Sunday, May 26, 2024
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मजदूरों का समर्पण

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Amritvani 5


उन दिनों मास्को के कुछ हिस्सों में रेल लाइन टूट गई थी। उसे मरम्मत करना जरूरी था। रूसी मजदूरों ने उस वक्त अपनी शनिवार की छुट्टी को, जो कानूनन उन्हें मिलती थी, अपनी मर्जी से राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। उस दिन भी वे काम पर आते थे। उनके नेता लेनिन उनका उत्साह बढ़ाते रहते थे। वे कहते थे कि साम्यवादियों का श्रम समाज निर्माण के लिए होता है। वह किसी इनाम या सम्मान की इच्छा से नहीं, बल्कि समाज के हित में अर्पित किया जाता है। उन दिनों लेनिन के गले में तकलीफ थी क्योंकि एक गुमराह साम्यवादी लड़की ने उन पर छर्रे भरी पिस्तौल चला दी थी। कुछ छर्रे तो निकाल दिए गए, लेकिन कुछ गले में ही रह गए थे जो बहुत कष्ट देते थे। फिर भी लेनिन इस तकलीफ की परवाह न करते हुए मजदूरों का साथ देने के लिए स्वयं अपने कंधों पर लट्ठे उठाकर सुबह से शाम तक काम में जुटे रहते थे। उन्हें काम करते देख मजदूरों में उत्साह का संचार तो होता था, लेकिन उन्हें यह अजीब लगता था कि लेनिन खुद भी काम रहे हैं, जबकि उनके गले में तकलीफ थी। मजदूर मना करते और कहते कि आप कोई हल्का काम कर लें, किंतु लेनिन नहीं मानते। साल भर तक इसी प्रकार अपने अवकाश के दिनों को बिना किसी इनाम या मजदूरी के उन श्रमजीवियों ने व्यय किया और लेनिन ने भीषण शारीरिक कष्ट के बावजूद उनका साथ दिया। जब यह कार्य संपूर्ण हुआ और लेनिन ने कहा, मजदूरों का यह त्याग एक महत्वपूर्ण घटना है। साथ ही उन कर्मचारियों के लिए प्रेरणादायक है, जो काम करने के लिए हफ्ते में पांच दिन ही तय करने की मांग करते हैं और उन पांच दिनों में से भी आधा दिन अपने निजी काम निपटाते रहते हैं। वर्तमान में देखें तो यह भावना कहीं गायब हो गई है। हम अतिरिक्त काम नहीं कर सकते, लेकिन वह काम तो ईमानदारी से करना ही चाहिए, जिसका पैसा हम लेते हैं।


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