Wednesday, March 18, 2026
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किसानों से अपराधियों जैसा बर्ताव

Samvad 51


KP MALIKखासतौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और अन्य दूसरी मांगों को लेकर एक बार फिर किसान आंदोलन जोरों पर हैं। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किसान दिल्ली का रुख कर रहे हैं। हालांकि किसानों को रोकने के लिए सरकार जिस तरह की कोशिशें कर रही है, उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि ये वायदा खिलाफी किसी और ने नहीं बल्कि सरकार ने ही की है। सरकार ही किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए हर कोशिश कर रही है। उसने राजधानी की सीमाओं पर बड़ी तादाद में भारी पुलिस बल और अर्द्धसैन्य बलों की तैनाती कर दी है। दिल्ली की सीमाओं पर पहुंच रहे किसानों की मांगें वही हैं, जो सरकार ने वायदे के तौर पर 2020 में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ और एमएसपी की मांग को लेकर खड़े हुए आंदोलन को खत्म करने के लिए किसानों से किए थे। बहरहाल, अब सवाल ये है कि केंद्र की मोदी सरकार आखिर किस तरह से अपने ही जाल में उलझ गई है। क्योंकि अगर वो तीन कृषि कानून किसान विरोधी नहीं बनाती, तो किसान इतनी बड़ी संख्या में कोरोना महामारी के दौरान दिल्ली कूच नहीं करते। इतना ही नहीं, भाजपा और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री बनने से पहले जिस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग किया करते थे, वो अब केंद्र की सत्ता में आने के बाद उन्हीं मांगों से मुकरते दिखाई दे रहे हैं। और अब जब किसान उसी बात को केंद्र की मोदी सरकार को याद दिलाकर अपने हक की मांग कर रहे हैं, तो किसान सरकार के लिए देशद्रोही से लेकर न जाने क्या-क्या दिखाई दे रहे हैं। सवाल ये है कि क्या सिर्फ पूंजीपतियों को ही मोटा मुनाफा कमाने का हक सरकार अब देगी? क्या सरकार किसानों से चाहती है कि वो अपनी फसलों को लगातार घाटा सहकर बिचौलियों और पूंजीपतियों के हाथों में सौंपते रहें? और वो उन्हीं फसलों पर मोटा मुनाफा कमाकर देश की जनता को लूटकर अपनी तिजौरियां भरते रहें? एक तरफ किसान दिन-रात मेहनत करके अपने ही खेतों से उतना भी लाभ नहीं कमा सकता कि उसका और उसके परिवार का गुजारा हो सके और दूसरी तरफ पूंजीपति उन्हीं फसलों को पैक करके उन पर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से ज्यादा पैसा वसूल कर इतना पैसा कमा लेते हैं कि वो विलासिता भरा जीवन जीकर भी उस पैसे को खर्च नहीं कर पाते हैं। क्या सरकार की ये दोहरी नीति सही है?

दरअसल देश के सबसे बड़े चुनाव सिर पर हैं और केंद्र की मोदी सरकार अपने खिलाफ खड़े होने वाले आंदोलनकारी किसानों को उनका हक देने की जगह उनसे अपराधियों की तरह बर्ताव कर रही है, जिसका असर किसी भी तरह सरकार के हित में नहीं होगा। हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा था कि सरकार ने किसानों की अधिकतर मांगें स्वीकार कर ली हैं। सरकार एमएसपी गारंटी से जुड़ी मांग पर चर्चा को तैयार है। लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि एमएसपी की गारंटी वाला कानून बिना सलाह किए जल्दबाजी में नहीं लाया जा सकता। मेरा सवाल ये है कि तीन दौर की बातचीत तो हाल ही में हो चुकी और इससे पहले एक दर्जन से ज्यादा बार किसानों और सरकार के बीच बातचीत हुई। इसके बाद साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाकर किसानों की मांगों के मसले को जल्द से जल्द सुलझाने को कहा था।

