Friday, March 27, 2026
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झारखंड में क्यों हारी भाजपा?

Samvad 51

झारखंड विधानसभा चुनाव में एग्जिट पोल के पूर्वानुमानों को धता बताते हुए झामुमो तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। बता दें कि इस बार के झारखंड के चुनाव में आइएनडीआइए (इंडिया) और राष्ट्रज्ीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) गठबंधनों के बीच सीधी और जबर्दस्त टक्कर हुई। कांटे की इस टक्कर में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले ‘इंडिया’ गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया। इस चुनाव में इंडिया गठबंधन की ओर से सबसे ज्यादा झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) कुल 34 सीटें जीत कर सबसे आगे रही। वहीं, कांग्रेस ने 16 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि राष्ट्रज्ीय जनता दल (राजद) ने 04 और कम्यूनिष्ट पार्टी आॅफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट लिबरेशन) यानी सीपीआई (एमएलएल) ने 02 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफलता प्राप्त की। इस प्रकार देखा जाए तो इंडिया गठबंधन ने राज्य की कुल 81 में से 56 सीटें प्राप्त कर न केवल अपनी सरकार बचा ली है, बल्कि जबर्दस्त वापसी की है। दूसरी ओर एनडीए गठबंधन को झारखंड चुनाव में एक बार फिर भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

एनडीए गठबंधन के लिए सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 21 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, आॅल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और लोकतांत्रिक जनता पार्टी (लोजपा) रामविलास ने एक-एक सीटों पर जीत दर्ज करने में सफलता पाई है। तात्पर्य यह कि झारखंड विधानसभा चुनाव में एनडीए को कुल 24 सीटें मिली हैं।

एग्जिट पोल में राज्य में बीजेपी और उसकी अगुवाई वाले एनडीए को स्पष्ट तौर पर विजेता के रूप में दिखाया जा रहा था, लेकिन परिणाम बताते हैं कि हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा और इंडिया गठबंधन ने राज्य की जनता को अपने वादों और दावों के प्रति लुभाने में सफलता प्राप्त करते हुए बंपर जीत हासिल की। वहीं, दूसरी ओर बीजेपी अपनी सारी ताकत झोंकने के बाद भी आदिवासियों समेत राज्य की जनता को इंप्रैस नहीं कर पाई। बता दें कि भाजपा ने झारखंड में चुनावों से पहले ‘लव जिहाद’ तथा ‘लैंड जिहाद’ का मुद्दा बेहद जोर-शोर से उठाया था। गौरतलब है कि भाजपा की ओर से की गई हिंदू और मुस्लिम ध्रुवीकरण की कोशिश के बीच हेमंत सोरेन बिल्कुल शांत और उकसाने वाले बयानों से बचते दिखे। यह निश्चित रूप से हेमंत सोरेन की राजनीतिक परिपक्वता को दशार्ता है। हालांकि, उनकी ही पार्टी के कुछ नेता और इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों के कई नेता कई मौके पर लगातार हिंदू-मुसलमान करते अवश्य देखे और सुने गए। इस प्रकार, राज्य में पूरे चुनावी काल में हिंदू-मुसलमान के नाम पर विष-वमन होता रहा।

इन सबके बीच भाजपा का एजेंडा झारखंड में पूरी तरह से फेल होता हुआ दिखाई दिया, जबकि भाजपा ने राज्य में चुनाव प्रचार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों ने ही लाइव रैलियां कीं। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह से लेकर तमाम स्टार प्रचारकों ने कमान संभाल रखी थी। यहां तक कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा राज्य में दो महीने तक जमे रहे, जिन्होंने बांग्लादेश से ‘घुसपैठियों’ को आने देने के लिए सोरेन सरकार पर जोरदार हमले किए। गौरतलब है कि भाजपा ने अपनी रैलियों में झारखंड की ‘माटी, बेटी और रोटी’ का मुद्दा उठाया।

