
तमेघा गाबा |
टेंशन यानी तनाव सामान्यत: बड़ों के साथ जोड़ा जाता है जबकि आज के समय में यह तनाव बड़ों के साथ साथ बच्चों को भी होता है। बच्चों और बड़ों के तनाव के कारण अलग अलग होते हैं। जब बच्चे तनावग्रस्त होते है तो उनका चुलबुलापन, मुस्कुराहट, खेलने में रूचि कम हो जाती है। इन सबका प्रभाव उनकी कार्यक्षमता पर पड़ता है। आइए देखें बच्चों को किन कारणों से होता है तनाव।
माता पिता का व्यवहार
बच्चे स्वभाव में इतने नाजुक होते हैं। जब कभी वह महसूस करते हैं कि माता पिता दूसरे भाई बहन पर अधिक ध्यान या प्यार दर्शा रहे हैं तो उनके प्रति कम अटेंशन ही उनकी टेंशन का कारण बन जाता है। जब घर में दूसरा नवजात शिशु आता है तब माता-पिता, दादा-दादी, सबका ध्यान उस पर अधिक जाता है। अक्सर सभी उसे नवजात शिशु से दूर रहने, उसे टच न करने की हिदायतें देते हैं, तब भी बच्चा अपने प्रति बदले व्यवहार के कारण तनाव में आ जाता है।
कभी कभी एक ही स्कूल में पढ़ने पर काम्पिटिशन भी रहता है। अगर एक बच्चे का परिणाम अच्छा है और दूसरे का कम, तब भी बच्चे को अहसास दिलाया जाता है कि तुम्हारा भाई बहन तुमसे अधिक आगे है। तब बच्चा हीनभावना से ग्रस्त होकर तनाव में आ सकता है।
बच्चों को होती है पढ़ाई और एग्जाम्स की टेंशन
आज के बच्चों को पहले के बच्चों के मुकाबले अधिक विषय पढ़ने पढ़ते हैं। क्लास में वीकली, मंथली, यूनिट टेस्ट होने के कारण वह सारा साल पढ़ाई से चिपके रहते हैं। क्लास के अतिरिक्त टयूशन टेस्ट, टयूशन वर्क भी उन्हें पूरा करना होता है। ऊपर से माता-पिता का बच्चे को सबसे आगे देखने का सपना। इतने विषयों में अगर एक भी विषय कमजोर हो तो परफारमेंस में अंतर आ जाता है। इन सब कारणों के होते बच्चे पढ़ाई और एग्जाम्स के दिनों में टेंशन में आ जाते हैं।
मानसिक और शारीरिक दंड भी बनाता है बच्चों को तनावग्रस्त
बच्चे स्वभाव और मन से कोमल होते हैं। वे किसी भी शारीरिक या मानसिक दंड को सहन नहीं कर पाते। इनमें से कोई भी स्थिति में वह अपना नियंत्रण खो बैठते हैं, गुमसुम रहने लगते हैं और धीरे धीरे अपने सारे इंटरेस्ट खोने लगते हैं। यह स्थिति स्कूल या घर कहीं भी हो सकती है। बच्चे इतने कोमल ।दय के होते हैं कि किसी और को भी डांट या मार पड़ रही हो, तब भी सहम जाते हैं। इस प्रकार का उन पर या किसी और को दिया दंड भी उन्हें तनावग्रस्त बना सकता है।
माता-पिता की अति व्यस्तता
बच्चों के सबसे नजदीकी माता-पिता होते हैं पर आधुनिक समय में माता-पिता का वर्किग होना भी बच्चों में तनाव का एक कारण हो सकता हैं। जब बच्चे स्कूल से घर आते हैं और माता-पिता दोनों में से किसी एक को भी घर पर न पाकर स्वयं को अकेला महसूस करते हैं। बच्चे माता-पिता का साथ कम पाकर तनाव से घिरने लगते हैं।
अगर संयुक्त परिवार है और घर में कुछ न कुछ तनाव का माहौल बना रहे तब भी बच्चे तनाव में आ जाते हैं। एकल परिवार में भी अगर माता-पिता के आपसी संबंध मधुर नहीं हैं तब भी इसका प्रभाव बच्चों पर पड़ता है और बच्चे तनाव में रहने लगते हैं।
बच्चों के लिए माता-पिता के बाद दोस्त उनके जीवन में अहम होते हैं। अगर किसी कारण दोस्तों में मनमुटाव हो जाए और आपस में बातचीत बंद हो जाए तो यह भी बच्चों में तनाव पैदा करता है।
पॉकेट मनी भी तनाव का कारण बन सकता है:-
स्कूल में हर तरह के बच्चे होते हैं। कुछ बच्चों को पॉकेट मनी ज्यादा मिलती है और कुछ को कम। कुछ बच्चों की मम्मी उन्हें घर से हैल्दी टिफिन व फ्रूट देती है और कुछ बच्चों की मम्मी रोज कैंटीन से खाने के लिए पैसे देती है। ऐसे में पैसों की कमी भी बच्चों को तनावग्रस्त बनाती है। पैसा बड़ों को तो तनावग्रस्त बनाता ही है, बच्चे भी उससे अछूते नहीं हैं।
अपनी लुक्स को भी लेकर आते हैं बच्चे टेंशन में
यह तनाव अधिकतर उन बच्चों में होता है जो 13 वर्ष की उम्र के हैं या उससे थोड़े बड़े। इस उर्म्र में बच्चे अपनी लुक्स के प्रति जागरूक हो जाते हैं अगर कोई मोटा बच्चा है, अधिक पतला या अधिक छोटा तो बाकी बच्चे उसका मजाक बनाते हैं और वह टेंशन के शिकार हो जाते हैं।
गैजेट्स भी देते हैं तनाव
आधुनिक युग में गैजेट्स सुविधाएं तो बहुत देते हैं और हमारे और बच्चों के जीवन का अहम हिस्सा भी हैं जैसे टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर आदि। बच्चे अपना अधिक समय इन पर बिताते हैं। इससे उनके शारीरिक व्यायाम में कमी आई है उनका दिमाग उनमें उलझा रहता है जो उन्हें तनाव देता है क्योंकि गैजेट्स का प्रयोग बच्चे घर पर अकेले रहकर करते हैं दोस्तों से मिलना, उनके साथ न खेलना उनको तनावग्रस्त बनाता है।
पता लगाएं अपने बच्चों में टेंशन के कारणों का:-
-बच्चों के व्यवहार पर ध्यान दें।
-बच्चे अगर लंबे समय तक भूख से कम खा रहे हैं तो ध्यान दें।
-अगर बच्चे चुपचुप रहें।
-पढ़ाई से जी चुराएं।
-चिड़चिड़ापन बच्चों में अगर बढ़ जाए।
-बिना डांट के भी रोना धोना मचाएं।
-बच्चे अगर अकेले रहना पसंद करें, सोचते रहें, अधिक बात न करें।
-बिना मतलब के गुस्से में रहें।
-स्कूल से अधिक शिकायतें आने लगें।
अगर ये कारण बच्चों में दिखाई दें तो उन पर विशेष ध्यान दें। फिर भी फर्क न आए तो साइकेट्रिस्ट से मिलें या बच्चों के डाक्टर से बात करें। समय रहते समाधान ढूंढें।