केंद्र की मोदी सरकार ने खुद एक कमेटी इसके लिए काफी पहले बनाई थी, फिर ऐसा क्या है रह गया, जिसे लेकर सरकार को इतना समय लग रहा है? एमएसपी का सीधा-सीधा फार्मूला है, जिस पर सरकार को बहुत ज्यादा सोचने की जरूरत ही नहीं है। केंद्र की मोदी सरकार को सीधे तरीके से किसानों की उन सभी फसलों पर, जो सरकार ने एमएसपी के भाव खरीदने का वायदा किया है, उन सभी फसलों पर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक भाव तय करना है और उस पर एक विधेयक बनाकर संसद में पास करना है और उसे कानूनी जामा पहनाना है। रही दूसरी मांगों की बात, तो उन्हें भी पूरा करने में क्या हर्ज है? अगर सरकार को लगता है कि किसानों की कोई मांग नाजायज या गलत है, तो सरकार उस पर खुलकर देश के सामने अपनी बात रखे। लेकिन वो सब कुछ गोलमोल करके किसानों को विलेन बनाने की कोशिश में क्यों लगी है। किसान वही मांगें तो कर रहे हैं, जिन्हें पूरा करने का सरकार वायदा कर चुकी है। और फिर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने में भी केंद्र की मोदी सरकार को क्या हर्ज है? जब वो स्वामीनाथन को कृषि में योगदान के लिए भारत रत्न दे रही है।

स्वामीनाथन आयोग का गठन साल 2004 में नवंबर महीने में हुआ था, जिसे ‘नेशनल कमीशन आॅन फार्मर्स’ नाम दिया गया था। स्वामीनाथन कृषि जगत से जुड़ी समस्याओं से ही वाकिफ नहीं थे, बल्कि वो हरित क्रांति के जनक भी थे। उनकी कमेटी ने साल 2006 में अपनी केंद्र की मनमोहन सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें किसानों की दशा में सुधार करने के लिए कई तरह की सिफारिशें की थीं। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस रिपोर्ट को लागू नहीं किया और उस समय भाजपा, कांग्रेस की मनमोहन सरकार को इस मामले पर लगातार घेर रही थी और उसने इसी के चलते कांग्रेस सरकार को किसान विरोधी बताया था। लेकिन अब जब एनडीए की सरकार केंद्र ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में भी है। लेकिन भाजपा इस रिपोर्ट को लागू करने से न सिर्फ कतरा रही है, बल्कि अब इस मांग को नाजायज बता रही है। लेकिन लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अब केंद्र की मोदी सरकार खुद अपने ही जाल में फंसती नजर आ रही है, इसीलिए इससे ताकत के जोर पर निपटना चाहती है।

दरअसल किसानों की मांग है कि उन्हें लागत मूल्य में 50 फीसदी सरप्लस एमएसपी मिलनी चाहिए। स्वामीनाथन रिपोर्ट भी इसी का समर्थन करती है। क्योंकि देश के ज्यादातर किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। जिसके चलते देश में हर रोज दर्जनों किसान आत्महत्या की राह पकड़ रहे हैं। स्वामीनाथन आयोग ने किसानों द्वारा आत्महत्याएं रोकने के लिए राज्य स्तर पर किसान आयोगों का गठन करने के साथ-साथ उनके लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने और वित्त-बीमा को उनके हितों में और बेहतर बनाने की सिफारिश भी की थी। इसके साथ ही इस आयोग ने महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड बनाने और कृषि जोखिम फंड बनाने की भी सिफारिश की थी। आयोग के मुताबिक, साल 1961 में कृषि क्षेत्र से देश के कुल रोजगार में से 75 फीसदी लोगों को रोजगार मिलता था, लेकिन साल 1999 से साल 2000 तक इस सबसे बड़े क्षेत्र में रोजगार घटकर 59 फीसदी रह गया था। अब खेती घाटे का सौदा होने के चलते अब तो किसानों के बच्चे ही खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। ऐसे में क्या सरकार को कृषि क्षेत्र को बचाने के लिए किसानों की मांगें नहीं माननी चाहिए? केंद्र की मोदी सरकार को किसानों की मांग पर विचार करना चाहिए, जिससे किसानों के सामने सरकार की मंशा साफ हो सके।


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