Thursday, February 22, 2024
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मौलिकता-ईमानदारी के लिए याद रखी जाएंगी ये कहानियां!

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RAVIWANI


25 7शिरीश खरे की पहली पुस्तक पढ़ी थी ‘एक देश बारह दुनिया’। इसमें एक ही देश में रहने वाली बारह दुनियाओं (वंचितों की) का शिरीष ने चौंकाने वाला चित्रण किया था। यह किताब भरपूर चर्चित और प्रशंसित हुई। अब उनकी दूसरी किताब आई है ‘नदी सिंदूरी’ (राजपाल एंड संस)। इसे शिरीष कहानी संग्रह बताते हैं। हालांकि कहीं-कहीं इस संग्रह के लिए संस्मरण शब्द का भी इस्तेमाल हो रहा। यह भी सच है पिछले कुछ वर्षों में कहानी और संस्मरण के बीच की दूरी कम हुई है। इन कहानियों को पढ़ते समय कहीं-कहीं ये कहानियां स्मृतियां सी भी जान पड़ती हैं। शिरीष ने भूमिका में यह स्वीकार भी किया है।

वह लिखते हैं, जहां नब्बे के दौर में देश-दुनिया में कई बड़ी घटननाएं अब इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं तो वहीं दूसरी ओर दूर-दराज के किसी देहात में घटने वाली घटनाओं को यहां संस्मरण और कहानियों के रूप में दर्ज कराया गया है।

सीधे किताब पर आते हैं। सिंदूरी मध्य भारत की एक बड़ी नदी नर्मदा की सहायक नदी है। इसी नदी के किनारे बसा है मदनपुर गांव। एक हजार की आबादी वाले इस गांव में न डाकघर है, न थाना, न तहसील, न पार्क, न स्ट्रीट लाइट, न चौराहे, न तिराहे, न ही नेताओं की मूर्तियां। यह शिरीष मदनपुर और सिंदूरी नदी को साहित्य में दर्ज कराने के लिए ये कहानियां लिखी हैं (यह समय बताएगा कि सिंदूरी और मदनपुर साहित्य में दर्ज हुआ या नहीं)। इन कहानियों को पढ़ने से पहले ही यह बात साफ थी कि इसमें गांव का जीवन देखने को मिलेगा।

यह भी स्पष्ट था कि ये कहानियां किस मकसद से लिखी गई हैं! आश्चर्यजनक रूप से ‘नदी सिंदूरी’ पढ़ते समय प्रेमचंद के उपन्यासों में वर्णित गांव याद नहीं आते, फकीर मोहन सेनापति का छै बीघा जमीन भी याद नहीं आता, इन कहानियों को पढ़ते हुए मैला आंचल या देहाती दुनिया की भी कोई दस्तक नहीं हुई। लगा कि शिरीष के पास मौलिकता और अपने गांव को अपनी तरह से देखने की नजर और समझ है। संग्रह की चौदह कहानियों में नदी आपके साथ रहेगी-बहेगी।

उसकी उपस्थिति इतनी मजबूत है कि कहीं-कहीं वह किरदार में बदल जाती है। ये कहानियां गांव की हैं, सिंदूरी की हैं तो स्वाभाविक है वहां का समाज, वहां के लोक कलाकार, चोर, ठग, साधु, प्रगतिशील पुजारी, आदर्शवादी मास्साब और विद्रोही दलित भी मिलेगा। इसमें ग्रामीण जीवन की प्रेम कहानियां भी हैं। लेकिन शिरीष ने कहीं भी उसे शहरी प्रेम कहानी नहीं बनाया। भाषा और उपमाओं के मोह में न पड़कर उन्हें सहज रहने दिया है।

आडंबरहीनता के बिना सहज है, संग्रह की अंतिम कहानी है ‘वे दो पत्थर’। कहानी बारहवीं के लड़के और ग्यारहवीं की लड़की की आंखें मिलने से शुरू होती है। बस दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। दोनों को लगता है कि उनकी आंखें काजोल और शाहरुख खान की आंखों की तरह मिल रही हैं। लड़का लड़की का नाम भी नहीं जानता। लेकिन लड़का यह जानता है कि इस गांव में प्रेम करने का अर्थ ही संस्कारहीन हो जाना है। वह संस्कारहीन नहीं होता। कहानी के अंत में लड़का अपने नाम का और एक लड़की के नाम का पत्थर सिंदूरी नदी में फेंक देता है। दोनों पत्थर सिंदूरी के तल में स्मृतियों के रूप में बैठ जाते हैं।

