
आखिरकार वह शानदार—जानदार आवाज खामोश हो गई, जो लाखों लोगों के दिलों पर राज करती थी। जिस आवाज से जुड़कर, मुल्क का आम आदमी भी एक अपनापन महसूस करता था। कुछ वक़्त के लिए ही सही, वह अपना गम-ओ-रंज भूल जाता था। आजादी के बाद जिन लोगों ने रेडियो को आम आदमी तक पहुंचाया, उसकी मकबूलियत बढ़ाई, उनमें सबसे अव्वल नंबर पर अमीन सयानी का नाम था। एक दौर था, जब अमीन सयानी ही रेडियो की आवाज थे। उसकी पहचान थे। रेडियो की आवाज के मायने अमीन सयानी थे। हफ़्ते में एक बार बुधवार के दिन पूरी फैमिली साथ बैठती और उनमें से एक मेंबर रात के आठ बजने से पहले रेडियो सीलोन ट्यून करता। रेडियो पर जैसे ही उनका सुपर हिट प्रोग्राम ‘बिनाका गीतमाला’ शुरू होता, तो वक़्त जैसे थम जाता। बेहद जोश-ओ-खरोश और मेलोडियस अंदाज में रेडियो पर जब ये आवाज गूंजती ‘जी हां भाइयों और बहनों, मैं हूं आपका दोस्त अमीन सयानी और आप सुन रहे हैं बिनाका गीतमाला…’, तो एक जादू सा तारी हो जाता। लोग दिल थाम कर बैठ जाते। फिल्मी गानों की इस हिट परेड को लेकर तमाम कयास लगाए जाते। अमीन सयानी का वास्ता रेडियो से कैसे हुआ, इसका किस्सा कुछ इस तरह से है। उनके बड़े भाई हामिद सयानी एक बेहतरीन ब्रॉडकास्टर थे। रेडियो सीलोन में वे प्रोड्यूसर थे। उन्होंने ही सबसे पहले अमीन सयानी का रिश्ता रेडियो से जोड़ा। हामिद सयानी के मशवरे पर अमीन सयानी ने आॅल इंडिया रेडियो में हिंदी ब्रॉडकास्टर के लिए आवेदन किया। अब इस बात पर शायद ही कोई यकीन करे कि उनकी आवाज रेडियो के लिए रिजेक्ट कर दी गई थी। इस वाकिआत के बाद अमीन सयानी के दिल को काफी धक्का लगा। वे निराश हो गए। अपने गाइड और उस्ताद हामिद सयानी के पास पहुंचे, तो उन्होंने अमीन से रिकॉर्डिंग के दौरान रेडियो स्टेशन के हिंदी कार्यक्रमों को सुनने के लिए कहा। अमीन सयानी ने ब्रॉडकास्टिंग का फन सीखने और उसे फॉलो करने में अपना जी-जान लगा दिया। आगे चलकर उन्हें इसका सिला मिला।
बीसवीं सदी के पांचवे दशक में रेडियो सीलोन पर हामिद सयानी की पेशकश में अंग्रेजी गीतों का एक प्रोग्राम बहुत बढ़िया प्रदर्शन कर रहा था। इस कामयाबी से मुतास्सिर होकर एड कंपनी ऐसा ही एक प्रोग्राम हिंदी फिल्मी गीतों का भी करना चाहते थे। अपनी यह चाहत उन्होंने हामिद सयानी को बयान की। हामिद सयानी ने यह प्रोग्राम खु़द न करते हुए अमीन सयानी को इसके लिए राजी कर लिया। इस तरह रेडियो पर एक शानदार प्रोग्राम के सफर का आगाज हुआ। प्रोग्राम का नाम ‘बिनाका गीतमाला’ था। आज से सात दहाई पहले यानी 3 दिसंबर, 1952 को सात गानों की सीरीज का पहला प्रोग्राम रिले किया गया। प्रोग्राम खू़ब पसंद किया गया। पहले ही प्रोग्राम से इसे जो कामयाबी मिली, फिर अमीन सयानी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस प्रोग्राम ने बीस साल के अमीन सयानी की जिन्दगी बदल कर रख दी। वे रातों-रात आवाज की दुनिया में स्टार बन गए। रेडियो सीलोन में पहले प्रोग्राम के बाद, ‘बिनाका गीतमाला’ की तारीफ में श्रोताओं के तकरीबन नौ हजार खत पहुंचे। यह सिलसिला आगे भी कायम रहा। एक दौर ऐसा भी आया, जब हर हफ़्ते खत की तादाद पचास हजार तक पहुंच गई। रेडियो और आवाज की दुनिया में यह एक इंकलाब था। इससे पहले किसी प्रोग्राम को इतनी बड़ी कामयाबी नहीं मिली थी।
रेडियो सीलोन और फिर उसके बाद आकाशवाणी के विविध भारती पर प्रसारित ‘बिनाका गीतमाला’ की चालीस बरस से भी ज्यादा समय तक, देश में ही नहीं दुनिया के कई देशों में धूम रही। दुनिया में कोई दूसरा रेडियो या टीवी प्रोग्राम इतने लंबे वक़्त और एक साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका और खाड़ी के मुल्कों में मकबूल नहीं रहा। इस प्रोग्राम के चाहने वाले दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व, पूर्वी एशिया और यूरोप के कुछ मुल्कों में भी थे। आज भी यह रिसर्च का मौजू़अ है कि इस कामयाबी के पीछे हिंदी फिल्मी नगमों का जादू था या अमीन सयानी की चहकती आवाज, या फिर प्रोग्राम को पेश करने का उनका दिलकश अंदाज। गोया कि वे जो भी कुछ बोलते, श्रोताओं के दिल को छू जाता। दुनिया भर के लाखों श्रोताओं के लिए अमीन सयानी सिर्फ़ एक रेडियो जॉकी भर नहीं थे, बल्कि वे उनके परिवार का हिस्सा हो गए थे। अमीन सयानी ‘बिनाका गीतमाला’ में पसंदीदा गानों को बजाने के साथ-साथ श्रोताओं के मनोरंजन का पूरा खयाल रखते। प्रोग्राम के बीच-बीच में कुछ दिलचस्प चिट्ठियां पढ़ते, तो एक कामयाब किस्सागो की तरह कुछ दिल को छू लेने वाले किस्से सुनाते। फिल्मी गीतों के अलावा वे अपनी बातों से भी श्रोताओं को बांधकर रखते थे।
अमीन सयानी की शानदार पेशकश में ‘बिनाका गीतमाला’ ने एक इतिहास रचा। आवाज की दुनिया में बेमिसाल योगदान के लिए अमीन सयानी को उनके जीते जी कई पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया गया। ‘पद्मश्री’ पुरस्कार के अलावा इंडिया रेडियो फोरम के साथ लूप फेडरेशन आॅफ इंडियन चैंबर्स आॅफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने ‘लिविंग लीजेंड अवार्ड’ के अलावा उनका नाम लिम्का बुक आॅफ रिकॉर्ड्स में भी शामिल रहा है। उन्होंने भरपूर जीवन जिया। उसका जमकर लुत्फ उठाया। उनके दिल में सिर्फ़ एक हसरत बाकी थी, वह अपनी आत्मकथा कम्प्लीट करना चाहते थे। जाहिर है कि इस आत्मकथा का इंतजार, सिर्फ़ उन्हें ही नहीं, दुनिया भर में उनके लाखों चाहने वालों को भी था।


