Monday, April 13, 2026
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तरबूज की खेती से किसानों को मिलेगी संजीवनी

  • तरबूज की खेती से कम लागत में ज्यादा मुनाफा
  • गर्मियों में बढ़ जाती है इस फल की बिक्री
  • लगभग 25 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान में तरबूज का अच्छे से होता है विकास

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: तरबूज खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में की जाती है। अन्य फलों के फसलों के मुकाबले इस फल में कम समय, कम खाद और कम पानी की आवश्यकता पड़ती है। जिले में गर्मियों के मौसम की शुरुआत में किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर तरबूज की खेती की जाती है।

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इस दौरान बाजार में तरबूज के फल की बेहद मांग रहती हैं। ऐसे में किसान इसकी खेती कर अच्छा खासा मुनाफा कमा सकता है। गर्मियों में खुद को डिहाइड्रेशन से बचाने के लिए तरबूज के फल का भरपूर सेवन किया जाता है। ऐसा होने से किसानों का मुनाफा अपने आप लाखों के पार पहुंच जाता है।

उपयुक्त जलवायु और मिट्टी

इसकी खेती के लिए गर्म और औसत आर्द्रता वाले क्षेत्र सबसे उपयुक्त होते है। लगभग 25 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान में इसका विकास अच्छे से होता है। वहीं, रेतीली और रेतीली दोमट भूमि इसकी खेती के लिए सबसे बेहतर मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार खेती खाली स्थानों में क्यारियां बनाकर करना सबसे फायदेमंद है।

खेत की तैयारी

खेती की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। खेतों में पानी कम या ज्यादा नहीं होना चाहिए। मिट्टी में गोबर की खाद को अच्छी तरह मिला दें। अगर रेत की मात्रा अधिक है, तो ऊपरी सतह को हटाकर नीचे की मिट्टी में खाद मिलाना चाहिए।

बुवाई का समय

जलवायु और परिस्थितियों के अनुसार पहाड़ी, मैदानी और नदियों वाले क्षेत्र में तरबूज की खेती अलग-अलग महीने में की जाती है। जहां उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में तरबूज की बुवाई फरवरी और मार्च में की जाती है। इसके अलावा नदियों के किनारों पर बुवाई नवम्बर से मार्च तक करनी चाहिए। वहीं, पहाड़ी क्षेत्रों में मार्च से अप्रैल तक बुवाई करने की सलाह दी जाती है।

तरबूज में जड़ से संबंधित रोग और उपचार

ज्यादातर किसान ऊपर पत्तियां देखते रहते हैं, लेकिन जड़ की तरफ ध्यान नहीं दे पाते। जबकि सबसे ज्यादा खतरा वहीं रहता है। ऐसे में अगर तना (जड़) गलन रोग लगा है तो उसके प्रबंधन के लिए जैविक विधियों में ट्राईकोडमा और स्यूडोमोनास का घोल 5-5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर पौधों की जड़ों के पास डालें, लेकिन उसमें थोड़ा गुड़ का घोल जरूर मिला लें।

गुड़ से ये जैविक बैक्टीरिया जल्दी बढ़ते हैं। अगर इससे समधान नहीं होता है तो रासायनिक कीटनाशकों में कार्बेन्डाजिम, थिरम 2 ग्राम प्रति लीटर का उपयोग करें। तरबूज की खेती ज्यादातर बलुई मिट्टी, बलुई दोमट और दोमट मिट्टी में होती है। जिसमे कई बार जड़ में दीमक या व्हाइट ग्रब (सफेद गिडार) जैसे कीट का प्रकोप हो सकता है।

तरबूज की बेहतरीन किस्में और उनकी खासियत

पूरे देश में रबी फसल की कटाई का काम चल रहा है। मार्च तक कटाई का काम पूरा कर लिया जाएगा और इसके बाद खेत खाली हो जाएंगे। ऐसे में किसान तरबूज की खेती करके अच्छा-खासा मुनाफा कमा सकते हैं। तरबूज की खेती की खास बात ये हैं इसे कम पानी, कम खाद और कम लागत में उगाया जा सकता है।

वहीं बाजार में इसकी मांग होने से इसके भाव अच्छे मिलते हैं। किसान रबी और खरीफ के बीच के समय में अपने खेत में तरबूज की खेती करके करीब सवा 3 लाख रुपए तक कमाई कर सकते हैं, बेशर्त हैं कि तरबूज की उन्नत किस्मों की बुवाई करें और खेती का सही तरीका अपनाएं।

शुगर बेबी

इस किस्म के फल बीज बोने के 95-100 दिन बाद तोड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं, जिनका औसत भार 4-6 किलोग्राम होता है। इसके फल में बीज बहुत कम होते है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 200-250 कुंतल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

आशायी यामातो

यह जापान से लाई गई किस्म है। इस किस्म के फल का औसत भार 7-8 किलोग्राम होता है। इसका छिलका हरा और मामूली धारीदार होता है। इसके बीज छोटे होते है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 225 कुंतल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

डब्लू-19

यह किस्म एनआरसीएच द्वारा गर्म शुष्क क्षेत्रों में खेती के लिए जारी की गई है। यह किस्म उच्च तापमान सहन कर सकती है। इससे प्राप्त फल गुणवत्ता में श्रेष्ठ और स्वाद में मीठा होता है। यह किस्म 75-80 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 46-50 टन तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

पूसा बेदाना

इस किस्म की सबसे बङी विशेषता यह है कि इसके फलों में बीज नहीं होते हैं। फल में गूदा गुलाबी व अधिक रसदार व मीठा होता है यह किस्म 85-90 दिन में तैयार हो जाती है।

अर्का मानिक

इस किस्म का विकास भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बंगलौर द्वारा किया गया है। यह एन्थ्रेक्नोज, चूर्णी फफूंदी और मृदुरोमिल फफूंदी की प्रतिरोधी किस्म है प्रति हेक्टेयर 60 टन तक उपज दे देती है।

अर्का ज्योति

इस किस्म का विकास भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बंगलौर किया गया है। इस किस्म के फल का भार 6-8 किलोग्राम तक होता है। इसके फलों की भंडारण क्षमता भी अधिक होती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 350 कुंतल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

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