Monday, March 23, 2026
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योग्यता की बेड़ियों में भविष्य

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भारत में शिक्षा को लंबे समय से सामाजिक उत्थान का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता रहा है। शिक्षक को समाज का निर्माता कहा गया, ज्ञान को साधना और शिक्षण को सेवा का दर्जा दिया गया। किंतु इसी पवित्र माने जाने वाले क्षेत्र के भीतर एक ऐसा वर्ग लगातार पनपता गया, जिसकी असुरक्षा, शोषण और मौन पीड़ा पर न तो नीति-निर्माताओं ने गंभीर ध्यान दिया और न ही समाज ने ईमानदार संवेदना दिखाई। यह वर्ग है—स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में कार्यरत शिक्षक, जिनका भविष्य आज योग्यता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ दिखाई देता है।

स्ववित्तपोषित शिक्षकों की स्थिति को समझने के लिए केवल कागजी नियमों या आदर्श वक्तव्यों को पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीनी सच्चाई को देखना आवश्यक है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, हापुड़, गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर जैसे जिÞलों में बीते दो दशकों में निजी शिक्षण संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इन क्षेत्रों में इंजीनियरिंग, प्रबंधन, शिक्षा, विधि और सामान्य स्नातक-स्नातकोत्तर महाविद्यालयों का जाल फैला है। अनुमानत: इन जिÞलों में हजारों की संख्या में स्ववित्तपोषित शिक्षक कार्यरत हैं, जिनमें बड़ी संख्या पीएच डी, नेट और सेट जैसी उच्च योग्यताओं से युक्त है। इसके बावजूद उनकी औसत मासिक आय कई संस्थानों में 10 से 15 हजार रुपये के बीच सिमटी हुई है, वह भी बिना किसी स्थायित्व, सामाजिक सुरक्षा या भविष्य निधि के।

यह स्थिति केवल आर्थिक संकट की कहानी नहीं है, बल्कि मानसिक और सामाजिक विघटन की प्रक्रिया भी है। वर्षों तक पढ़ाई करने के बाद, शोध करने के बाद, जब शिक्षक यह महसूस करता है कि उसकी योग्यता केवल संस्थान की मान्यता पूरी करने का साधन बनकर रह गई है, तो उसका आत्मसम्मान भीतर ही भीतर टूटने लगता है। वह न तो खेतों में पानी देने के लायक बचता है और न ही बाजार में माल ढोने के लायक। न पढ़ते तो खाते सौ तरह कमाकर—हाय मारे गए तालीम पाकर—यह पंक्ति आज लाखों शिक्षकों की व्यथा को शब्द देती है।

समस्या की जड़ में केवल निजी प्रबंधन नहीं है, बल्कि एक पूरी व्यवस्था है, जो शिक्षा को बाजार की वस्तु मानकर संचालित कर रही है। स्ववित्तपोषित संस्थानों को बिना पर्याप्त नियामक निगरानी के फैलने दिया गया। विश्वविद्यालय और नियामक संस्थाएं नियुक्ति, वेतन और सेवा-शर्तों पर स्पष्ट और सख़्त अमल सुनिश्चित करने में असफल रहीं। परिणामस्वरूप शिक्षक अनुबंध, अतिथि या अस्थायी कर्मचारी के रूप में वर्षों तक कार्य करता रहता है, हर सत्र के अंत में इस भय के साथ कि अगला सत्र मिलेगा या नहीं।

मेरठ और गाजियाबाद जैसे शहरी जिÞलों में स्थिति और भी विडंबनापूर्ण है। यहां संस्थानों की आय का बड़ा हिस्सा छात्रों से ली जाने वाली भारी फीस से आता है, फिर भी शिक्षक को सम्मानजनक वेतन देना प्राथमिकता नहीं बनता। कई मामलों में पूरा शैक्षणिक ढांचा शिक्षकों की न्यूनतम लागत पर अधिकतम लाभ निकालने की सोच से संचालित होता है। यह तर्क दिया जाता है कि प्रतिस्पर्धा अधिक है, छात्र कम हैं और संस्थान आर्थिक दबाव में हैं। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, किंतु यह प्रश्न अनुत्तरित रहता है कि इस दबाव का संपूर्ण बोझ केवल शिक्षक ही क्यों उठाए।

