
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख धर्म के अलावा किसी भी अन्य धर्म के लोगों को शिड्यूल कास्ट (अनुसूचित जाति) का दर्जा नहीं दिया जा सकता। अव्वल तो यह खबर कहीं सुर्खियां भी न बटोर सकी, दूसरा ये कि सोशल मीडिया पर भी इस बारे में कहीं कुछ खास बहस सुनाई नहीं दे रही है। हालांकि, यह सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है और आलोचना का सवाल ही पैदा नहीं होता। लेकिन, एक इस निर्णय पर एक समालोचनात्मक नजर तो डाली ही जा सकती है। मसलन, इस निर्णय के पीछे संविधान के क्या प्रावधान रहे और इस निर्णय के बाद मुस्लिम समुदाय समेत उनके कथित रहनुमाओं की क्या प्रतिक्रिया रही।
सबसे पहले, यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत के मुसलमान ईडब्लूएस आरक्षण का लाभ लेते हैं। यानी, वे सवर्ण मुसलमान हैं। भारत के मुसलमान ओबीसी आरक्षण का लाभ लेते हैं, यानी वे पिछड़े मुसलमान हैं। भारत के मुसलमान एसटी आरक्षण का लाभ (करगिल-लक्षद्वीप में) लेते हैं, यानी वे शेड्यूल ट्राइब भी हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय ने साफ कर दिया है कि उन्हें एससी का स्टेट्स नहीं दिया जा सकता। हालांकि, यह व्यवस्था पहले से संविधान में मौजूद है। राष्ट्रपति के आदेश 1950 के अनुसार मूल संविधान में सिर्फ और सिर्फ हिंदू धर्म के लोगों को ही अनुसूचित जाति (एससी) स्टेट्स दिए जाने की बात की गई थी। हालांकि, बाद में केंद्र सरकार ने संशोधन के जरिये इस लिस्ट में सिक्ख और बौद्ध धर्म को भी जोड़ दिया। जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने इस सूची में बौद्ध दलितों को भी शामिल किया, जिन्हें नव बौद्ध कहा गया। इससे पहले सिख दलितों को भी इस सूची में शामिल कर लिया गया था। इसके बाद इस लिस्ट से बाहर रह गए थे मुस्लिम, ईसाई, जैन और पारसी।
मनमोहन सिंह सरकार ने जब सच्चर कमेटी बनाई थी तब इस कमेटी ने जो रिपोर्ट दी, वह मुस्लिम समुदाय की बदतर सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति को बताती थी। इसके बाद, मनमोहन सिंह सरकार ने ही रंगनाथ मिश्रा कमीशन का गठन किया, जिसने 2007 में अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि मुसलमानों के बीच भारी जातिगत भेदभाव है और मुस्लिम समुदाय के भीतर जो अतिपिछड़ी जातियां हैं, उनकी हालत हिंदू दलितों से भी बदतर है और इसी आलोक में इस कमीशन ने उनके लिए 10 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की। साथ ही, इस कमीशन ने 1950 प्रेसिडेंशल आर्डर को हटाने की भी सिफारिश की क्योंकि कमीशन का मानना था कि यह अध्यादेश धार्मिक आधार पर लोगों की सामाजिक-शैक्षणिक-आर्थिक स्थिति की सच्चाई को देखे बिना भेदभाव करता है।
केंद्र सरकार ने सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्मों के धर्मान्तरित दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने से संबंधित प्रश्नों की जांच करने के लिए तीन सदस्यीय बालाकृष्णन कमेटी भी बनाई थी। बहरहाल, इस मुद्दे पर अब सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ चुका है। बहरहाल, आरक्षण की यह महाबहस अब खत्म हो चुकी है। लेकिन मुसलमानों के कथित रहनुमाओं की इस बारे में क्या प्रतिक्रिया रही, यह शायद ही किसी को पता हो।
दूसरी अहम बात कि क्या सिख धर्म, बौद्ध धर्म में जाति व्यवस्था हैं? फिर किस आधार पर मूल प्रावधान में संशोधन कर सिख और बौद्ध धर्म को इस व्यवस्था में शामिल किया गया? जाहिर हैं, ऐसा इसलिए किया गया होगा या किया जाना चाहिए था, क्योंकि वाकई उस धर्म के एक तबके (धर्मान्तरित लोगों समेत) की सामाजिक-शैक्षणिक-आर्थिक-सांस्कृतिक हालात बेहतर नहीं थे और उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए उन्हें विशेष सहायता दिए जाने की जरूरत थी? फिर एक सवाल उनलोगों से किया जाना चाहिए, जो कहते थे कि मुसलमानों या ईसाईयों को इस लिस्ट में शामिल किए जाने से हिंदू दलितों की हकमारी होगी? तो क्या सिख और बौद्धों को एससी स्टेट्स देने से हिंदू शेड्यूल कास्ट के लोगों की हकमारी हुई?
