Wednesday, March 4, 2026
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जिंदगी के मायने

 

Ravivani 4


Chanchal Shakshi‘जिंदगी शायरी नहीं होती है।’, उसने बहुत ही प्रूविंग टोन में कहा। मैं एकटक उसे देखती रही। वह देर तक मेरे दिमाग में गूंजता रहा।
‘जिंदगी शायरी नहीं है…।’मैं मन ही मन बुदबुदा पड़ी। तभी एक सवाल मेरे जेहन में उभरा, ‘आखिर जिंदगी क्या है?’
मेरी नजरें उसकी तरफ उठी, वह जा चुका था। मेरे जेहन में फिर कुछ शब्द चहलकदमी करने लगे, कुछ विचार मन को झकझोरने लगे-‘किसी को दिलोजान से चाहना, उसकी कही हर बात को मानना, जैसे हवा का बहना, बिना किसी जोर-जबरदस्ती एक फ्लो में, न्योछावर कर देना खुद को जैसे झर-झर बहता झरना और अपने वजूद को इस कदर भूल जाना कि मैं में मैं शेष रहे ही न, जैसे कि किसी बर्तन में पानी और फिर भी विश्वास के बदले विश्वास का नहीं मिलना… प्रेम के बदले प्रेम का नहीं मिलना ये है जिंदगी?’

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मैं सोचती रही, एक विचार श्रृंखला चल रही थी, ‘कुछ सवाल हमें जवाब से ज्यादा सहूलियत देते हैं तो हम लपक कर सवाल को अपने मन के बस्ते में बंद कर लेते हैं। जैसे कल्पना करके हम मुस्कुरा पड़ते हैं उस कल्पना का आधार भले शून्य हो पर मन को तसल्ली मिलती है।’

बाहर का मौसम मेरे मन के मौसम से ज्यादा शांत दिख रहा था। मैं अपने मन को लॉक करने की कोशिश में इधर-उधर देखने लगी। आंखों के लेंस एडजस्ट होने में कुछ ज्यादा वक़्त लग गया।

सोच रही हूं कि कितना सुंदर है ये प्रकृति का साथ… , मालती पर कोमल पत्तियां आने लगी हैं। इन नन्हे पत्तों में देख रही हूं अपने बचपन को। मन में फिर विचार आया, ‘बचपन में हमारी काया और हमारा मन कितना कोमल होता है, एकदम कोमल पत्तों की तरह। प्रकृति ने इन पौधों को मौसम के अनुकूल बदलने का फलने-फूलने का कितना सुंदर वरदान दिया है। सबसे अच्छी बात ये एक ही जीवन में बचपन को कई बार देखते हैं।’

‘हां…पर पतझड़ भी तो है।’ मन के एक कोने से आवाज आई। मन के संवाद में मन ही पक्ष और मन ही विपक्ष में बोलता है और आत्मा रूपी जज निर्णय लेता है, आखिर निष्कर्ष क्या होगा? सोचना बहुत मुश्किल है। मेरी आंखों में एक चमक सी आ गई|

जिंदगी मौसम के अनुसार बदलती प्रकृति है और प्रकृति द्वारा किया जाने वाला प्रेम है, ठीक उसी प्रकार हमारे अपने हमें धोखा दें या प्रेम करें, हमारा काम है प्रेम करना, ठीक इन पौधों की तरह। मन फिर से कह उठा। मैं मुस्कुराती हुई उसी ओर चल पड़ी जिधर वह गया था।

चंचल साक्षी


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