- भाटवाड़ा मोहल्ले के आचार्य करते हैं सूरजकुंड में अंतिम संस्कार
- सूरजकुंड श्मशान घाट पर पीढ़ियों से काम कर रहे महाब्राह्मणों ने बयां किया दर्द
- 42 परिवार और 42 दिन बाद नंबर आता है हर परिवार का
ज्ञान प्रकाश |
मेरठ: हम तो जाते अपने धाम सबको राम राम। सूरजकुंड श्मशानघाट पर सदियों से अंतिम संस्कार करने वाले भाटवाड़ा मोहल्ले के 42 परिवारों के लिये कोरोना के दूरी लहर के बीते 45 दिन हमेशा याद रहेंगें। महाब्राह्मण कहलाने वाले इन आचार्यों ने व्यवस्था बना रखी है कि हर परिवार को 42 दिन बाद मौका मिलेगा अंतिम संस्कार करने का। अगर कोई आपदा जैसे हालात आ गए तो सब मिलजुलकर काम करते हैं। इस बार एक अप्रैल से लेकर 23 मई तक दो हजार के करीब शवों का अंतिम संस्कार हो चुका है। इन महाब्राह्मणों के लिये बीते दिन भयावह मंजर वाले साबित हुए।
कोतवाली थाना क्षेत्र का भाटवाड़ा मोहल्ला महाब्राह्मणों का स्थायी आवास है। इस मोहल्ले में 42 परिवार रहते हैं जो अंतिम संस्कार का काम करते हैं। बुजुर्ग कृष्ण गोपाल शर्मा ने बताया कि यह हम लोगों का पुश्तैनी काम चला आ रहा है। पुरानी व्यवस्था को शहर और देहात में बांटा गया है।
दोनों जगह के अलग अलग आचार्य है। इनके काम का बंटवारा गांवों के लोगों का संस्कार करने के लिये हिंदू तिथि के हिसाब से किया जाता है और शहर के लोगों का दिन के हिसाब से होता है। मतलब एक परिवार को 42 दिन बाद मौका मिलेगा अंतिम संस्कार करने के लिये।
यानि एक परिवार को साल भर में आठ बार अंतिम संस्कार का मौका मिलेगा। इस पूरी व्यवस्था में कही भी शक की गुंजाइश नहीं है। अगर निर्धारित दिनों में शव नहीं आते हैं या कम आते हैं। इससे कोई मतलब नहीं है, यह उसकी किस्मत की बात है। कंकरखेड़ा में स्थित श्मशान घाट एक आचार्य के हिस्से में है। वहीं सूरजकुंड में आजादी से पहले हिंदुस्तान में रहने वाले पजांबियों के लिये और रिफ्यूजियों के लिये अलग आचार्य की व्यवस्था की गई है। ऐसे चार आचार्य यह काम करा रहे हैं।
कोरोना की दूसरी लहर ने जहां अस्पतालों और नर्सिंग होमों को हाउसफुल कर दिया था। वहीं, सूरजकुंड श्मशान घाट में अंतिम संस्कार कराने के लिये लोगों को घंटों इंतजार तक करना पड़ गया था। प्रशासन को इसके लिये 25 अतिरिक्त प्लेटफार्म तक बनवाने पड़ गए थे।
अब कोरोना के संक्रमण में गिरावट आने के कारण इसका सीधा असर श्मशान घाट पर पड़ा है। इन शवों का अंतिम संस्कार दूसरी लहर के दौरान कई दिन लगातार 70 से लेकर 78 शव तक अंतिम संस्कार के लिये आये थे, लेकिन कई दिनों से यह ग्राफ गिरा है और रविवार को अंतिम संस्कार के लिये 18 शव आये।
प्रशासन ने संक्रमण को फैलने से रोकने के लिये कोविड शवों के लिये अलग से गेट बनवा दिया था। जब शवों की तादाद बढ़ी तो नगर निगम ने 25 अलग से प्लेटफार्म बना दिये थे। दूसरी लहर के दौरान शवों की संख्या बढ़ने के कारण कई परिवार के लोगों ने मिलकर यह काम किया।
इसको लेकर एक दो बार विवाद भी हुआ। आचार्यों ने बातचीत में बताया कि पूरी जिंदगी में इतने शव एक साथ लगातार कभी नहीं देखे थे। विक्टोरिया पार्क अग्निकांड में भले 65 लोग मारे गए थे, लेकिन यह एक-दो दिन की बात थी, लेकिन कोरोना ने ऐसा भयावह मंजर दिखा दिया जो घर के बुजुर्गों के मुंह से भी नहीं सुना था।