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के भीतर कुछ नए और पुराने नेताओं को लेकर लंबे समय से असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि राज्य के भावी मुख्यमंत्री के रूप में किसे नेतृत्व सौंपा जाए- नए, तेज-तर्रार और युवा नेता को अथवा पुराने, स्थापित और मजे हुए नेता को। ऐसा बताया जाता है कि पार्टी के भीतर कलह और मनमुटाव जारी रहने के कारण इस बात पर एक राय नहीं बन पाई कि झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले उसकी ओर से किस नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत किया जाए। यही कारण है कि बड़ी संख्या में राज्य की गैर-आदिवासी जनता ने भी उसे नकार दिया। बता दें कि किसी भी कार्य में अनिर्णय की स्थिति गलत या बुरे निर्णय से भी अधिक घातक मानी जाती है। राजनीति में तो यह बिल्कुल ही नहीं चलने वाली। इसलिए अब कम-से-कम भाजपा को इसे गंभीरता से लेना होगा और भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए इस बात पर प्राथमिकता से विचार करते हुए पार्टी की ओर से राज्य को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करना ही होगा, अन्यथा पार्टी चाहे जितने भी प्रयास क्यों न कर ले, 2024 दोहराने के लिए राज्य की जनता हमेशा बाध्य होती रहेगी।

यह एक कड़वा सच है कि झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के भीतर ऐसे प्रभावशाली चेहरे का बेहद अभाव है, जो जनता को प्रभावित कर अपनी ओर आकर्षित कर सके। जिस प्रकार, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पार्टी को विजयी बनाने की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले रखी है और जिस प्रकार हरियाणा में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पार्टी के लिए एक जिम्मेदार चेहरा हैं, वैसे ही चुनाव से पहले झारखंड में भी पार्टी को भावी मुख्यमंत्री के रूप में एक जिम्मेदार चेहरा पेश करना चाहिए था।

गौरतलब है कि ऐसा नहीं करके भाजपा ने एक प्रकार से अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारी है, जबकि विपक्ष की ओर से तो पहले ही दिन से यह बिल्कुल साफ कर दिया गया था कि यदि इंडिया गठबंधन ने चुनाव जीता तो उनकी ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा हेमंत सोरेन ही होंगे। हालांकि, ऐसा नहीं है कि भाजपा के भीतर ऐसे लोगों का अभाव है। गौर करें तो पार्टी के भीतर कई नेता हैं, जो हेमंत सोरेन को कड़ी टक्कर देने में सक्षम हैं। यहां तक कि कुछ नेता तो उनसे बेहतर परफॉरमेंस करने की क्षमता और कौशल भी रखते हैं, लेकिन पार्टी की ओर से उन्हें आगे नहीं करने के कारण चुनाव के दौरान मतदाताओं के बीच इस बात को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही कि एनडीए का नेतृत्व कौन करेगा।

गौरतलब है कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 31 जनवरी को 8.36 एकड़ जमीन के अवैध कब्जे से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के सिलसिले में गिरफ्तार किया था। जब हेमंत सोरेन जेल में थे, तो उन्होंने अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को पीड़ित कार्ड खेलने के लिए प्रेरित किया, जिसके पश्चात कल्पना राज्य की आदिवासी जनता के बीच जाकर उनसे अपने विरुद्ध भाजपा शासन द्वारा साजिशें किए जाने की बात बताती रहीं। दूसरी ओर भाजपा इस भ्रम में बैठी रही कि उसकी रणनीति राज्य के विधानसभा चुनाव में सफल हो जाएगी। ऊपर से महत्वपूर्ण चुनावों से ठीक पहले हेमंत सोरेन को जेल से बेल पर छोड़ा जाना भाजपा की सेहत के लिए और घातक हो गया। चुनाव के दौरान हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी ने जम कर पीड़ित कार्ड खेला। झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में इस बार मतदान प्रतिशत रिकॉर्ड स्तर पर रहा। बता दें कि राज्य की 26 आरक्षित सीटों में से 21 सीटों पर जेएमएम प्रत्याशी विजयी हुए, जो यह दर्शाता है कि राज्य के आदिवासी मतदाताओं ने भाजपा को इस चुनाव में बुरी तरह से नकार दिया है।

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