भाषा का प्रश्न इस संकट को और गहरा कर देता है। आज का यथार्थ यह है कि अंग्रेजी न जानने वाले पीएच.डी. धारक का भविष्य अत्यंत सीमित होता जा रहा है। जब विद्यालय स्तर से ही अधिकांश बच्चे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ रहे हैं, तब उच्च शिक्षा और रोजगार के द्वार भी अंग्रेजी दक्षता से ही खुलते हैं। राजनीतिक मंचों से यह कहा जाता है कि हिंदी हमारी गर्व की भाषा है, किंतु यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि वैश्विक और राष्ट्रीय अवसरों की कुंजी अभी भी अंग्रेजी ही है। यह विरोधाभास विशेषकर ग्रामीण, किसान और मजदूर वर्ग के बच्चों के लिए घातक सिद्ध होता है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिंदी-अंग्रेजी का यह विमर्श कहीं न कहीं अवसरों के असमान वितरण से जुड़ा है। यदि ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने और समझने लगें, तो वे भी उसी प्रतिस्पर्धा में आ खड़े होंगे जहो अब तक सीमित वर्ग का वर्चस्व रहा है। इसलिए केवल भावनात्मक गर्व के नाम पर हिंदी को आगे बढ़ाने की बातें तो होती हैं, पर अंग्रेजी सशक्तिकरण की ठोस नीति नहीं बनती। इसका सीधा प्रभाव उन शिक्षकों पर पड़ता है, जो हिंदी माध्यम से पढ़े-पढ़ाए गए हैं और अब स्वयं को हाशिए पर खड़ा पाते हैं। उनकी हालत दयनीय होती जा रही है।

संवैधानिक दृष्टि से यह स्थिति गंभीर प्रश्न खड़े करती है। समान कार्य के लिए समान वेतन, गरिमापूर्ण आजीविका और शिक्षा का अधिकार केवल कागजी सिद्धांत नहीं हैं। जब एक ही विश्वविद्यालय से संबद्ध दो महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों के वेतन और सेवा-शर्तों में भारी अंतर होता है, तो यह समानता के अधिकार की भावना के विपरीत है। स्ववित्तपोषित शिक्षक न तो पूरी तरह निजी कर्मचारी है और न ही उसे सरकारी संरक्षण प्राप्त है। वह दो व्यवस्थाओं के बीच लटका हुआ ऐसा व्यक्ति है, जिसके अधिकार स्पष्ट नहीं और उत्तरदायित्व अत्यधिक हैं।

समाधान की दिशा में सोचते समय प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए। सबसे पहले, नियुक्ति और वेतन संबंधी नियमों का सख़्ती से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। विश्वविद्यालयों और नियामक निकायों को केवल कागजी निरीक्षण तक सीमित न रहकर वास्तविक क्रियान्वयन पर ध्यान देना होगा। दूसरा, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए, ताकि शिक्षक का जीवन हर सत्र में अनिश्चितता के हवाले न रहे। तीसरा, भाषा नीति को यथार्थवादी बनाया जाए, जिसमें हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी दक्षता को भी समान महत्व दिया जाए, ताकि अवसरों का दायरा व्यापक हो।

दीर्घकालिक स्तर पर आवश्यक है कि शिक्षा को केवल निवेश और लाभ के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति पर पुनर्विचार किया जाए। यदि शिक्षक ही असुरक्षित रहेगा, तो शिक्षा की गुणवत्ता और समाज का बौद्धिक भविष्य दोनों संकट में पड़ेंगे। यह केवल शिक्षकों का प्रश्न नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का प्रश्न है, जिसे वे गढ़ रहे हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज, नीति-निर्माता और शिक्षण संस्थान आत्ममंथन करें। क्या हम सचमुच उस शिक्षा व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं, जो न्याय, समानता और गरिमा पर आधारित हो? या फिर हम मौन रहकर एक ऐसे वर्ग को टूटते देख रहे हैं, जिसने जीवन भर दूसरों को सोचने, समझने और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी? यह प्रश्न केवल पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि उत्तर तलाशने और व्यवस्था को बदलने के लिए है।

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