- चुनाव से पहले पाला बदलने वाला कोई भी प्रत्याशी नहीं जीता
वरिष्ठ संवाददाता |
सहारनपुर: चुनाव से ऐन वक्त पहले दल बदलने वाले नेताओं को मतदाताओं ने नकार दिया। सहारनपुर में दल बदल कर चुनाव लड़ने वाला एक भी उम्मीदवार जीत का स्वाद नहीं चख सका। .यहां तक कि दो बार मंत्री रह चुके और कद्दावर नेता डाक्टर धर्म सिंह सैनी को भी हार का सामना करना पड़ा है।
चुनाव से पहले सहारनपुर में खूब उठापटक हुई। कई नेताओं ने पाला बदल लिया। सबसे पहले बात करते हैं डाक्टर धर्म सिंह सैनी की। सैनी पांच साल तक भाजपा सरकार में मंत्री रहे। लेकिन, स्वामी प्रसाद मौर्य के प्रभाव में आकर उन्होंने भी चुनाव से पहले सपा ज्वाइन कर ली।
अपनी पारंपरिक सीट नकुड़ से धर्म सिंह चुनाव लड़े जरूर पर उन्हें मामूली अंतर से ही सही भाजपा के मुकेश चौधरी ने चुनाव हरा दिया। करीब 350 वोटों से मुकेश विजयी हुई। इसी सीट पर बसपा के टिकट पर साहिल खान ने चुनाव लड़ा। पांच साल तक सपा के झंडाबरदार रहे साहिल को जब अखिलेश ने टिकट देने से इंकार कर दिया तो वह हाथी पर सवार हो गए|
और आनन-फानन टिकट ले आए। साहिल इस सीट पर तीसरे नंबर पर रहे। धर्म सिंह की हार के पीछे साहिल का बड़ा हाथ है। उन्होंने मुस्लिम वोटो में ज्यादा ही सेंधमारी कर ली। कभी मायावती के खासमखास रहे जगपाल सिंह ने चुनाव से पहले बसपा को कुट्टी कर भाजपा ज्वाइन की। भाजपा ने उन्हें देहात सीट से प्रत्याशी बनाया लेकिन, जगपाल भी सपा प्रत्याशी आशू मलिक के सामने पस्त हो गए। उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
रामपुर मनिहारान सीट की बात करें तो यहां बसपा के टिकट पर रविंद्र मोल्हू चुनाव लड़े। मोल्हू कुछ समय पहले भाजपा में शामिल हो गए थे। लेकिन, ऐन वक्त पर पुन: बसपा में आ गए। आखिरकार, उन्हें भाजपा प्रत्याशी देवेंद्र निम ने पराजित कर दिया। अब बात करते है|
बेहट से भाजपा प्रत्याशी नरेश सैनी की। नरेश कांग्रेस से 2017 के चुनाव में विधायक थे। लेकिन, वह इस दफा भाजपा में शामिल हो गए। टिकट भी ले आए। लेकिन, बेहट सीट पर सपा प्रत्याशी उमर अली खान ने उन्हें पराजित कर दिया। शहर सीट पर मनीष अरोड़ा बसपा के टिकट पर लड़े वह भी चुनाव हार गए। मनीष पहले कांग्रेस में थे।
चुनाव के वक्त वह बसपा में शामिल हो गए। बहरहाल, पाला बदलने वाले किसी भी नेता को जीत नसीब नहीं हुई। मतदाताओं ने उन्हें लगभग नकार ही दिया। रामपुरसीट पर ही विवेककांत रालोद-सपा गठबंधन के प्रत्याशी थे। चुनाव से पहले विवेक कांग्रेस में थे। लेकिन, इमरान मसूद के साथ वह भी पाल बदल लिए। इस सीटपर विवेक ने अच्छी लड़ाई लड़ी किंतु उन्हें भी हार का मुंह देखना पड़ गया।

