Friday, June 19, 2026
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जाति गोलबंदी और मुफ्त रेवड़ी जीत की गारंटी

Samvad 51

अभी हाल के लोकसभा तथा महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनावों पर यदि गहन दृष्टि डाली जाए तो एक नया और बड़ा परिवर्तन यह देखने को आया कि 2014 से जो चेहरे आधारित चुनाव प्रचार और चुनाव परिणाम का दौर आरम्भ हुआ था वो अब नहीं रहा। इससे पूर्व अब तक के दो लोकसभा एवं एक दर्जन से ज्यादा विधानसभा चुनावों में लगभग सभी चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे के इर्द-गिर्द लड़े गए थे और भाजपा उनके चेहरे को राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का प्रतीक मानकर मतदाताओं के पास जाती रही और विपक्ष नरेंद्र मोदी को लोकतंत्र, संविधान एवं धर्मनिरपेक्षता का विरोधी बता कर चुनावी बिगुल बजाता रहा। उस दौर में जनता ने नरेंद्र मोदी के चेहरे पर वोट दिया और भारतीय जनता पार्टी एक के बाद एक सफलता की सीढ़ियां चढ़ती रही। विपक्ष के चेहरे राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, मायावती लगातार विफल होते रहे। हां ममता बनर्जी और स्टालिन अपना प्रभाव बचाये रखने में सफल रहे।

2023 आते आते नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत तिलिस्म कमजोर पड़ने लगा और कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, बंगाल, पंजाब आदि प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी को सफलता हासिल नहीं हो पाई। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व भी काम करना बंद हो गया। उधर राहुल गांधी को सामने रख कर चुनाव लड़ने का कांग्रेसी अभियान भी खास सफलता हासिल नहीं कर सका। जहां कहीं कांग्रेस को विजय हासिल हुई वहीं स्थानीय समीकरणों एवं नेताओं के कारण संभव हो सकी। 2023 आते आते सभी दल यह समझ चुके थे कि अब चेहरे और सिद्धांत मतदाताओं को आकर्षित नहीं करते हैं और कुछ नया करने की आवश्यकता है। इसी कड़ी में ‘मुफ़्त बांट’ शब्द प्रचलन में आया जिसकी शुरूआत मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह ने विधानसभा चुनावों की पूर्व संध्या से की। इसमें महिलाओं के खाते में प्रत्येक माह एक निश्चित राशि डाली जाने लगी। इसका बड़ा व्यापक असर हुआ और एंटी इंकंबेंसी को धता बतलाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अनपेक्षित विजय हासिल कर ली। यही प्रयोग महाराष्ट्र में शिन्दे सरकार ने लाडली बहना योजना लाकर तथा झारखंड में सोरेन सरकार ने मैया योजना लाकर किया और चुनावों में व्यापक सफलता प्राप्त की।

अब आगे आने वाले चुनावों में सभी सरकारें और दल इसी लाइन पर चलकर अपने अपने शासन में चुनावों से ठीक पहले ऐसी ही मुफ़्त वाली योजनाएं लाया करेंगे और एंटी इंकंबेंसी पर पार पाते हुए चुनाव जीत जाएंगे। चुनाव जीतने के लिए जनता से करों के रूप में प्राप्त धनराशि को मतदाताओं में मुफ़्त में बांटना एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बहुत ही खतरनाक संकेत है। इससे विकास, रोजगार, शिक्षा की जनकल्याणकारी परिकल्पना पर अंकुश लग सकता है। जनता को मुफ्तखोरी की आदत डालना देश को अराजकता की और धकेलने की गंभीर गलती भी सिद्ध हो सकती है।
दूसरा प्रयोग जो मुख्यत: भारतीय जनता पार्टी ने और गौण रूप से विपक्ष ने किया वह था किसी प्रदेश के अपने विरोधी सशक्त जाति समूह के विरुद्ध अन्य जाति समूहों को अपने पक्ष में चुपचाप गोलबंद करना। इंडिया गठबंधन ने यह प्रयोग अभी के लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में सफलता से किया और अब विधानसभा चुनावों में वही प्रयोग भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा में जाटों के विरुद्ध अन्य को गोलबंद करके तथा महाराष्ट्र में मराठों एवं मुस्लिम के विरुद्ध अन्य को एकबद्ध करके सफलता हासिल की। झारखंड में यही गोलबंदी आदिवासियों और अनुसूचित जाति -जनजातियों ने ‘गैर भूमी पुत्रों’ (बाहरी ) के विरुद्ध करके इंडिया गठबंधन को बहुमत दिलाया। जैसे जैसे वक्त बदला है वैसे वैसे चुनावी अभियान के करतब भी बदले हैं। अब नेता लोग ज्यादा रैलियां या सभाएं करने पर जोर नहीं देकर निचले स्तर पर संपर्क एवं व्यवस्था करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। रैलियों में लोग अब आते भी नहीं हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में भी अब उतनी भीड़ दिखाई नहीं देती जितनी पहले होती थी। माइक्रोलेवल बूथ मैनेजमेंट की धारण भारतीय जनता पार्टी ही चुनावों में लेकर आयी थी। अन्य दल भी अब इसी लाइन पर अपना चुनावी अभियान चलाने को मजबूर हो रहे हैं। यह और बात है कि अधिकांश विपक्षी दलों के पास बूथ लेवल पर कार्यकर्ता ही नहीं हैं। चुनावों में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए शराब, भोजन, कंबल, साड़ी पहुंचाने का काम तो बहुत पहले से ही होता आया है किंतु इस बार महाराष्ट्र के चुनावों में बहुत भारी मात्रा में धन का प्रवेश होते भी सुना गया है। पैसा बांटने के वीडियो भी न्यूज चैनलों पर आए हैं। विभिन्न स्थानों और व्यक्तियों से बहुत बड़ी मात्रा में धनराशि जब्त भी की गई है।

तो धन, बल, विभाजन और मुफ्तखोरी अब के और आगे आनेवाले चुनावों में खेल के प्रमुख मोहरे रहने वाले हैं और इन सबके बीच ही हमारे लोकतंत्र को येन केन प्रकरेण जीवित रहना पड़ेगा। चेहरा, विकास और सिद्धांत अब कोई मायने नहीं रखता।

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