
देश में प्रदूषित पानी पीने से बीमार होने और उससे होने वाली मौतों की घटनायें अक्सर अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। यह कोई नयी बात नहीं है। बीते दिनों देश के सर्वाधिक स्वच्छ शहर के नाम से विख्यात इंदौर शहर के भगीरथपुरा क्षेत्र में मल युक्त प्रदूषित पानी के सेवन के कारण अभी तक हुयी 18 लोगों की मौत और 3200 से अधिक लोगों के बीमार होने का मामला आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है। वहां दूषित पानी पीने से बीमार लोगों का अस्पताल पहुंचने का सिलसिला अभी थमा नहीं है, वह बेरोकटोक जारी है।
दरअसल हालात की गंभीरता का आलम यह है कि इंदौर में बोरिंग के पानी तक में मल-मूत्र वाला वैक्टीरिया पहुंच गया है। लोग साफ पानी के लिए तरस रहे हैं और तकरीब एक हफ्ते बाद भी यहां के लोग पीने के पानी के लिए टैंकरों के भरोसे हैं। गौर करने वाली बात है कि यह हालत जब देश के सर्वाधिक स्वच्छ शहर की है, उस दशा में देश के दूसरे शहरों की हालत क्या होगी। यह बात आसानी से समझ में आ जाती है। यह हालत देश में हर घर को नल से साफ पानी देने का दावा करने वाली सरकार का है। विडम्बना देखिए यह हालत अकेले इंदौर की ही नहीं है, गुजरात का गांधीनगर भी इंदौर जैसे हालात का सामना कर रहा है जहां दूषित पानी पीने से 100 से ज्यादा लोग बीमार होकर अस्पतालों में भर्ती हैं। देश की राजधानी दिल्ली भी दूषित पेयजल की समस्या से अछूती नहीं है। यहां के लोग भी हर साल दूषित पेय जलापूर्ति की समस्या से दो-चार होते हैं। आज भी यहां जनकपुरी, भलस्वा, चंद्र नगर, अशोक नगर ,नारंग कालोनी आदि अनेक इलाकों के लोग दूषित पेयजल मिलने से परेशान हैं।
जनकपुरी ए ब्लाक का गंदे पानी की आपूर्ति का मामला अभी भी एन जी टी में विचाराधीन है। एन जी टी की सख्ती के बाद अब कहीं जाकर दिल्ली जल बोर्ड ने सुध ली है और इस इलाके की दशकों पुरानी और छतिग्रस्त पाइप लाइन बदलने का काम शुरू किया है। असलियत में दिल्ली में दूषित पेय जलापूर्ति की मुख्य समस्या दशकों पुरानी 2800 किलोमीटर लम्बी पाइप लाइन का होना है। समय पर पाइप लाइन में बदलाव न होना और देखरेख में लापरवाही के कारण रिसाव, पानी की बर्बादी और दूषित पानी की समस्या हरसमय बनी रहती है। वह बात दीगर है कि राजधानी दिल्ली में जल शोधन संयंत्रों में लिए गये सैंपलों में 33 सैंपल फेल पाये गये हैं। 2024 में तो 2309 सैंपल जांच में फेल हो गए थे।
चिंतनीय तो यह है कि भगीरथ पुरा के निजी और सार्वजनिक बोरिंग के पानी की जांच में वैक्टीरिया पाये जाने का मतलब है कि क्षेत्र के नलकूपों का पानी पीना तो दूर ,रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए भी सुरक्षित नहीं है। अस्पतालों में भर्ती पीड़ित रोगियों में टायफायड के लक्षण भी पाये गये हैं। डाक्टरों का तो इन पीड़ितों में हैपेटाइटिस-ए जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने का अंदेशा है। डाक्टरों का कहना है कि उल्टी-दस्त के संक्रमण के कारण कुछ मरीजों की किडनी भी बुरी तरह प्रभावित हुयी है। इन मरीजों में संक्रमण पेट से किडनी में पहुंच गया है। ऐसे रोगियों की स्थिति सुधरने में दूसरे रोगियों की तुलना में काफी समय लगेगा। जबकि हकीकत यह है कि अस्पताल पहुंचने से पहले पीड़ितों में किडनी की बीमारी के कोई लक्षण नहीं थे।
