘अच्छा…। तो तुम मुझसे मिलने नहीं आए थे? तुम इतना कैसे बदल गए आकाश?’ वह भी सॉरी कहकर बस हंसता रहा। ‘तुम तो जेएनयू से ही लंदन के सपने देखते थे आकाश?…सीधे गांव?…कैसे इस तरह तुम्हारे सपने आसमान से धरती पर उतर गए?’
मेरे लिए वास्तव यह एक प्रश्न ही था। जेएनयू से पढ़ाई के बाद एक प्रतिष्ठित प्राइवेट कॉलेज में लेक्चरर रहते हुए आकाश ने कितने ही विद्यार्थियों के यूपीएससी के सपनों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाई थी। वही आकाश आज किसी गुमनाम से गांव के कॉलेज में लेक्चरर है। आकाश ने बात को टालते हुए कहा, ‘चलो… आज नहीं बता पाऊंगा…। कुछ विद्यार्थियों की किताबें लेनी हैं। अभि ने मेरे लिए नोट्स दिए होंगे। हफ्ते भर बाद फिर आना है… तब बातें होंगी… तुम्हारे हाथ की स्ट्रॉन्ग कॉफी के साथ…’
आकाश के जाने के बाद मैं उसके साथ बिताए दिनों के चक्रव्यूह में घंटों बैठी रही। उसने पहली मुलाकात में ही मुझसे पूछ डाला था, ‘लगता है आपने पूरी रात जागकर लेक्चर की तैयारी की है।’ मैंने जब पूछा आपको कैसे मालूम तो वह बोला, ‘आपकी आंखों में नींद की कमी देखकर।’ पहली मुलाकात में इतना बेबाक। मुझे थोड़ा सा अजीब लगा, पर… अच्छा भी।
उसके बाद हमारे मिलने का सिलसिला शुरू हुआ था। हमारी पसंद और हमारे विचार काफी मिलते थे। इसलिए हम एक-दूसरे के साथ समय बिताना पसंद करने लगे। कभी साथ में कॉफी, तो कभी शाम की चाय। चाय और कॉफी के बीच हम समझ ही नहीं पाए कि कब हमारे बीच एक ऐसा रिश्ता पनप गया था, जिसके नाम का पता हमें भी नहीं था। एक रिश्ता जो दोस्ती से कुछ ज्यादा तो जरूर था, पर प्रेमी और प्रेमिका का भी नहीं था। बस हमें एक दूसरे पर एक भरोसा सा हो गया था। भरोसा…कि अगर कभी कोई मुसीबत आई तो हम एक-दूसरे को एक-दूसरे के लिए साथ खड़ा पाएंगे।
उस दौरान कई बार मेरी शादी की भी बात आई। मुझे नहीं करनी थी इसलिए मैं बार-बार आकाश ढाल बनाती। आकाश हर बार मेरे परिवार वालों को ऐसे छल कर आ जाता जैसे वही सच में मेरा हमसफर बनने वाला हो। इस तरह के उसके कई एहसान थे मुझ पर।
फिर…आखिरकार मेरी शादी हो गई। मेरे पति अभि भी उसी कॉलेज में पढ़ाते थे। हम तीनों दोस्त बन गए। कभी-कभी अभि को हमारी दोस्ती से जलन भी हो जाया करती थी। पर… वह हंसकर टाल जाया करते थे।
