Monday, April 20, 2026
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मटर की खेती के लिए सुझाव, मटर की अच्छी पैदावार के लिए खाद एवं उर्वरक कितना दे

KHETIBADI


मटर में सामान्यत: अनुशंसित उर्वरक नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की मात्रा क्रमश: 40:60:50 किग्रा प्रति हेक्टेयर होती है। मटर दलहनी फसल होने के कारण इसमें अधिक नाइट्रोजन आवश्यकता नहीं होती है नाइट्रोजन की उच्च खुराक गांठ निर्माण और नाइट्रोजन स्थिरीकरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। फॉस्फेटिक उर्वरक नाइट्रोजन स्थिरीकरण और गांठ गठन को बढ़ाकर उपज और गुणवत्ता बढ़ाता है। पोटेशियम उर्वरक पौधों की नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता और उपज को भी बढ़ाते हैं। इसमें नाइट्रोजन की 25 प्रतिशत मात्रा एवं फास्फोरस एवं पोटाश की 50 प्रतिशत मात्रा बुआई के समय देना पर्याप्त होता है जबकि शेष मात्रा 45 दिनों बाद फर्टिगेशन विधि द्वारा शत प्रतिशत घुलनशील रसायनिक उर्वरको के माध्यम से दिया जाना चाहिए।

सिंचाई कब और कितनी बार करें
मटर, किसी भी फलदार सब्जी की तरह, सूखे और अत्यधिक सिंचाई के प्रति संवेदनशील है। परंपरागत रूप से मटर में बहाव अथवा नाली पद्धति द्वारा सिंचाई की जाती है। अच्छे अंकुरण के लिए बुवाई से पहले पलेवा किया जाना चाहिए। सामान्यत: पहली सिंचाई फूल आने के समय और दूसरी पॉड बनाने के समय और बाकी की सिंचाइयाँ 15 दिन के अंतराल पर प्रदान की जाती हैं। अत्यधिक सिंचाई से पौधों में पीलापन बढ़ जाता है और उपज में कमी आती है। परंपरागत सिंचाई से पानी का हानि होती है, पंपिंग के लिए ऊर्जा उपयोग बढ़ता है, नाइट्रोजन और अन्य सूक्ष्म पोषण तत्वों का लीचिंग होती है। उचित सिंचाई प्रबंधन करने से पारंपरिक सिंचाई के नकारात्मक प्रभाव कम किया जा सकता है। अनुसन्धान में पाया गया है कि दबाव युक्त सिंचाई प्रणालियों सूक्ष्म फव्वारा एवं टपक सिंचाई प्रणाली द्वारा जल एवं कृषि रसायनों का उचित उपयोग कर उत्पादन में ४०-७० प्रतिशत तक वृद्धि कि जा सकती है।

सूक्ष्म फव्वारा सिंचाई विधि में पानी का छिड़काव प्रेशर वाले छोटे नोजल से होता है। इस विधि में पानी महीन बूँदों में बदलकर वर्षा की फुहार के समान पौधों के ऊपर गिरता है। मटर की फसल में 40 लीटर प्रति घंटा स्त्राव दर वाले सूक्ष्म स्प्रिंकलर का उपयोग किया जा सकता है। इस विधि से सिंचाई हेतु माइक्रो स्प्रिंकलर हेड के बीच की दूरी 2.5 मीटर एवं लेटरल से लेटरल की दूरी 2.5 रखनी चाहिए। माइक्रो स्प्रिंकलर के बीच की दूरी इसकी स्त्राव दर एवं वेटेड त्रिज्या पर निर्भर करती है।

टपक सिंचाई विधि: मटर की फसल में टपक सिंचाई प्रणाली हेतु पौध की कतारों के बीच 16 एम. एम. व्यास की 2 लीटर प्रति घंटा स्त्राव वाली लेटरल जिसमे ड्रिपर से ड्रिपर के बीच की दूरी 30 सेंटीमीटर से 40 सेंटीमीटर हो उपयोग की जाती है। इस विधि में प्रतिदिन अथवा एकदिन के अंतराल में पानी दिया जाता है।

प्लास्टिक मल्चिंग: मटर की फसल में टपक सिंचाई प्रणाली के साथ मल्च का उपयोग जल के कुशल उपयोग एवं उपज में वृद्धि के लिए सहायक है। अनुंसधान में मटर की फसल में २३-३० माइक्रोन मोटाई की प्लास्टिक मल्चिंग को अत्यंत प्रभावशाली पाया गया है। इसके उपयोग द्वारा मटर की उपज में ६०-८० प्रतिशत तक वृद्धि देखी गयी है। प्लास्टिक मल्चिंग द्वारा फसल में खरपतवार नियंत्रण एवं मृदा के कटाव को रोका जा सकता है। प्लास्टिक मल्चिंग मिट्टी की संरचना में सुधार करती है जोकि जड़ो के विकास के लाभदायक है।

मटर में बुआई कब करें एवं बीज दर क्या होनी चाहिए
सीड बैड तैयार करने के लिए मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करने के बाद एक या दो हैरो चलाकर बारीक जुताई की जाती है। गोबर की खाद 15-20 टन प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई से पहले मिटटी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। बीजों को समतल या ऊंची क्यारियों में 4-5.0 सेमी गहराई पर फैलाकर या डिबलिंग करके बोया जाता है।
बीज दर : मल्चिंग में मटर लगाने हेतु बेड 60-90 सेंमी चौड़ाई एवं 15-20 सेंमी ऊंचाई का होना चाहिए। मटर की समय पर बुआई के लिए 70-80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। प्रारंभिक किस्मों के लिए बीज दर 100-120 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर एवं पछेती किस्मों के लिए बीज दर 80-90 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती हैं।

मटर में कतार से कतार की दूरी 30-45 सेंमी एवं पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सेंमी रखनी चाहिए। बीजों को बुवाई से पहले कप्तान या थीरम 3 ग्राम या कार्बेनडाजिÞम 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। रासायनिक तरीके से उपचार के बाद वायुमण्डलीय नत्रजन के स्थिरीकरण के लिये के लिए बीजो को एक बार राइजोबियम कल्चर से बीज को उपचारित करके बोना चाहिए।

प्रमुख किस्में
मटर की फसल हेतु उपयुक्त किस्मे हैं झ्र जे. एम. -6, प्रकाश, के. पी. एम. आर. 400, आई. पी. एफ. डी. झ्र 99-13, जवाहर मटर 1, जवाहर मटर 2, जवाहर मटर 83, पंत माता, हिसार हरित, पंत उपहार, अपर्णा, पूसा प्रभात, पूसा पन्ना, आर्केल, बॉनविले आदि

मटर की तुड़ाई कब करें
ताजा बाजार के लिए मटर की कटाई तब की जाती है जब वे अच्छी तरह से भर जाती हैं और जब उनका रंग गहरे हरे से हल्के हरे रंग में बदल जाता है। आमतौर पर 10 दिनों के अंतराल पर 3-4 कटाई संभव है। फली की पैदावार किस्म की अवधि के साथ बदलती रहती है और शुरूआती किस्मों के लिए 2.5-4.0 टन/हेक्टेयर, मध्य सीजन की किस्मों के लिए 6.0-7.5 टन/हेक्टेयर और देर से आने वाली किस्मों के लिए 8.0-10.0 टन/हेक्टेयर होती है। कटाई के बाद मटर को बोरियों या बक्सों में पैक किया जाता है। मटर पर विभिन्न सिंचाई पद्धतियों पर किये गए प्रयोग द्वारा प्राप्त उपज को नीचे तालिका में दशार्या गया है।


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