Monday, June 17, 2024
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अफगान में तख्ता पलट पर क्यों मौन रही दुनिया ?

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NAZARIYA 2


PRABHUNATH SHUKLAअफगानिस्तान पर तालिबान ने अपना कब्जा जमा लिया है। अफगान सेना ने बड़ी आसानी से काबूल को भी सौंपते हुए तालिबान लड़ाकों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। राष्ट्रपति अशरफ गनी अपनी जान बचाकर विदेश भाग गए। अब यह तर्क दे रहे हैं कि वह काबूल में खून-खराबा नहीं चाहते थे जिसकी वजह से उन्होंने देश छोड़ दिया। उन्होंने जिस तरह तालिबान के सामने आत्मसमर्पण किया उसकी उम्मीद नहीं थीं। वह एक अकुशल, डरपोक और भगोड़ा शासक साबित हुए। अफगान में तालिबान का तख्ता पलट पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा संदेश है। अफगानिस्तान में तालिबान अब सत्ता में आ गया है। अगर उसे दुनिया के साथ चलना है तो अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा। अब शासन सत्ता और सरकार चलाने के लिए उसे अपने मध्ययुगीन नीतियों में परिवर्तन करना होगा। अफगान जनता की सुरक्षा के लिए बेहतर कदम उठाने होंगे। अफगान में अशरफ गनी की सरकार जो कुछ उन्हें नहीं दे पायी उसे तालिबान को देना होगा। महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर पुनर्विचार करना होगा। उन्हें खुला मंच और खुली आजादी देनी होगी।कट्टर इस्लामिक कानूनों को लादने बजाय उदार नीति अपनानी होगी। अफगान नागरिकों का विश्वास जीतना होगा। पड़ोसी मुल्कों के साथ बेहतर संबंध बनाने होंगे। दुनिया के साथ अच्छा तालमेल बैठाकर शासन करना होगा।

अफगानिस्तान की जनता की खुशी के लिए सब कुछ करना होगा। इसके साथ वहां जो विदेशी नागरिक, कामगार और सैनिक फंसे हैं, उनकी सुरक्षित वापसी उसकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है। दूतावासों की रक्षा उसका नैतिक धर्म है। यह सब कर वह दुनिया का भरोसा जीत सकता है। अफगान फतह के बाद तालिबान ने अपनी नीतियों में बदलाव चाहता है। इसका साफ संकेत भी मिल गया है।

तालिबान ने लड़ाकों को साफ निर्देश दिया है कि अफगान जनता को किसी तरह परेशान न किया जाए। बिना किसी आदेश के उनके घरों में न घूसा जाए। जीत के बाद तालिबान उदार चेहरा दिखाना चाहता है। उसे मालूम है कि वह इस्लामिक कट्टरता के बलबूते दुनिया के साथ बेहतर संबंध नहीं बना सकता है। तालिबानी सत्ता की अधिकृत मान्यता के लिए उसे विश्व बिरादरी की सहमति के साथ देश चलाने के लिए आर्थिक सम्पन्नता बेहद जरूरी होगी। इस हालात में उसे वैश्विक दुनिया का साथ चाहिए।

चीन अफगानिस्तान में तालिबान शासकों मिल कर भारी आर्थिक निवेश करना चाहेगा। अफगानिस्तान के माध्यम से पाकिस्तान को साथ लेकर चीन भारत की नकेल कसना चाहेगा। चीन तालिबान की सत्ता को मान्यता दे सकता है। चीन भारत को किनारे करने के लिए हर मौका तलाश रहा है। ऐसे में भारत सरकार को भी अपनी नीतियां बदलनी होंगी। अमेरिका के इशारे पर नाचना ठीक नहीं होगा। क्योंकि अगर अफगानिस्तान में चीन मजबूत हो गया तो कूटनीतिक लिहाज से भारत के लिए अच्छा अवसर नहीं होगा। भारत अफगानिस्तान में अरबों डालर का निवेश किया है, जिसकी इसकी कीमत उसे चुकानी होगी।

अफगानिस्तान में तालिबान अगर मजबूत हो गया तो चीन पाकिस्तान की मदद से भारत को अस्थिर करने का जाल बुनेगा। क्योंकि दक्षिण एशिया में चीन सिर्फ भारत से डरता है। हाल के दिनों में नेपाल से भी भारत के संबंध अच्छे नहीं रहे हैं। वहां चीन की दखलअंदाजी बढ़ी है, जिसकी वजह से यह भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। भारत को बदले हालात में अपनी नीतियों में बदलाव लाना होगा। भारत को यह बात समझनी होगी कि अमेरिका जैसा देश अफगानिस्तान की मदद क्यों नहीं कर पाया। कूटनीतिक रूप से अमेरिका भी जानता है कि तालिबान में अमेरिका के बजाय चीन की अधिक चलेगी।

चीन और रूस के आपस में बेहद अच्छी जमती है। अफगानिस्तान में अमेरिका दखलअंदाजी चीन और रूस को नहीं पच रही थी। बदले हालात में अफगान में चीन मजबूत होगा जो भारत के लिए शुभ संकेत नहीं है। चीन अफगानिस्तान को आगे कर भारत में आतंकी साजिश रच सकता है। दूसरी तरफ अफगानिस्तान से बेहतर संबंध बनाकर वह आर्थिक निवेश करेगा और दक्षिण एशिया में अपने को कूटनीतिक, राजनीतिक एवं सामरिक रूप से मजबूत करेगा।

तालिबानी शासन को अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन और भारत समेत दूसरे देशों ने मान्यता न देने की घोषणा कि है। लेकिन सवाल उठता है जब तालिबान अफगानिस्तान पर कब्जा कर रहा था तो अशरफ गनी की निगाहें अमेरिका और दूसरे देशों पर टिकी थीं। लेकिन सभी ने चुप्पी साध रखी थी। तालिबान में अनावश्यक रूप से अमेरिकी सैनिक मारे जा रहे थे। तालिबान उन पर हमला कर रहा था। जिसकी वजह से अमेरिका में भी इसकी आलोचना हो रही थी। जिसकी वजह से उसे हटाना पड़ा। सवाल है कि अगर संबंधित देश तालिबान शासन को मान्यता नहीं देना चाहते हैं, लेकिन जब तालिबान अफगानिस्तान पर कहर बरपा रहा था तो लोग चुप क्यों थे।

अफगान पर कब्जे के बाद तालिबान सरकार दुनिया से शांत, सौहार्द, और सद्भाव चाहती है। वह अपनी कट्टर जिहादी स्वरूप को बदलना चाहती है। दुनिया के साथ मिलकर काम करना चाहती है। महिलाओं और युवाओं को आर्थिक रुप से स्वालंबी बनाना चाहती है। कट्टर इस्लामी क्षेत्र से बाहर निकलना चाहती है तो उस हालात में दुनिया को अफगानिस्तान के विकास के लिए सहयोग करना होगा। लेकिन अगर तालिबान अपनी इस्लामिक छवि को नहीं बदलता है तो उसके खिलाफ वैश्विक मंच की लामबंदी बेहद जरूरी है।


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