एक दिन अचानक आकाश ने कहा कि वह इस लेक्चररशिप से रिजाइन कर रहा है। पूछने पर उसने कहा कि उसे लंदन में कोई अच्छा आॅफर मिला है। हम सब बहुत खुश थे। फिर कुछ ऐसा हुआ कि उसके जाने से पहले उससे मिल ही नहीं पाए। उस दिन के बाद आज ही आकाश मुझे मिला था। तो क्या वह कभी लंदन गया ही नहीं?… और उसकी शादी…? यह सब मेरे लिए पहेली जैसा था।
अगले सात दिनों तक मेरा मन कई तरह के अनुमान लगाता रहा। आशंका की सुई बहुत तेज घूमती है, इतनी तेज कि हमें हकीकत से कोसों दूर जाकर पटक देती है। कई बार मेरा मन स्वयं मुझको भी दोष देता कि मुझसे भी तो गलती हुई थी। मैं भी अपने बच्चों, परिवार और कॉलेज में कुछ इस तरह उलझी कि कभी उसकी खोज-खबर भी नहीं ले पाई और फिर उस जमाने में तो विदेश जाने का मतलब ही विदेशी हो जाना होता था। समय के साथ हमारी दोस्ती बस एक मीठी याद बनकर रह गई थी। और आज उसका लंदन न जाकर भी हमसे इतने वर्षों तक न मिलना मेरे लिए एक पहेली जैसा बनता जा रहा था।
अभि ने घर आते ही पूछा, ‘आकाश को नोट्स दे दिए…?’ जवाब में मैंने पूछा, ‘तुम्हें पता था कि आकाश लंदन गया ही नहीं…!’ अभि कुछ जल्दी में था। कहते हुए कि उसे भी कल ही यह पता चला, वह सुबह मुंबई जाने की तैयारी में लग गया। मैंने भी सोचा अच्छा है वह जब तक लौटेगा तब तक आकाश से अगली मुलाकात हो जाएगी और मैं अच्छी तरह उसे अपने सवालों के कटघरे में खड़ा कर पाऊंगी।
बेचैनी के सात दिनों बाद जब दरवाजे की घंटी बजी तो आकाश फिर से एक बार सामने खड़ा था। मैंने व्यंग्य करते हुए कहा, ‘तो इस बार तुम वाकई आ गए। मैं तो सोच रही थी कि तुम फिर एक बार झूठ बोल कर निकल गए।’ आकाश के कहने पर कि वह झूठ नहीं बोलता मेरे मुंह से एक व्यंग्य भरी हंसी निकल ही गई। पर शायद आकाश को अपने कहे पर विश्वास था। उसने पूछा, ‘क्या…कुछ गलत कहा मैंने…?’ एक दीर्घनि:श्वास के साथ मैं बस कह सकी, ‘पता नहीं।’
आकाश के लिए कॉफी ले कर आई ही थी कि आकाश ने मुझसे पूछा, ‘क्या बात है प्राची ,तुम कुछ नाराज और परेशान दिख रही हो…?’ मैंने जब कहा ‘नहीं तो’, तब आकाश ने मेरे कंधों पर अपने हाथ रख दिए और कहा, ‘क्यों झूठ बोल रही हो?
मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, ‘झूठ पर सिर्फ़ तुम्हारा ही अधिकार है क्या?’
