
आखिरकार चोरी पकड़ी गई। वोट चोरी करके चुनाव जीतने के कुछ सबूत सामने आ गये। धीरे-धीरे और परतें खुल रही हैं, जिससे चोर चौकन्ने हो गए हैं। अब उनके पास चोरी के सबूत मिटाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा है। पूरे देश में रकफ (विशेष गहन पुनरीक्षण) करने की कोशिश इसी मंशा से जुड़ीहै। मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर असल में वे सारे सबुत मिटाना चाहते हैं, जिनसे वोट चोरी का खुलासा हो सकता है।
बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र के महादेवपुरा विधानसभा में कांग्रेस ने जब एकीकृत, डिजिटल और मशीन-रीडेबल मतदाता सूची की मांग की, चुनाव आयोग को तभी अंदेशा हो गया था कि चोरी उजागर होने वाली है। राहुल गांधी ने यहां लगभग एक लाख गड़बड़ियों के दस्तावेजी सबूत प्रस्तुत किए, जिससे चुनावी धांधली का चेहरा साफ हुआ। वास्तव में जिन फर्जी वोटों से वोटचोरी की गई थी, उन्हें छिपाने के लिए अब देशभर की मतदाता सूचियों से इन नामों को हटाना जरूरी हो गया। मतदान प्रक्रिया में धांधली हुई या नहीं, यह मतदाता सूची की गड़बड़ियों की जांच से ही सामने आ सकता था।
यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी थी। लेकिन जब ये तथ्य उजागर हुए, तो आयोग ने मजबूरी में यह तो माना कि देशभर की मतदाता सूचियों में गड़बड़ियां हैं, पर अपनी जिम्मेदारी से हटकर विपक्षी दलों पर ठीकरा फोड़ दिया कि उन्होंने समय रहते आपत्तियां दर्ज नहीं करार्इं। अगर आयोग निष्पक्ष होता, तो सबूतों के आधार पर जांच करता। लेकिन उसने बिना जांच किए ही कह दिया कि मतदाता सूची में गड़बड़ी का मतलब मतदान में धांधली नहीं है। इससे साफ है कि आयोग मतदाता सूची और मतदान प्रक्रिया के बीच के सहसंबंधों को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा है।
2014 के बाद से लगातार आरोप लगते रहे कि ईवीएम और मतदाता सूची में हेरफेर कर चुनाव परिणाम बदले जा रहे हैं। इन सभी चुनावों में मतदाता संख्या और मतदान प्रतिशत अप्राकृतिक रूप से बढ़े, जिसका सीधा लाभ बीजेपी को मिला। जहां बीजेपी हारी, वहां भी हार का अंतर कम हो गया। गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 में मतगणना के अंतिम घंटों में अचानक नतीजे पलटने से शंका उठी थी। 2024 की लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद तो खुले तौर पर धांधली के आरोप लगने लगे। जब भी आरोप सिद्ध करने के लिए चुनाव आयोग को जानकारी मांगी गई, हर बार आयोग ने इंकार कर दिया।
ईवीएम की जांच की मांग पर आयोग ने कड़ी शर्तें लगाई, ताकि असली जांच न हो सके। सीसीटीवी फुटेज मांगने पर सरकार ने कानून ही बदल दिया। डिजिटल, मशीन-रीडेबल मतदाता सूची देने से इनकार कर दिया गया। नाम काटे जाने की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। जहां-जहां सबूत मिल सकते थे, वहां जानकारी रोकी गई या नियम बदले गए। यहां तक कि न्यायपालिका ने भी कई मौकों पर सरकार का साथ दिया।
मतदाता सूची में हेरफेर कर आंकड़े बदलना और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करना धांधली का तरीका बन गया है।अब तक का घटनाक्रम एक पैटर्न स्पष्ट करता है। मतदाता संख्या बढ़ाओ। मतदान प्रतिशत बढ़ाओ। कॉरपोरेट मीडिया और चुनावी सर्वे से माहौल बनाओ। फिर धांधली कराई गई जीत को जनादेश की तरह प्रस्तुत करो। मतदाता सूची में फजीर्वाड़े से बढ़े मतदान का सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिलता रहा हैं। इससे साफ है कि नामों का जोड़-घटाव किसी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है। 2014 और 2019 में मतदाता संख्या में अप्राकृतिक बढ़ोतरी दिख रही थी। यदि सचमुच उद्देश्य केवल मृत या डुप्लीकेट नाम हटाना होता, तो यह काम नियमित प्रक्रिया से भी किया जा सकता था और आज एसआईआर की जरूरत ही नहीं पड़ती। एसआईआर होना चाहिए या नही? इस सवाल का जवाब कर्ता के नियत पर है। यहां चुनाव आयोग की मंशा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। अगर चुनाव आयोग पुराने सभी चुनाव की मतदाता सूचियां सार्वजनिक करने से मना करता है, ऐसे स्थिति में चुनाव में हो रही धांधली को सप्रमाण सिद्ध करने के लिए एसआईआर का विरोध जरूरी हो गया है।
सवाल किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं है। यह लड़ाई किसी दल के पक्ष या विपक्ष की नहीं है। असली मुद्दा लोकतंत्र में मतदाता के वोट देने के अधिकार की रक्षा का है। धांधली-मुक्त, पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया ही लोकतंत्र की नींव है। अगर संवैधानिक संस्थाएं अपने दायित्व से हटकर किसी दल विशेष को फायदा पहुंचाने लगें, तो लोकतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

