Thursday, February 12, 2026
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क्या राजनीतिक दल समझेंगे देश का संदेश

Samvad


ghanshyam badalअभी-अभी देश के तीन राज्यों में चुनाव हुए। दो में विधानसभा और एक में म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव संपन्न हुए। तीनों के परिणाम देश के सामने हैं। गुजरात एक बार फिर से मोदी पराक्रम के चलते भारी बहुमत के साथ भाजपा के हाथों गया है और वहां भाजपा ने कांग्रेस का अब तक सर्वाधिक 149 सीट जीतने का रिकॉर्ड भी ध्वस्त किया है और वहां कांग्रेस पिछले बार के मुकाबले घाटे में रही। जबकि ‘आप’ जो चुनाव से पहले वहां सरकार बनाने के दावे कर रही थी और मुफ्त की रेवड़ियों के बल पर सत्ता पाने के सपने देख रही थी इस बार पूरी तरह साफ नहीं हुई है। वहां उसे 5 विधानसभा सीटें मिल गई हैं। हिमाचल प्रदेश में वहां का रिवाज ‘हर बार बदलकर सरकार’ बदस्तूर जारी रहा और कांग्रेस को सत्ता में आने का मौका मिला जबकि एमसीडी के चुनावों में भाजपा के पूरे जोर लगाने के बावजूद भी वह हार गई। अब राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त आम आदमी पार्टी ने वहां बहुमत प्राप्त कर लिया है। यदि इन सारे चुनावों के परिणामों पर एक नजर डालें तो जो बातें उभर कर आती हैं, उनमें एक तो यह है कि आप सत्ता में कितने ही लंबे समय से हैं, यदि काम कर रहे हैं और उस काम का समुचित प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं तथा आपके पास संगठन की शक्ति है और किसी एक व्यक्ति के निर्देश में सभी व्यक्ति काम करने को तैयार हैं तो फिर सत्ता विरोधी लहर भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

हिमाचल ने जो संदेश दिया है वह भी साफ है। लोकसभा चुनाव के लिए इसी हिमाचल में भाजपा को बहुमत दिया था, जबकि जयराम ठाकुर की सरकार के कार्यों को बहुमत देने के लायक नहीं समझा गया। भले ही वोट प्रतिशत में भाजपा और कांग्रेस में केवल 1 प्रतिशत का ही फर्क है, लेकिन सीटों में काफी अंतर है और कांग्रेस को बहुमत से नौ ज्यादा विधायक मिले हैं। अब आते हैं दिल्ली के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनावों पर। भाजपा ने वहां स्थानीय चुनावों में भी अपने राष्ट्रीय प्रचारकों को लगाया और उन्होंने धुआंधार प्रचार किया।

कट्टर ईमानदार पार्टी का नारा देने वाली आप के खिलाफ महाभ्रष्ट पार्टी होने का माहौल खड़ा किया गया। ईडी और दूसरी संस्थाओं के माध्यम से आम आदमी पार्टी के प्रतिष्ठित नेताओं पर प्रहार किया गया, मगर दिल्ली की ग्रामीण जनता ने विशेष तौर पर इन सब बातों पर यकीन नहीं किया और कूड़े के ढेर पर बैठी दिल्ली की सफाई का जिम्मा आम आदमी पार्टी को सौंप दिया। कह सकते हैं कि आम आदमी को भाजपा जैसी खास पार्टी का अरविंद केजरीवाल सरकार को लगातार घेरने व उपराज्यपाल एवं केंद्र की एजेंसियों के माध्यम से उन पर प्रहार करना अच्छा नहीं लगा।

तो एक संदेश और भी साफ है कि जनता चाहती है सरकार किसी की भी हो, पार्टी कोई भी हो, उसे काम करने देने से रोकने वाले को जनता अपना प्यार नहीं देती है। अब यह तो राजनीतिक दलों पर है कि वे इस संदेश को कैसे लेते हैं, लेकिन देश ने अपना संदेश दे दिया है। इसी संदेश के आलोक में 2024 के लोकसभा चुनावों की तैयारियां होंगी। यदि दिल्ली में कूड़े के पहाड़ नहीं हटे तो फिर तय है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को भी वहां के मतदाता उसी कूड़े के पहाड़ के नीचे दबाने में गुरेज नहीं करेंगे। यदि हिमाचल की कांग्रेसी सरकार आपसी सर फुटोवल में लगी रही और काम न हुए तो 2024 का हिमाचल भी पलटी मार सकता है। गुजरात के बारे में कुछ भी कहने से पहले राजनीतिक समीक्षक भी दस बार सोचते हैं। यदि वहां की भाजपा से केवल दो चेहरे हटा दिए जाएं तो भाजपा भी वहां पर दूसरी पार्टियों के ही बराबर आ जाती है।

इन चुनावों में एक बार फिर से सिद्ध किया है कि नेता कितनी ही चतुराई से जनता को बरगलाने की कोशिश करे, अपनी पार्टी को कितना ही ईमानदार देशभक्त या किसी विशेष संप्रदाय के प्रति खास लगाव रखने वाली बताए, खुद को भ्रष्टाचार से एकदम मुक्त एवं दूसरों को भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी बताए,भले ही मीडिया का भी जायज बेजा उपयोग किया जाए, लेकिन जनता को बेवकूफ बनाना आसान नहीं है। हां, यह बात भी सच है कि जब सुनियोजित तरीके से एवं प्रचुर संसाधनों के साथ कोई दल या नेता अपनी बात रखता है तो कहीं ना कहीं उसका फर्क भी पड़ता है, लेकिन यह सोचना कि इन सब के बल पर कोई दल या नेता जनता का ब्रेनवाश पूरी तरह कर सकता है सही नहीं है।

हिमाचल में हो सकता है कांग्रेस को राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का कुछ लाभ मिला हो, लेकिन साथ ही साथ यह भी सच है कि जिन आकांक्षाओं के साथ आम मतदाता ने भाजपा को सत्ता सौंपी थी संभवत उन सपनों को पूरा करने में वहां की सरकार कामयाब नहीं हुई और वहां भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। इन चुनावों के साथ-साथ रामपुर विधानसभा का चुनाव तथा मुलायम सिंह यादव के निधन से रिक्त हुई लोकसभा सीट का उपचुनाव एवं खतौली के उपचुनाव के परिणाम भी वही संदेश देते हैं जो विधानसभा एवं एमसीडी के चुनावों ने दिया।

जब सपा अपने दल एवं समर्थकों के साथ एकजुट होकर चुनाव लड़ी तो पूरी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा उन्हें हरा नहीं पाई। खतौली में मदन भैया का जीतना विपक्षी पार्टियों के लिए एक बड़ा खतरा सिद्ध हो सकता है। रामपुर में यदि पहली बार भाजपा के आकाश सक्सेना जीते हैं तो इसके पीछे आजमखान एवं उनके समर्थकों का हेठी भरा रवैया भी काफी हद तक जिम्मेदार है। जीत तो जीत है, छोटी हो या बड़ी, भारी अंतर से हो या कम अंतर से मगर हर जीत सत्ता के साथ-साथ जिम्मेदारी भी लेकर आती है।


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