- मेरठ डिपो में निगम की 127 और भैंसाली में अनुबंधित 167 बसों के बेड़े में ज्यादातर सफर के आखिरी पड़ाव पर
- डिपो और वर्कशॉप में गई रेतीली मिट्टी बन रही है मुसीबत का सबब, धूप में धूल तो बारिश में हो जाता
है दलदल
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: मेरठ डिपो और वर्कशॉप परिसर में डाली गई रेतीली मिट्टी रोडवेज स्टाफ के लिए मुसीबत का कारण बनी हुई है। यहां धूप में रेतीली मिट्टी धूल बनकर उड़ती है, वहीं बारिश होने पर दलदल का रूप धारण कर लेती है। वहीं, मेरठ डिपो में परिवहन निगम की 127 बसों के बेड़े में अधिकांश आठ से 10 किलोमीटर तक का सफर तय करके कंडम होने की स्थिति में पहुंचने वाली हैं। जबकि भैंसाली डिपो में चलने वाली अनुबंधित बसों की स्थिति और सेवाओं से भी यात्री बहुत ज्यादा संतुष्ट नहीं हो पा रहे हैं।
बेगमपुल से दिल्ली की ओर जाने वाले रोड पर भैंसाली बस स्टैंड नुमाया होता है। बस स्टैंड पर बीते कुछ समय में अधिकारियों के आफिसों से लेकर यात्रियों के लिए शेड आदि कई काम हुए हैं, जो दिखाई भी देते हैं, लेकिन भैंसाली डिपो के अंतर्गत चलने वाली 167 अनुबंधित बसों में अधिकतर काफी पुरानी नजर आती हैं। इन बसों के रखरखाव का काम चूंकि बस स्वामियों के ही जिम्मे होता है, इसलिए निगम के अधिकारी बहुत ज्यादा ध्यान भी इनकी तरफ नहीं दे पाते हैं।
इन बसों का अनुबंध क्षेत्रीय स्तर पर न होकर लखनऊ मुख्यालय स्तर से होने के कारण अधिकारियों का अधिक दखल भी नहीं रह जाता। विभागीय सूत्र बताते हैं कि अनुबंधित बसों के संचालन के लिए मालिक की ओर से बस, चालक और उसके रखरखाव का काम किया जाता है। जिसकी एवज में मालिक को प्रति किमी की दर से भुगतान किया जाता है।
जबकि निगम की ओर से इन बसों पर परिचालक को रखते हुए मार्ग निर्धारित करने का काम होता है। हालांकि यातायात अधीक्षक शिवदत्त सारस्वत बताते हैं कि बसों के रखरखाव पर विभाग की बराबर नजर रहती है। अगर किसी बस में मानक के विपरीत कोई खामी नजर आए तो उसका संचालन रोककर ठीक कराने के लिए भेज दिया जाता है। इसके लिए विशेष रूप से एक अक्षम चालक की ड्यूटी भी लगाई गई है।

भैंसाली डिपो के बराबर में ही मेरठ डिपो स्थित है, जहां से परिवहन निगम की 127 बसों का संचालन किया जाता है। स्टेशन प्रभारी हरेन्द्र गुप्ता ने स्वीकार किया कि बेड़े में शामिल अधिकांश बसों की स्थिति यह है, कि उन्होंने आठ से 10 लाख किमी तक का सफर पूरा कर लिया है। मानक के अनुसार 10 साल की अवधि पूरा करने या 12 लाख किमी का सफर करने वाली बसों को कंडम घोषित कर दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले ही 33 पुरानी बसों को मेरठ डिपो से हटाकर दूसरे क्षेत्रों में भेजा गया है। जहां से अपेक्षाकृत बेहतर कंडीशन और नए मॉडल की बसों को मंगाया गया है। वर्कशॉप के फोरमैन प्रवीन कुमार का कहना है कि जिनन बसों को निरंतर एक ही चालक चलाते रहते हैं उनका संचालन अपेक्षाकृत बेहतर रहता है। उन्होंने बताया कि वर्कशॉप के स्तर से यही प्रयास रहता है कि सभी बसें अपनी निर्धारित आयु और सफर को सुचारू रूप से पूर्ण कर सकें।
बसों की खस्ताहाली के साथ-साथ मेरठ डिपो और वर्कशॉप के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। पुराने भवन को जैसे-तैसे काम करने के लिए बनाया गया है, जिसमें बरसात से पहले डाली गई रेतीली मिट्टी आज तक स्टाफ के लिए मुसीबत का सबब बनी हुई है। रोडवेजकर्मी बताते हैं कि जिस समय यहां रेतीली मिट्टी डाली गई,
उसी रात मूसलाधार बारिश ने पूरे परिसर को दलदल बना दिया, जिसमें कई बसें धंस गर्इं। इन बसों को निकालने के लिए जेसीबी मशीनों को मंगवाना पड़ा। मौजूदा स्थिति यह है कि मामूली बरसात होते ही डिपो और वर्कशॉप परिसर में दलदल की स्थिति बन जाती है। मौसम सामान्य रहने पर रेतीली मिट्टी धूल बनकर उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाल रही है।
बसों के संचालन और रखरखाव में कोई कमी नहीं है। मेरठ डिपो से चलने वाली अधिकांश बसों से निगम को मुनाफा ही होता रहा है। जो बसें 10 वर्ष की आयु पूरी कर लेती हैं, या 12 लाख किमी का सफर पूरा कर लेती हैं, उन्हें नियमानुसार स्वत: ही हटा दिया जाता है। बेडेÞ में शामिल बहुत सी बसें नए मॉडल की हैं, इनमें एसी बसें भी शामिल हैं। डिपो के कार्यालयों में समतलीकरण के साथ-साथ सीमेंट का काम कराकर उन्हें बैठने लायक बना लिया गया है। परिसर में फर्श बनाने के काम का निर्माण खंड की ओर से टेंडर हो चुका है। यह काम शीघ्र शुरू हो जाएगा।
-जगदीश सिंह, एआरएम मेरठ डिपोमेरठ डिपो के बाहरी क्षेत्र में इंटरलॉकिंग का काम होना है। टाइल्स का फर्श बिछवाने के लिए करीब आठ लाख रुपये का टेंडर हो चुका है। एक सप्ताह में यहां परिवर्तन नजर आने लगेगा। वर्कशॉप यानी भीतरी भाग में फर्श बिछवाने का काम दूसरे चरण में कराया जाएगा। जिसके लिए शीघ्र ही प्रक्रिया शुरू कराई जाएगी।
-अनिल शर्मा, अवर अभियंता, निर्माण खंड परिवहन निगम

