Tuesday, April 23, 2024
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ये बच्चा कैसा बच्चा है

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शैलेंद्र चौहान |

इब्ने इंशा का जन्म पंजाब के जालंधर जिले के फिल्लौर कस्बे में हुआ था। इब्ने इंशा का असली नाम शेर मोहम्मद खान था। इब्ने इंशा ने 1946 में पंजाब यूनिवर्सिटी से बीए की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने कराची युनिवर्सिटी से एमए किया। उन्होंने रेडियो पाकिस्तान, मिनिस्ट्री आॅफ नेशन बुक सेंटर आॅफ पाकिस्तान और कुछ समय के लिए संयुक्त राष्ट्र के लिए भी काम किया।

इब्ने इंशा पाकिस्तान के मशहूर कवि, पत्रकार, लेखक और व्यंग्यकार थे। इब्ने इंशा छोटे-छोटे जुमलों में बड़ी से बड़ी और गहरी बात कह जाने का हुनर रखते थे। कुछ लोग इब्न ए इंशा को बतौर शायर जानते हैं तो कुछ उनके सफरनामों को याद करते हैं। फिर उनके व्यंग्य लेखन को कैसे भूल सकते हैं? इन तीनों विधाओं में उन्होंने जो भी लिखा उसमें एक तरह की सादगी और साफगोई है। गंगा जमुनी तहजीब से भिगोयी उनकी लेखनी में जब आप इंशा के भीतर का शख़्स टटोलने की कोशिश करते हैं तो उनके बारे में कोई राय बना पाना बेहद मुश्किल होता है। उर्दू की आखिरी किताब के हर पन्ने को पढ़ कर आप उनके मजाकिया व्यक्तित्व से निकलते हर तंज पर दाद देने को मजबूर हो उठते हैं, वहीं चाँदनगर में उनकी शायरी को पढ़कर लगता है कि किसी टूटे उदास दिल की कसक रह रह कर निकल रही है। ये बच्चा किसका बच्चा है, बगदाद की इक रात, सब माया है जैसी कृतियाँ उनके वैश्विक, सामाजिक और आध्यात्मिक सरोकारों की ओर ध्यान खींचती हैं। जब जब लोगों ने उनसे इस सिलसिले में प्रश्न किये उन्होंने बात यूँ ही उड़ा दी या फिर साफ कह दिया कि मुझे उन बातों को सबसे बाँटने की कोई इच्छा नहीं।

मैं जिस मध्यवर्गीय समाज का हिस्सा हूं उसमें अक्सर गरीबों और उनकी परेशानियों के प्रति कोई संवेदना नहीं दिखती। जब मैं उनसे इस बाबत बात करता हूँ तो वे तुरंत सरकारी सुविधाओं की बात करने लगते हैं। दलित आदिवासियों की बात हो तो उन्हें आरक्षण नजर आता है। और किसानों की बात करो तो सबसिडी ध्यान आ जाती हैे उन्हें ये बातें बहुत खटकती हैं लेकिन अमीरों और पूंजीपतियों के बचाव में खड़े रहते हैं। अब तो मंहगाई और बेरोजगारी से भी उन्हें कोई शिकायत नहीं है। वे सत्ता के साथ हैं। यह विडंबना है।

भारत ही नहीं पूरी तीसरी दुनिया में गरीबी और भुखमरी का गहरा रिश्ता है। बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2022 के अनुसार भारत के बच्चों में कुपोषण की स्थिति गंभीर है। जीएचआई जिन चार पैमानों पर मापा जाता है उसमें से एक बच्चों में गंभीर कुपोषण की स्थिति भी है, जो भारत में इस बार 19.3 फीसदी पाया गया है जबकि 2014 में यह 15.1 फीसदी था। इसका अर्थ है कि भारत इस पैमाने में और पिछड़ा है।

अन्य पैमानों की बात करें तो, बच्चों के विकास में रुकावट से संबंधित पैमाने में भारत 2022 में 35.5 फीसदी है जबकि 2014 में यह 38.7 फीसदी था। वहीं बाल मृत्यु दर 4.6 फीसदी से कम होकर 3.3 फीसदी हो गई है। हालांकि जीएचआई के कुल स्कोर में भारत की स्थिति और खराब हुई है। 2014 में जहाँ ये स्कोर 28.2 था वहीं 2022 में यह 29.1 हो गया है।

बच्चों की यह स्थिति क्यों है, जबकि भारत के विश्व गुरू बनने और बनाने के रोज दावे किए जाते हैं। इसी बात को शायर इब्ने इंशा अपने अंदाज में बच्चोें की तरफ से पूछते हैं- इस बच्चे की कहीं भूक मिटे (क्या मुश्किल है हो सकता है)/ इस बच्चे को कहीं दूध मिले (हां दूध यहां बहतेरा है)/ इस बच्चे का कोई तन ढांके (क्या कपड़ों का यहां तोड़ा है)/ इस बच्चे को कोई गोद में ले (इंसान जो अब तक जिÞंदा है)।

इब्ने इंशा ने ये कविता सत्तर के दशक में आए इथिपोया के अकाल में पीड़ित एक बच्चे का चित्र देख कर लिखी थी। बच्चे की इस अवस्था ने इब्ने इंशा जी को इतना विचलित किया कि उन्होंने उस बच्चे पर इतनी लंबी कविता लिख डाली।
सात छंदों की इस कविता में इब्ने इंशा बच्चे की बदहाली का वर्णन करते हुए बड़ी खूबी से पाठकों के दिलों को झकझोरते हुए उनका ध्यान विश्व में फैली आर्थिक असमानता पर दिलाते हैं और फिर वे ये संदेश भी देना नहीं भूलते कि विभिन्न मजहबों और देशों की सीमाओं में बँटे होने के बावजूद हम सब उसी आदम की संताने हैं जिससे ये सृष्टि शुरू हुई थी। लिहाजा दुनिया का हर बच्चा हमारा अपना बच्चा है और उसकी जरूरतों को पूरा करने का दायित्व इस विश्व की समस्त मानव जाति पर है।

इस कविता को पढ़ना अपने आप में एक अनुभूति है। शायद इसे पढ़ सुन कर आप भी इब्ने इंशा के खयालातों में अपने आप को डूबता पाएं।


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