आकाश को अपनी गलती का अहसास हो गया था। एक अच्छे इन्सान की सबसे बड़ी कमी यही होती है कि वह अपने झूठ को छुपा नहीं पाता है। इसलिए मुझे पूछना नहीं पड़ा। वह खुद अपने झूठ की सफाई देने लगा, ‘हां मैंने तुम सब से झूठ ही कहा था… और…तुम्हें सच्चाई बताने से शायद उस समय मेरा फैसला बदल जाता…खैर छोड़ो…इतनी अच्छी कॉफी के साथ इतनी बेसुरी बात नहीं जाएगी।’ आकाश ने एक बार फिर बात को टालने की कोशिश की, पर मेरी आंखें उसका जवाब सुनने के लिए उसे घूरती रहीं।
कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए आकाश, एक लंबी सांस छोड़ कर कहने लगा। ‘तुम्हें याद है…तुम्हारी शादी के कुछ समय बाद…हमारे कॉलेज में मैनेजमेंट ने इकानॉमी ड्राइव शुरू किया था। उसके तहत कुछ फैकल्टीज को निकालना तय हुआ। मीटिंग में यह फैसला लिया गया कि जो भी किसी विषय में जूनियर लेक्चरर हैं उन्हें ही हटाया जाएगा। कमिटी के एक मेंबर ने मुझे पहले ही बता दिया कि अभिमन्यु को हटाया जाएगा। यह सुन कर मैं सन्न रह गया। अभी-अभी तो तुम दोनों ने लोन ले कर घर खरीदा था और कार भी। तुम दोनों अपनी नई गृहस्थी में कितने खुश थे। दिल्ली में अपना घर होना तुम्हारा सपना था। उस घर की रसोई में पहली बार खाना बनाते हुए…आत्मविश्वास और संतुष्टि से भरी…तुम्हारी छवि…मेरी आंखों के सामने आ गई। अभि के जॉब के जाने से तुम दोनों के पारिवारिक सपनों की उड़ान, जिसने अभी पंख ही पसारे थे, बिखर जाती। कर्ज की ईएमआई के तगादों और जॉब न रहने से होने वाली अन्य परेशानियों और उनसे मलिन हुए तुम्हारे चेहरे से की कल्पना मात्र से मैं डर गया…तुमसे मेरा इतना रिश्ता तो था ही कि कड़ी धूप में खड़ा रह कर मैं कम-से-कम तुम्हारे लिए छाया बना रहूं।
इसलिए मैंने मैनेजमेंट और तुम सब को लंदन जाने की बात कह दी और इस्तीफा दे दिया। मैनेजमेंट ने मेरी जिम्मेदारी अभिमन्यु को सौंप दी। लेकिन, इसे डेस्टिनी ही कहेंगे कि असाइनमेंट आधा छोड़ कर जाने पर मैनेजमेंट से मेरी बहस हो गई और इसीलिए कॉलेज ने मुझे अच्छा एक्सपीरिएंस सर्टिफिकेट नहीं दिया। किसी अच्छे कॉलेज में नौकरी मिलना मुश्किल था, इसलिए मैंने अपने सपने बदल लिए। मेरे गांव के कॉलेज में अच्छे विद्यार्थी तो थे, पर यूपीएससी के लिए तैयारी कराने वाला कोई व्यक्ति नहीं था। मैंने वही जॉब ले ली। मुझे लगा अगर मैं उनके सपनों को पूरा करना अपना सपना बना लूं तो शायद मुझे भी खुशी मिलेगी। मैं खुश हूं कि मैं इतने सालों में कई बच्चों के सपनों को पूरा करने में सफल रहा। हां… एक बात जरूर हुई… इस सब में उलझ कर उम्र निकल गई और मैंने शादी नहीं की…’
यह सब कह कर आकाश हंस पड़ा। मैं अवाक सी उसे देखती रही। उसे कोई अच्छा इंसान कहूं या देवता जिसने मुझ पर हंसते-हंसते अपनी सारी खुशियां लुटा दी थीं। जिसने दूसरों की सफलता में अपनी सफलता ढूंढ ली थी। उसे धन्यवाद कहती तो उसका त्याग शायद छोटा पड़ जाता। और अगर उससे इस त्याग का कारण पूछती तो हमारे इस अनकहे रिश्ते का अपमान होता।
जाते हुए आकाश ने कहा, ‘एक बार गांव में रम जाओ तो शहर पराये लगने लगते हैं। फिर भी…मैं अब तुम दोनों से मिलने आने की कोशिश करूंगा।’
फिर वह चला गया। उसे जाते हुए देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई फकीर अपनी सारी खुशियांं हमारी झोली में डाल कर जा रहा हो। आज भी हम दोनों जब घर की बालकनी में बैठे हुए ढलते सूरज को देखते हुए साथ-साथ शाम की चाय पीते हैं हैं तो हमें लगता है कि हमारी खुशियों और हमारे घर के एक हिस्से में आकाश भी शामिल है
आरती प्रणय


