Friday, May 1, 2026
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जब बच्चा आपकी बात मानने से करे इंकार

कुछ विद्धानों का ऐसा मानना है कि अभिभावक व शिक्षक बच्चों से उसकी क्षमता से ज्यादा न तो अपेक्षाएं रखें, न ही उसके समक्ष बात-बात में आत्म-प्रशंसा करते रहें। वे यह भी ख्याल रखें कि यदि बालक मंदबुद्धि है तो उसके इस अवगुण पर ज्यादा हाय-तौबा न मचाएं। सहज ढंग से ही उसे प्रेमपूर्वक समझाया जा सकता है। उसके आगे ज्यादा तार्किक बनना हानिकारक होगा। यदि इन उपायों को अपनाने के बावजूद बच्चे की यह आदत नहीं सुधरती तब बच्चे को मनोचिकित्सक के पास ले जाया जाना चाहिए।

विपिन कुमार

लोकेश के माता-पिता की शिकायत है कि वह उनकी एक भी बात नहीं मानता। मनोज के मां बाप भी यही शिकायत करते हैं। वे तो यह भी कहते हैं कि उनका बेटा घर में तोड़-फोड़, वस्तुओं को फेंकने, गाली देने, छोटी बहन को पीटने आदि की बुरी हरकतें भी करने लगा है। वास्तव में लोकेश और मनोज तो अपने से बड़े लोगों का विरोध करने वाले बच्चों के प्रतीक हैं। बच्चों में आजकल जो सबसे बड़ी समस्या पाई जाती है, वह है उनके द्वारा अपने माता-पिता व शिक्षकों की अवज्ञा करना। ऐसे बच्चे आगे चलकर समाज विरोधी व अपराधी बन सकते हैं। अपने माता-पिता व शिक्षकों की बच्चों द्वारा अवज्ञा करने के कई कारण हैं। जिन बच्चों के साथ ज्यादा सख्ती का व्यवहार किया जाता है, धीर-धीरे वे इसकी प्रतिक्रि या स्वरूप विद्रोही बन जाते हैं। यदि मां-बाप बच्चे पर पूरा ध्यान न देकर अपने में ही खोएं रहें, तब भी बच्चा उनके प्रति विरोधी भाव रखने वाला बन जाता है।

इस संदर्भ में मुझे एक आश्चर्यजनक घटना की याद आती है। अपने विद्यालय के ही छात्र विनायक (काल्पनिक नाम) का ध्यान मैंने जब एक दिन उसके पिता की शिकायत की ओर दिलाया कि वह (विनायक) उनकी बातों को नहीं मानता है तो विनायक ने साफ शब्दों में कहा-मैं उनकी बात क्यों मानूं? मुझे वे अपना बेटा ही कब समझते हैं? तब मुझे विनायक के उत्तर ने सोचने को बाध्य कर दिया कि यदि बच्चे अभिभावक की बात नहीं मानते तो दोषी सिर्फ वे नहीं। अभिभावक भी बच्चों के सुख-दु:ख व दिनचर्या का ख्याल नहीं रखते।

वे बच्चे भी विद्रोही बन जाते हैं जिन पर अविश्वास किया जाता है। प्रशंसा एक आत्मिक भूख होती है। जब अभिभावक अपने बच्चे पर ही अविश्वास करने लगते हैं तो इससे उसका अहं (ईगो) आहत होता है जिसकी प्रतिक्रि या उनके हृदय में अभिभावक के प्रति घृणा के रूप में व्यक्त होती है और फिर बच्चे अभिभावक की उपेक्षा करने लग जाते हैं।

बच्चों में कभी-कभी यह आदत विरासत में पनप जाती है। जो अभिभावक स्वयं अपने वृद्ध माता-पिता की आज्ञा नहीं मानते, उनसे लड़ते-झगड़ते रहते हैं, उनके बच्चे आज्ञाकारी कहां से बनेंगे? मैंने अपने आस-पास ऐसे दर्जनों उदाहरण देखे हैं। कभी-कभी विद्यालय का प्रतिकूल वातावरण भी बच्चों को विद्रोही बनाने में सहायता प्रदान करता है। यदि शिक्षक अयोग्य हों या वे बच्चों को ठीक से नहीं पढ़ा पाते हों, उनका व्यवहार अनावश्यक रूप से सख्त हो, ज्यादा अनावश्यक बातें करते हों तो बच्चे अन्तत: उनकी अवज्ञा करने लग जाते हैं।

बच्चों के विद्रोही बनने के लिए कुछ-न-कुछ भूमिका आज का सामाजिक जीवन, जिसमें प्रत्येक जगह दोहरापन ही दिखता है, निभाता है। जब बच्चा झूठ, बेईमान, चोर, चुगलखोर लोगों को इज्जत पाते देखता है तो वह तद्नुरूप ही बनना चाहता है। इसकी शुरूआत वह अपने माता-पिता व अभिभावक की अवज्ञा से करता है।

बच्चों के विद्रोही बनने के चाहे जो भी कारण हों, (परंतु) उन्हें नियंत्रित किया जाना अत्यावश्यक है। इसके लिए शिक्षक मां-बाप तथा मनोचिकित्सक सभी अपने-अपने तरह से सहायता कर सकते हैं। बच्चे के आसपास की परिस्थितियां उसे ह्यवैसाह्य बना देती हैं इसलिए उन परिस्थितियों में सुधार करके बच्चे को सहज सुधारा जा सकता है। बाल-मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षाविदों के अनुसार इन उपायों से इस बुरी आदत पर सहज ही नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है। इसके लिए बच्चों को खेलने व खाने-पीने की पूरी छूट मिलनी चाहिए। उन्हें खेलों समेत अन्य सहगामी क्रि याओं में लगाकर क्रि यात्मक एवं रचनात्मक शिक्षा देनी चाहिए। बात-बात में न तो उन्हें आदेश दिया जाना चाहिए, न ही उनकी प्रत्येक गतिविधि पर पुलिस के जासूस की तरह प्रति क्षण अपनी निगाह टिकाए रखनी चाहिए।

अभिभावक ऐसे बच्चों के साथ पूरी सहानुभूति रखें, उन्हें भरपूर प्यार दें। बच्चे के मन में यह भाव बिठाया जाना चाहिए कि वे (माता-पिता व शिक्षक आदि) उसके सच्चे हितैषी हैं। जब बच्चे दस-बारह साल से अधिक उम्र के हो जाएं तो उसकी अनावश्यक जिद्द नहीं माननी चाहिए। ऐसा करने से बच्चे जिद्द द्वारा ही अपनी बात मनवा लेते हैं। खासकर बच्चों की माएं इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार होती हैं। बच्चों को श्रवण कुमार, वारूणि आदि ऐतिहासिक आज्ञाकारी बालकों की कथा पढ़नें को प्रेरित करना चाहिए।

कुछ विद्धानों का ऐसा मानना है कि अभिभावक व शिक्षक बच्चों से उसकी क्षमता से ज्यादा न तो अपेक्षाएं रखें, न ही उसके समक्ष बात-बात में आत्म-प्रशंसा करते रहें। वे यह भी ख्याल रखें कि यदि बालक मंदबुद्धि है तो उसके इस अवगुण पर ज्यादा हाय-तौबा न मचाएं। सहज ढंग से ही उसे प्रेमपूर्वक समझाया जा सकता है। उसके आगे ज्यादा तार्किक बनना हानिकारक होगा। यदि इन उपायों को अपनाने के बावजूद बच्चे की यह आदत नहीं सुधरती तब बच्चे को मनोचिकित्सक के पास ले जाया जाना चाहिए।

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