हालात बिगड़ने पर प्रशासन अब स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा घर-घर सर्वे करा रहा है, मरीजों का डाटा इकट्ठा करा रहा है, आरटीपीसीआर जांच करायी जा रही है। विडम्बना देखिए कि सरकार हाईकोर्ट में दावा कर रही है कि हालात काबू में हैं जबकि अस्पतालों में पीड़ितों के पहुंचने का सिलसिला अभी भी जारी है और दुखद यह है कि अभी भी प्रभावित क्षेत्र भगीरथपुरा में पेयजल संकट बरकरार है। एनएचआरसी ने भी इंदौर के भगीरथ पुरा में दूषित पानी से हुयी मौतों के मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य के सचिव को नोटिस जारी कर उनसे दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अब कहीं जाकर जिला प्रशासन ने दूषित जल से होने वाली इस बीमारी को महामारी घोषित कर दिया है। इसका मतलब साफ है कि लाख जतन करने के बावजूद बीमारी पर काबू नहीं पाया जा सका है और काफी तादाद में नित नये मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। सबसे दुखदायी पहलू यह है कि सरकार द्वारा निशुल्क उपचार की घोषणा के बावजूद निजी अस्पतालों में मरीजों को यह सुविधा नहीं मिल रही है।
राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस घटना पर दुख व्यक्त किया है। उन्होंने अस्पताल जाकर मरीजों का कुशल क्षेम जाना और मरीजों के इलाज का पूरा खर्च सरकार उठायेगी, व मृतकों को दो लाख राहत के तौर पर देने की घोषणा की है। लेकिन वहीं राज्य के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री जो स्थानीय विधायक भी हैं और बयानवीर भी हैं, कैलाश विजयवर्गीय की आपत्तिजनक टिप्पणी सर्वत्र चर्चा का विषय है। वह बात दीगर है कि बाद में वह अपने कथन पर खेद व्यक्त कर दें लेकिन मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहने वाले व्यक्ति को अपनी वाणी पर संयम रखना ही चाहिए।
देखा जाये तो इंदौर की त्रासदी तो महज एक बानगी है जबकि देश में नीति आयोग की मानें तो हर साल दूषित पानी पीने से दो लाख लोगों की मौत होती है जबकि विशेषज्ञ इनकी तादाद चार लाख से ज्यादा बताते हैं। नीति आयोग की मानें तो देश में तकरीब 60 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं है। इससे 6 फीसदी जी डी पी का नुकसान होता है। हकीकत में देश का 70 फीसदी पीने का पानी प्रदूषित है। पेयजल की गुणवत्ता के मामले में हमारे देश का दुनिया के 122 देशों में 120वां स्थान है और दुनिया के 20 पीने के पानी के मामले में संकटग्रस्त शहरों में देश के छह शहर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और बैंगलुरू शामिल हैं।
असलियत में दूषित पीने के पानी पीने से होने वाली मौतें विकास के दावों को मुंह चिड़ाती प्रतीत होती हैं। इससे जल जीवन मिशन की नाकामी, एक लाख तिरानवे लाख करोड़ की परियोजनाओं में अभी तक केवल 44 हजार करोड़ के काम पूरे हो पाना। जबकि इनकी अवधि इसी मार्च में पूरी हो रही है। हकीकत में पीने के पानी की लाइनों का बरसों पुराना होना, उनकी मरम्मत और देखभाल का अभाव, खराब योजना व डिजाइन, जल संचय का अपर्याप्त प्रबंधन, शुद्धिकरण के लिए व्यवस्था और निगरानी की कमी और उपभोक्ता के स्तर पर घरों से पानी के सैंपल लेकर जांच की व्यवस्था न होने के साथ भ्रष्टाचार वह अहम कारण हैं जिनके चलते पेयजल की ऐसी दुर्दशा की स्थिति पैदा हुयी है। इससे देश का कोई भी शहर-कस्बा अछूता नहीं है जहां की अधिकांश आबादी पीने के पानी के संकट से जूझ न रही हो। वह मजबूरी में प्रदूषित पानी पीने को मजबूर है। फिर जन प्रतिनिधि जब अपनी जेब भरने में लिप्त हों, तब तो जनता की हालत भगवान भरोसे ही है, इसमें दो राय नहीं। और फिर सबसे बड़ी बात यह कि जब पेय जलापूर्ति राज्य की प्राथमिकता में ही न हो, तब शुद्ध पानी सपना ही बना रहेगा। हां इंदौर का हादसा राज्यों और निगमों के लिए एक सबक जरूर है कि अब भी समय है संभल जाओ।