आमतौर पर गांवों के कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो आपके जेहन में बस जाते हैं। ऐसे किरदार कमोबेश हर गांव में पाए जाते हैं। नदी सिंदूरी में भी ऐसे कई किरदार आपको मिलेंगे। ‘तुम तो मेरी चौथी बेटी हो’ कहानी ऐसे ही एक किरदार पर आधारित है। बीतली से एक बारात मदनपुर आती है। लड़के और लड़की वालों के बीच झगड़ा हो जाता है। झगड़ा इतना बढ़ता है कि लड़की वाले उन बसों को तोड़ डालते हैं जिनमें बारात आई थी।

इन बसों की मालकिन है रामकली ‘चमारन’। पहले वह दोनों पक्षों से बसों का नुकसान भरने के लिए कहती है। बाद में उसका उदारवादी चेहरा दिखाई देता और वह लड़की को अपनी तरफ से एक सौ एक रुपए का नेग देती है और उसे अपनी चौथी बेटी बना लेती है। इसी तरह की एक और कहानी है ‘सात खून माफ’। यह कहानी सत्या पण्डितजी को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। सत्या को गांव वाले बाल बुद्ध कहते हैं, लेकिन वह पूरे गांव की असलियत जानता है। वह गांव में होने वाले हर अन्याय का विरोध करता है।

शिरीष का प्राथमिकताएं हैं ग्रामीण जीवन और वंचितों के जीवन को चित्रित करना। अपनी हर कहानी में वह उसे ही उकेरते हैं। ‘बसंत, साले हे मार’ में जातीय संघर्ष दिखाई पड़ता है तो ‘कल्लो तुम बिक गई’ घर की गाय (कल्लो) से बच्चे के लगाव की कहानी है। कैसे बच्चा गाय के बिकने की खबर सुनकर बेचैन हो जाता है और पूरी कोशिश करता है कि गाय को बिकने से बचा ले। ‘खूंटा की लुगाई भी बह गई’ कहानी भी यह साबित करती है कि शिरीष के पास फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस हैं, इसलिए प्रामाणिक हैं।

यह कहानी सिंदूरी में आई बाढ़ की कहानी है, जिसमें खूंटा और उसकी पत्नी दोनों बह जाते हैं। शिरीष अपनी कहानियों में एक तरफ प्रकृति संरक्षण की बात करते हैं तो दूसरी तरफ वह शहरों और गांवों की दुनिया में चीजों की समझ को लेकर कितना भेद है, इसका संकेत देते हैं ‘दूध फैक्ट्री से लाओ न’। एक दिन भोपाल से ग्यारह साल का राहुल मदनपुर आता है। यहां का माहौल देखकर वह परेशान हो जाता है। गांव का कीचड़, गांव की बोली उसे परेशान करते हैं। जब उसे बताया जाता है कि गांव में गाय इसलिए है ताकि दूध मिल सके, तो वह जवाब देता है, दूध फैक्ट्री से लाओ ना!

शहरी और ग्रामीण जीवन का यह फर्क आज भी देखा जा सकता है। ‘जब कछु नहीं तो चोरी ही सही’ कहानी में गांव की बेरोजगारी का चित्रण है। जब गांव के युवक को कोई काम नहीं मिलता तो वह चोरी करने को भी काम ही समझता है।
इन कहानियों में बुंदेली, अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का सहजता से प्रयोग हुआ है बड्डे, राइटर्स आदि। लेकिन इससे कहानी के प्रवाह पर कोई असर नहीं पड़ता। इन कहानियों में कस्बाई जीवन, प्रेम और आपसी झगड़े सब कुछ है। लेकिन शिरीष भूमिका में यह भी कहते हैं, नदी सिंदूरी एक बड़े पाठक वर्ग को ध्यान में रखकर और भारत के एक भिन्न लोक-जीवन से परिचय कराने के लिए लिखी गई है।

पहले तो उन लोगों के जो अपने गाँव और उसकी जड़ों से आज भी जुड़े हैं। दूसरे उन लोगों के लिए जो हैं तो गाँव के ही, लेकिन शहरीकरण की प्रक्रिया के तहत सालों पहले शहर आकर रहने लगे। उम्मीद है नदी सिंदूरी बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचेगी, इसलिए भी क्योंकि शिरीष के इन कहानियों को लिखने के उद्देश्य को अगर भूल भी जाएं तब भी ये कहानियाँ अपनी मौलिकता और ईमानदारी के लिए याद रखी जाएँगी।


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