Saturday, June 15, 2024
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दो पाटों के बीच तबाह होता यूक्रेन

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Samvad 4


Rituparn Devयूक्रेन-रूस युद्ध को दूसरा सप्ताह बीतने पर है, कितने दिन और बीतेंगे कोई नहीं जानता। बेशक यूक्रेन हर रोज तबाह हो रहा है लेकिन युद्ध के मैदान में डटे रहना जेलेंस्की का नेतृत्व और उससे भी बढ़कर वहां के नागरिकों का देशप्रेम बताता है। यह बात अलग है कि यदि यूक्रेन पराजित हुआ तो वापस खड़े होने में लंबा वक्त लगेगा और जीता तो भी यही होना है। हर हाल में युद्ध की विभीषिका की सबसे बड़ी कीमत सिर्फ और सिर्फ यूक्रेन को ही चुकानी पड़ेगी।

भले ही शुरू में दुनिया को लगा हो कि युद्ध कुछ घंटों का होगा और दुनिया के नक्शे से एक लोकतांत्रिक देश सिमट जाएगा? मगर ऐसा नहीं हुआ। हर सुबह युद्ध की नई विभीषिका रात की तबाही का मंजर दुनिया को दिखाती, बताती और कल के दावे का कयास लगाती।

लंबा वक्त बीत रहा है, कल क्या होगा कोई नहीं जानता। महाशक्ति को चुनौती देना कोई साधारण बात नहीं। लेकिन रूस का भी इसे लेकर आंकलन गलत निकला। रूस का यूक्रेन की चुनौती का सामना कोई रणनीति तो नहीं लगती बल्कि दुनिया के सामने खुद को लजाने जैसा है। सबको पता है कि पुतिन का सपना एक बार फिर टूटे हुए सोवियत संघ को वापस बनाना है। लेकिन यूक्रेन का भी किसी देश के बुनियादी उसूलों की भांति स्वतंत्रता, स्वायत्तता, संप्रभुता को बरकरार रखने की मंशा भी तो बुरी नहीं कही जा सकती..!

इसे कोई गलती कहे या कोई यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की की अपने देशवासियों की भावनाओं का सम्मान लेकिन उन्होंने नाटो पर भरोसा करके यूक्रेन की भलाई का वो सपना देखा था जो रूस के साथ सच नहीं हो पाता। अब जेलेंस्की की ये उम्मीदें कितनी खरी और कितनी खोटी निकलीं आईने की तरह साफ है। यूक्रेन की तबाही और मानवाधिकार उलंघनों की त्रासद और पल-पल आती तस्वीरों ने दुनिया को झकझोर जरूर दिया है। न रूस मान रहा है और न ही यूक्रेन झुकता दिखता रहा है।

फोर्ब्स मैगजीन में दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोगों में लगातार कई बार शुमार रहे पुतिन को ऐसा क्या हो गया जो वो एक अड़ियल रुख अपना रहे हैं? 16 साल तक सोवियत संघ की गुप्तचर संस्था केजीबी में अधिकारी के रूप में सेवा दे चुके पुतिन ने 2000 और फिर 2004 का राष्ट्रपति चुनाव जीता। 2008 में प्रधानमंत्री बने फिर अपने मुताबिक संविधान संशोधन को कानून बनवाकर 6-6 वर्ष के कार्यकाल के लिए 2012 और 2018 में फिर राष्ट्रपति बने और इस तरह 2036 यानी 86 वर्ष की उम्र तक के लिए रास्ता साफ करा लिया।

वहीं जेलेंस्की जो टीवी सेलेब्रिटी स्टार रहे हैं, अप्रैल 2019 में ही यूक्रेन के राष्ट्रपति बने। नाटो में शामिल होने की कवायद के चलते रूस से दूरियां बढ़ती रहीं। रूसी की लगातार धमकी, सैन्याभास से बेफिक्री और अलगाववादियों को समर्थन के चलते मौजूदा हालात सामने हैं। युद्ध के दौरान भी बेहतरीन अदाकार जैसे अपने भावुक भाषणों से देश की जनता के हाथों में हथियार पकड़ा पूरी दुनिया को जेलेंस्की ने जहां प्रभावित किया, वहीं रूस के विरुद्ध जबरदस्त माहौल जरूर बना दिया।

चंद घंटों की लड़ाई का मंसूबा पाले महाशक्ति के सामने चुनौती ने वैश्विक अनिश्चितता ला खड़ी की है। निश्चित रूप से यूक्रेन की तबाही आज उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां मानवाधिकारों के हनन और तमाम शहरों के विध्वस के चलते दुनिया भर में यूक्रेन के प्रति सहानुभूति उमड़ी और देखते ही देखते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र महासभा आदि की बैठक में व्यापक समर्थन मिलना एक अलग संकेत है।

