
भले ही अमेरिका के सामने यूक्रेन को मजबूरी में कोई समझौता करना पड़े पर इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं कि व्हाइट हाउस की हालिया घटना से यूक्रेन के राष्ट्रपेति वालोडियर जेलेंस्की रातोंरात हीरो बनकर उभर गए हैं। राजनीतिक विश्लेषक चाहे खुलकर नहीं कहें, पर इससे अब नकारा नहीं जा सकता कि जेलेंस्की ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से वार्ता के दौरान तीखी बहस और तेवर दिखाये हैं। दबी जुबान से ही दुनिया के देशों ने इसे सराहा ही है। एक मजे की बात यह कि अब तक अमेरिका का पिछलग्गू माना जाने वाला यूरोप भी अब अमेरिकी तानाशाही के खिलाफ खुलकर सामने आने लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तानाशाही व्यवहार को देखते हुए योरोपीय आयोग की अध्यक्ष उसुर्ला वॉन डेर लेयेन ने तो लेवेंस्की को यहां तक विश्वास दिलाया है कि आप अकेले नहीं हैं प्रिय राष्ट्रपति। मजबूत बनें, निडर बनें। हम न्यायपूर्ण स्थाई शांति के लिए आपके साथ काम करना जारी रखेंगे।
यूरोप के तो करीब करीब सभी देश यूक्रेन के पक्ष में खुलकर आ गए हैं। चाहे वह फ्रांस हो, पोलण्ड हो, जर्मनी हो, नार्वे हो, स्पेन, इटली हो, एस्टोनिया हो या अन्य देश। सभी ने एक स्वर में यूक्रेन का साथ और सहायता देने का संकल्प दोहराया है। यूरोपीय संघ तो ट्रम्प को छोड़ कोई नया नेता ढूंढने पर विचार आरंभ कर दिया है। देखा जाए तो अमेरिका की छवि बीच चौराहे पर साथ छोड़ देने वाले देश की बनती जा रही है। कल तक रूस का धुर विरोधी अमेरिका रूस के साथ प्यार की पींगें बढ़ाता दिख रहा है तो दूसरी और यूक्रेन जोकि अमेरिका और अन्य देशों के भरोसे ही अदम्य साहस का परिचय देते हुए रूस को लोहे के चने चबवा रहा है, उस यूक्रेन और यूक्रेन के नागरिकों के साहस को नमन करने के स्थान पर आज अमेरिका यूक्रेन को रूस के सामने झुकने को बाध्य करना चाहता है।
दरअसल अमेरिका की नजर दुनिया के देशों और उनकी संपदाओं पर है। खासतौर से अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप दुनिया के देशों को डंडे के जोर पर हांकना चाहते हैं। ट्रंप चाहते हैं कि जो अमेरिका चाहे वही हो, यही कारण है कि एक और टैरिफ वार पर दुनिया के देशों को झोंक दिया है तो दूसरी ओर ग्रीनलैंड हड़पना चाहता है। कनाडा को 51वां राज्य बनाना चाहता है। यूक्रेन के हजारों करोड़ डॉलर की खनिज संपदा पर नजर गड़ाये ट्रंप यूक्रेन को 500 करोड़ डालर की खनिज संपदा पर समझौता करना चाहते हैं। यूक्रेन राष्ट्रप्रति देश के व्यापक हित में समझौता करने को तैयार होने के बावजूद जिस तरह से वार्ता के दौरान ट्रंप ने तेवर दिखाए, उसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है। यही कारण है कि वार्ता के दौरान जिस तरह के तेवर जेलेंस्की ने दिखाया, उसे सारी दुनिया ने इसलिए सराहा कि एक तानाशाह को कम से कम चुनौती देने वाला तो मिला। भले ही इसके परिणाम कुछ भी हों। यूक्रेन को अमेरिका से समझौता करना पड़े पर एक बार अमेरिका और दुनिया के देशों को जेलेंस्की ने एक संदेश तो दे ही दिया। यहां तक कि रूस को भी इससे कम सबक नहीं मिला है। यूक्रेन की नैतिक विजय इसी को माना जा सकता हे कि आज यूक्रेन की खनिज संपदा के समझौते को विफल करने के लिए रुस अपनी खनिज संपदा के अधिकार तक देने की पेशकश करने लगा है। यह यूक्रेन की अपने आप में बड़ी विजय के रूप में देखी जानी चाहिए।
देखा जाए तो ट्रंप तानाशाही रवैया अपनाते हुए दुनिया के देशों को डराने धमकाने में लगे हुए हैं। हालांकि चाहे टैरिफ नीति हो या उपनिवेशवादी सोच देर सबेर इसका खामियाजा अमेरिका को ही भुगतना पड़ेगा और व्हाइट हाउस में ट्रंप और जेलेंस्की के बीच तीखी बहस और नोकझोंक से दुनिया के देशों में साहस का संचार हुआ है। व्हाइट हाउस की घटना का तात्कालिक परिणाम ही यह सामने आ गया है कि यूरोप के देश एक स्वर में यूक्रेन के साथ खड़े होने लगे हैं तो दूसरी और अपना नया नेता चुनने पर विचार करने लगे हैं। हालांकि जेलेंस्की ने देश हित को पहली वरियता दी है और अमेरिका से अब भी खनिज संपदा के अधिकार देने पर सहमति समझौता करने को लगभग तैयार है। पर अमेरिका दबाव बनाकर और डरा धमकाकर समझौता करना चाहता है। यही कारण है कि समझौते के प्रारूप पर चर्चा करने आए जेलेंस्की को ही रूस यूक्रेन युद्ध का जिम्मेदार बताते हुए तीखी नोंकझोंक तक हालात पहुंच गए और जेलेंस्की की हिम्मत की इसलिए सराहना करनी होगी कि अमेरिका के आगे नाक रगड़ने की जगह वार्ता छोड़कर यूरोपीय देशों की यात्रा पर आ गए। भविष्य में क्या होता है, यह तो अलग बात है और उसके कारण इंटरनेशनल पॉलिटिक्स और रिलेशंस तय करेंगे, पर ट्रंप को वार्ता की टेबल पर अपनी और देश की गरिमा बनाए रखकर दुनिया के देशों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि चाहे कोई कितना भी ताकतवर हो हमें उसके गलत दबाव में नहीं आना चाहिए। यही कारण है कि मानो या ना मानो, पर आज ट्रंप से ज्यादा जेलेंस्की के साहस की सराहना हो रही है।