वैसे लोग क्या इसका समर्थन करते हैं या विरोध?
एक और अहम तथ्य कि क्या भारत के मुसलमानों में जाति प्रथा नहीं है और क्या उन जातियों के बीच भेदभाव नहीं है? भले सैद्धांतिक तौर पर आप जाति प्रथा न होने की बात कह सकते हैं। लेकिन, बिहार के हालिया जाति सर्वेक्षण में जो आंकड़े जारी हुए, उनमें तो बाकायदा मुसलमानों की जातियां बताई गर्इं हैं। आखिर ये जातियां कैसे तय हुर्इं, जबकि इस्लाम में जाति का उल्लेख ही नहीं है। तो इन विरोधाभासी तथ्यों के बीच, क्या मुस्लिम समुदाय के स्वघोषित रहनुमाओं को आगे आ कर कम से कम इन विरोधाभासों पर तो सफाई देनी चाहिए थी। उन्हें यह तो साफ करना ही चाहिए था कि भारतीय मुसलमानों के बीच जाति है या नहीं। लेकिन क्या किसी ने ऐसी कोई कोशिश की? अगर जाति सच्चाई नहीं है तो फिर कैसे, जैसाकि इस लेख के पहले हिस्से में ही बताया जा चुका है, मुसलमान ईडब्ल्यूएस, ओबीसी और एसटी आरक्षण ले रहे हैं?
कुछ लोगों की यह चिंता जायज दिख सकती है कि अगर मुसलमानों को एससी स्टेट्स दिया जाता तो उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ जाती (संसद-विधानसभा के सीट आरक्षित हो जाते उनके लिए)। लेकिन, यह भी तो मानना ही होगा कि आप अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से की कमजोर सामाजिक-शैक्षणिक-आर्थिक स्थिति की अनदेखी करते हुए, राष्ट्र को संपूर्ण विकास के रास्ते पर नहीं ले जा सकते। आरक्षण किसी को इसलिए नहीं दिया जाता कि यह किसी का जन्मजात अधिकार है। बल्कि यह समाज के उस हिस्से को मुख्यधारा से जोड़ने और कदम से कदम मिला कर राष्ट्र को आगे बढ़ाने में सहायक बनने के लिए दिया जाता है। क्या इसी आधार पर ईडब्लूएस आरक्षण नहीं दिया गया। क्या यह नहीं माना गया कि सामान्य वर्ग का भी एक हिस्सा आर्थिक आधार पर कमजोर हो चुका है और उसे आगे लाने के लिए आरक्षण की मदद चाहिए? जाहिर है, इसके पीछे ऐसी ही सोच थी, तभी तो सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्लूएस आरक्षण को वैधता प्रदान की।
अक्सर यह कहा जाता है कि आरक्षण जाति या धर्म के आधार पर नहीं दिया जाना चाहिए। बात सही है। ऐसा होता भी है। जैसे, कोई व्यक्ति सामान्य वर्ग का होगा, ओबीसी होगा या एसटी होगा, इसके लिए धर्म का आधार जरूरी नहीं है। यह विशुद्ध रूप से स्थानीय स्तर पर उस वर्ग के लोगों की सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक-सांस्कृतिक स्थिति के आधार पर तय होता है और इसका फायदा मुसलमानों को भी मिलता है। लेकिन, एससी स्टेट्स दिए जाने के मामले में धर्म की पाबंदी का तर्क क्या हो सकता है? क्या सिर्फ वो सैद्धांतिक तथ्य, जो व्यवहार में नहीं है। जैसे, सिक्ख धर्म में जाति-पाति, ऊंच-नीच और वर्ण व्यवस्था का कड़ा विरोध किया गया है। बौद्ध धर्म में भी जाति व्यवस्था का कोई स्थान नहीं है और भगवान बुद्ध ने जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था का कड़ा विरोध किया था।

