Sunday, May 10, 2026
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चुनावी महासमर में बही साम्प्रदायिक सौहार्द की बयार

  • 2013 के दंगे के बाद पहली बार चुनावी मंचों पर नजर आये राम-रहीम
  • जाति-धर्म से इतर पार्टी और प्रत्याशी को देखकर किया मतदान

जनवाणी संवाददाता  |

मुजफ्फरनगर: विधानसभा चुनाव में दांव-पेंच से अलग खास बात यह रही कि इस चुनाव में साम्प्रदायिक सौहार्द की जो आंधी चली, उसने नफरत की दीवार को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। लोगों ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर पार्टी और प्रत्याशी को देखकर मतदान किया।

कहीं भी धर्म या जाति के नाम पर कोई धु्रवीकरण नहीं हुआ। हालांकि, धर्म के कुछ ठेकेदार धु्रवीकरण की बात कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इस चुनाव में आपसी भाईचारा गहराई तक नजर आया। लोगों ने बिना किसी झिझक के जमकर मतदान किया और एक-दूसरे के साथ मिलकर चुनावी समर में शिरकत की।

2013 में हुए साम्प्रदायिक दंगे के बाद जनपद में जाट व मुस्लिमों का समीकरण पूरी तरह ध्वस्त हो गया था। हालांकि इस खाई को पाटने के लिए दोनों ही सम्प्रदाय के जिम्मेदार लोगों द्वारा भरसक प्रयास किये जा रहे थे, परन्तु धर्म व जाति के नाम पर राजनीति करने वाले कुछ लोग इन जख्मों पर नमक छिडकर इन्हें हरा रखने का प्रयास करते थे।

प्रशासन के अलावा कोई संगठनों ने भी लोगों को आपसी भाईचारे से रहने का संदेश दिया। अनेक कार्यक्रमों का आयोजन कर यह दिखाया गया कि भाईचारे से रहने में ही सभी की भलाई है। किसी के कहने में आकर जाति और धार्मिक विद्वेष फैलाने से सभी का नुकसान होता है। किसी भी चुनाव में जाति और धर्म को मुद्दा बनाकर अपना उल्लू सीधा करने की मंशा रखने वाले लोगों के लिए यह चुनाव आईना साबित हुआ है।

जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बांटकर राजनीति करने वालों के लिए भी इस चुनाव में कोई जगह नजर नहीं आई। किसान आंदोलन ने जाट-मुस्लिमों की बड़ाई नजदीकियां भाजपा सरकार द्वारा तीन कृषि कानून लाने के बाद इन कानूनों के विरोध में आंदोलन शुरू हो गये थे।

इस आंदोलन में जाट व मुस्लिमों ने जमकर भागेदारी की और इसी के सहारे दोनों समुदाय के लोगों में नजदीकियां बढ़ती चली गई। सपा-रालोद का गठबंधन होने के बाद दोनों सम्प्रदायके लोग एक प्लेटफार्म पर खड़े नजर आये।

विधानसभा चुनाव में हालांकि, चुनाव के बीच में यह चर्चा भी खूब गर्म हुई कि ऐन वक्त पर वोटों का धु्रवीकरण धर्म व जाति के आधार पर हो सकता है, लेकिन पूरा चुनाव पहले से आखिर तक एक ही तर्ज पर चलता रहा। बता दें कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में लोग इस तरह आपस में अलग हो गये थे कि जैसे दो साम्प्रदायों के बीच खाई पट नहीं पायेगी।

धर्म के ठेकेदारों ने भी इसका खूब लाभ उठाया और अंदरूनी तौर पर लोगों को भड़का कर विद्वेष पैदा किया। लोगों को धीरे-धीरे समझ में आया और दंगे के जो जख्म थे, वह भी समय के साथ भरते नजर आये। इस चुनाव में फिर से पहले की तरह दोनों सम्प्रदायों के लोग कंधे से कंधा मिलाकर एकसाथ खड़े नजर आये। पार्टी और प्रत्याशी के आधार पर वोट डाले गये|

जबकि धर्म और जाति के आधार को लोगों ने सिरे से खारिज कर दिया। जैसे मुस्लिम मतों का अधिकांशत: गठबंधन प्रत्याशी की तरफ रूझान नजर आया। इसी तरह बसपा का पारम्परिक वोट दलित भी बसपा के पाले में जाता रहा।

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