Wednesday, January 28, 2026
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आखिर अमेरिका को क्यों चाहिए ग्रीनलैंड

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दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। क्षेत्रफल लगभग 21.7 लाख वर्ग किलोमीटर, लेकिन आबादी सिर्फ 60 हजार के आसपास। यहां का 80 प्रतिशत हिस्सा बर्फ से ढका रहता है। न घने जंगल, न हाईवे, न चमकते शहर। कई महीनों तक सूरज डूबता नहीं और कई महीनों तक रात खत्म नहीं होती। देखने में शांत, ठंडा और वीरान लगने वाला यह द्वीप आज वैश्विक राजनीति के सबसे गर्म मोर्चों में बदल चुका है। वजह है-अमेरिका की पुरानी, लेकिन अब खुली और आक्रामक चाहत। डोनाल्ड ट्रंप का संदेश बिल्कुल साफ है-ग्रीनलैंड चाहिए, हर हाल में चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका को इस बर्फीले, कम आबादी वाले द्वीप की इतनी जरूरत क्यों है और क्या अमरीका इसे हासिल कर पाएगा।

ग्रीनलैंड दुनिया के नक्शे पर ऐसी जगह स्थित है, जो यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के बीच सेतु जैसा काम करता है। उत्तर में आर्कटिक महासागर, पास ही रूस, नीचे यूरोप और पश्चिम में अमेरिका। मतलब साफ है-जो ग्रीनलैंड को कंट्रोल करता है, वह आर्कटिक का चौकीदार बन जाता है। आज युद्ध सिर्फ जमीन पर नहीं लड़े जाते। आसमान, समुद्र, अंतरिक्ष और साइबर स्पेस- हर मोर्चे पर मुकाबला है। ऐसे में ग्रीनलैंड जैसी लोकेशन सोने से भी ज्यादा कीमती हो जाती है। ग्रीनलैंड में अमेरिका पहले से मौजूद है। यहां स्थित थुले एयर बेस (अब पिटुफिक स्पेस बेस) अमेरिकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा है। यहीं से अमेरिका रूस की बैलिस्टिक मिसाइल गतिविधियों पर नजर रखता है, सैटेलाइट ट्रैक करता है, आर्कटिक क्षेत्र की निगरानी करता है। अगर अमेरिका को पूरा ग्रीनलैंड मिल जाता है, तो वह आर्कटिक का फुल कंट्रोल सेंटर बन सकता है।

रूस लगातार आर्कटिक में नए सैन्य ठिकाने, नई पनडुब्बियां, नए एयरबेस और नई मिसाइलें तैनात कर रहा है। ऐसे में अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड रूस पर नजर रखने का वॉच टावर है। आज की दुनिया मोबाइल, चिप्स, इलेक्ट्रिक कार, मिसाइल सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर चल रही है। इन सबकी जान हैं-रेयर अर्थ एलिमेंट्स। बिना इनके आधुनिक तकनीक ठप हो जाती है। लेकिन इन पर अभी चीन का दबदबा है। करीब 60-70 प्रतिशत सप्लाई चीन से आती है। अमेरिका इस निर्भरता से बाहर निकलना चाहता है और यहीं ग्रीनलैंड अहम हो जाता है। इस द्वीप की धरती के नीचे रेयर अर्थ मिनरल्स का बड़ा खजाना छिपा है। अगर अमेरिका को ग्रीनलैंड मिल जाता है, तो टेक्नोलॉजी की जंग में चीन को सीधी चुनौती मिल सकती है।

दुनिया की ऊर्जा भूख खत्म नहीं हुई है। तेल और गैस अब भी वैश्विक राजनीति का ईंधन हैं।
ग्रीनलैंड के आसपास समुद्र की गहराइयों में तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार होने की संभावना है। अभी बर्फ और मौसम खुदाई में रुकावट हैं, लेकिन जैसे-जैसे आर्कटिक पिघल रहा है, ये संसाधन सुलभ होते जा रहे हैं। अमेरिका इसे भविष्य का ऊर्जा बैंक मानकर चल रहा है। ग्लोबल वॉर्मिंग सिर्फ पर्यावरण संकट नहीं, यह भू-राजनीतिक बदलाव भी है। आर्कटिक की बर्फ पिघलने से एशिया से यूरोप जाने के नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं। सफर हजारों किलोमीटर छोटा हो सकता है। इस रूट को कहा जा रहा है-आर्कटिक सिल्क रोड ग्रीनलैंड इस रास्ते का प्राकृतिक गेटवे है। जो इस रूट को कंट्रोल करेगा, वह वैश्विक व्यापार की दिशा तय करेगा। अमेरिका यह मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता।

ग्रीनलैंड पर अमेरिका की नजर नई नहीं है। 1867, 1910, 1946; तीन बार अमेरिका ने डेनमार्क को आफर दिया। 1946 में तो 100 मिलियन डॉलर का सोना तक देने को तैयार था। हर बार जवाब मिला-ना। लेकिन ट्रंप ने डिप्लोमेसी से आगे बढ़कर सीधी जिÞद पकड़ ली-अगर खरीदा नहीं जा सकता, तो दबाव डालो।

बता दें कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। डेनमार्क का साफ संदेश है-ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। ग्रीनलैंड की अपनी सरकार, अपनी संसद और अपनी पहचान है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे डरिक्सन ने अमेरिकी प्रस्ताव को बेतुका बताया। ग्रीनलैंड के नेताओं ने कहा-यह जमीन नहीं, हमारी आत्मा है। यूरोप के देशों ने भी डेनमार्क का समर्थन किया।

ग्रीनलैंड बिकेगा, इसकी संभावना लगभग शून्य है। क्योंकि आज दुनिया सिर्फ ताकत से नहीं, कानून, संप्रभुता और जनमत से चलती है। लेकिन दबाव जारी रहेगा- कभी आर्थिक, कभी कूटनीतिक, कभी रणनीतिक। बहरहाल, अमेरिका, चीन और रूस; तीनों की नजरें इसी बफीर्ली धरती पर टिकी हैं। बाहर से शांत दिखने वाला ग्रीनलैंड असल में भविष्य की वैश्विक राजनीति का रणक्षेत्र है। यह द्वीप तय करेगा कि आने वाले दशकों में कौन सुपरपावर रहेगा।

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