Sunday, September 19, 2021
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30 करोड़ खर्च, सात साल से बंद पड़ी पशु वधशाला

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  • पब्लिक के टैक्स का पैसा, अफसर लगा रहे ठिकाने, जब पशु वधशाला बंद तो दुकानों पर कहां से सप्लाई हो रहा मीट ?
  • निगम और खाद्य अफसरों के बीच फंसा पशु वधशाला संचालन का मामला

शेखर शर्मा |

मेरठ: पब्लिक की गाढ़ी कमाई का पैसा जो टैक्स के तौर पर सरकारी खजाने में पहुंचा तो उसको ठिकाने कैसे लगाया जाता है? यह सीखना है तो कोई नगर निगम के अफसरों से सीखे। हापुड़ रोड पर पशु वधशाला के नाम पर करीब 30 करोड़ ठिकाने लगाकर निगम अफसर हाथ झाड़कर बैठ गए हैं।

वहीं, दूसरी ओर पशु वधशाला के संचालन की बात की जाए तो प्रदेश सरकार की नयी पशु कटान नीति के बाद अब पशु वधशाला संचालन का मसला नगर निगम और एफएसएसएआई (खाद्य एवं औषधी प्रशासन विभाग) के बीच फंसकर रह गया है।

ऐसा साल 2019 के बाद हुआ है, लेकिन पशु वधशाला के नाम पर 30 करोड़ की रकम निगम अफसर पहले ही ठिकाने लगा चुके थे।

पशु वधशाला के नाम पर पब्लिक के टैक्स के पैसे को यूं ठिकाने लगाने के पीछे एक बड़ी वजह दो पूर्व मंत्रियों याकूब कुरैशी व आजम खान के बीच की अदावत भी कम जिम्मेदार नहीं।

इसके चलते साल 2013 में हापुड़ रोड स्थित पुराना कमेला बंद करा दिया गया। उसके बाद मीट के शौकीनों की मांग के नाम पर घोसीपुर में 30 करोड़ की लागत से निगम प्रशासन ने नयी पशु वधशाला बना दी। यह बात अलग है कि कारोबारी कारणों से पशु वधशाला को चलने नहीं दिया गया।

आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश खुराना जो अवैध कटान को लेकर काफी लिखा पढ़ी करते हैं, ने सवाल उठाया कि जब सरकारी पशु वधशाला सात साल से बंद है तो शहर की करीब एक हजार दुकानों पर मीट की सप्लाई कौन कर रहा है? जबकि यदि लाइसेंस की बात की जाए तो केवल करीब 200 लाइसेंस हैं।

इन पर भी केवल तय संख्या में पशु वध की अनुमति है तो एक हजार दुकानों पर मीट कहां से आ रहा है। अफसरों पर भी इसका जवाब नहीं है। हालांकि एफएसएसएआई के पास करीब 850 लाइसेंस के लिए आवेदन लंबित हैं।

करीब एक हजार आंकी जा रही दुकानों पर अवैध रूप से मीट की सप्लाई कैसे और कहां से की जाती है? इसका अनुमान बीते तीन सालों के दौरान पुलिस द्वारा अवैध कटान की 1600 एफआईआर से लगाया जा सकता है।

ये वो मामले हैं जिनमें लिखा पढ़ी की गयी है, लेकिन इससे कई गुना ज्यादा ऐसे मामले लोकेश खुराना बताते हैं। जिनमें खाकी बजाय लिखा पढ़ी करने के सेटिंग के बाद गेटिंग कर रफादफा करना मुनासिब समझती है।

घर-घर में मिनी कमेला

सरकारी पशु वधशाला भले ही सात साल से बंद पड़ी है, लेकिन शहर के लिसाड़ीगेट, ब्रह्मपुरी, नौचंदी, मेडिकल, इंचौली, कंकरखेड़ा सरीखे इलाकों में बड़ी तादात में अवैध मिनी कमेले संचालित किए जा रहे हैं। लिसाड़ीगेट और ब्रह्मपुरी थाना क्षेत्र तो मिनी कमेलों के लिए खासा बदनाम है।

ये मिनी कमेले में अवैध रूप से किए जाने वाले पशु कटान कर मीट तमाम दुकानों पर सप्लाई किया जाता है। ऐसा नहीं कि इसकी जानकारी बडे अफसरों का न हो। यह बात अलग है कि जानबूझ कर अफसर नींद में गाफिल नजर आते हैं।

विधानसभा में उठ चुका है प्रकरण

अवैध मिनी कमेलों में किए जाने वाला पशु वध का मामला सूबे की विधानसभा में भी उठ चुका है। जिसमें नगर विकास विभाग ने प्रदेश सरकार की नयी पशु वध नीति की आड़ लेकर इसके खिलाफ कार्रवाई के नाम पर पल्ला झाड़ लिया।

हाईकोर्ट में नहीं हो सकी कमेले मामले की सुनवाई

हाईकोर्ट में शहर में अवैध कटान व सरकारी पशु वधशाला को लेकर दायर की गयी जनहित याचिका पर मंगलवार को सुनवाई नहीं हो सकी।

पहले इस पर सुनवाई के लिए मंगलवार 14 सितंबर का दिन तय किया गया था, लेकिन कोर्ट में अन्य महत्वपूर्ण बताए जा रहे मामलों की सुनवाई के चलते इस जनहित याचिका की सुनवाई का नंबर नहीं लगा सका। यह जनहित याचिका आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश खुराना ने दायर की हुई है।

ये कहना है अभिहित अधिकारी का

एफएसएसएआई की अभिहित अधिकारी अर्चना धीरान का कहना है कि अवैध कटान रोकना उनके विभाग का काम नहीं। उनके विभाग का काम केवल लाइसेंस जारी करना भर है।

ये कहना है नगर निगम प्रशासन का

नगर निगम प्रशासन की यदि बात की जाए तो नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. ब्रजपाल सिंह का कहना है पशु वधशाला का मामला अब निगम से लेकर खाद्य प्रसंसकरण विभाग को दे दिया गया है। अवैध कटान पुलिस रोके।

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