सवाल बेहद बड़ा है। क्या रूस, अमेरिका और अमेरिका के इशारे पर नाटो के त्रिकोण से युद्ध उस अंजाम तक जाएगा जहां से तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत होगी? रुस, यूक्रेन को अमेरिका की तरफ झुकता देखना नहीं चाहता। यूक्रेन रूस की तरफ जाना नहीं चाहता ऐसे में अंकल सैम कहें या खुद को दुनिया का दारोगा मानने वाले अमेरिका और पुतिन के नेतृत्व में फिर महाशक्ति बनने का ख्वाब पाले रूस का सोवियत संघ बनाने का मंसूबा दुनिया को किस मोड़ पर ले जाएगा, इसका जवाब फिलाहाल न तो आसान दिखता और न ही सुलझता।

पुतिन भले ही आत्मविश्वास से भरे दिखें, जेलेंस्की के भावुक भाषणों से दुनिया को मदद के लिए गुहारें लेकिन यह भी सच्चाई है कि रूस और यूक्रेन स्लाविक हैं, दोनों ही नाजियों के खिलाफ मिलकर लड़े हैं। मैदानी जंग के अलावा 21वीं सदी की बनती इस सबसे बड़ी लड़ाई का कोई ओर-छोर दिखता नहीं है क्योंकि यूक्रेन कोई कीबिया या सीरिया नहीं है। पर्दे के पीछे सारा खेल कभी अलग सा भी दिखने लगता है कि कहीं मकसद तेल और गैस की प्राकृतिक संपदा हथियाना तो नहीं?

यूक्रेन को भले ही सीधी मदद न मिले लेकिन तमाम देशों से हथियारों की खेप जिसमें टैंक, मिसाइल, ऐन्टी एयरक्राफ्ट गन और तमाम आधुनिक हथियार देकर यूक्रेन को उकसाने और डटे रहने की अमेरिकी जुगत से यह युद्ध भले ही तीसरे विश्व युद्ध के खतरे का आगाह कराता हो लेकिन सच तो यही है कि मानवता पर कहर बनकर टूटी यह जंग परमाणु युद्ध की ओर भी बढ़ती सी दिख रही है। यूक्रेन के दो परमाणु बिजली संयत्रों पर कब्जा, तीसरा हथियाने की तैयारी, थर्मोबारिक यानी वैक्यूम बमों का इस्तेमाल तक मानवता के लिए अच्छा नहीं है। 11वें दिन यूक्रेन का रूस पर पलटवार करना खतरनाक है।

एक आशियाना बनाने में लोगों की पूरी उम्र गुजर जाती है। यहां तो शहर के शहर तबाह हो रहे हैं ऊपर से यूक्रेन के नागरिकों ने कामकाज छोड़ हमलों की तैयारी पूरी कर हाथों में हथियार उठा लिए। महिलाएं तक जंग के मैदान में डटीं हैं। युद्ध का अंजाम जो भी निकले नहीं पता लेकिन मैदान से इतर भी एक लड़ाई जारी है, जिससे यह युद्ध कभी प्रोपोगण्डा तो कभी इन्फर्मेशन, कभी हाईब्रिड, कभी फोटो, कभी इंटरनेट तो कभी डिजिटल वार भी लगने लगता है।

ईश्वर न करे दो महाशक्तियों की जूतम पैजार के बीच फंसते दोनों ही तरफ के पड़ोसी देश भी कहीं युद्ध की विभीषिका में न उलझ जाएं वरना जैसा कि लगने लगा है तीसरा विश्व युद्ध तय है। अगर ऐसा हुआ तो रूस-अमेरिका में जंग कोई भी जीते हारेगी और तबाह होगी सिर्फ और सिर्फ इंसानियत। बस ऐसा न हो नहीं तो 21वीं सदी का यह विश्व युद्ध किस कगार पर ले जा सकता है|

कल्पना मात्र से ही सिरहन होती है क्योंकि जैसी कि धमकियां दोनों ही ओर से दी जा रही हैं उससे लगता है कि दुनिया ही नहीं बचेगी तो जीतेगा कौन? और जो बच भी जाएंगे उनके जख्मों, नासूर, भूख-प्यास का क्या हश्र होगा? सोचकर भी डर लगता है। मानवता का ही समूल विध्वंस न हो इस पर सबको तुरंत सोचना ही होगा।

ऋतुपर्ण दवे


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