
भारतीय रेल, पुलिस-फौज, दमकल वगैरह साल में 365 दिन चौबीसों घंटे काम कर सकते हैं, तो सरकारी कार्यालयों को आए दिन अलां-फलां मौकों-अवसरों के चलते बंद क्यों किया जाता है? इससे आम जनता को जो परेशानी होती है, सो अलग। रोज-रोज छुट्टियों से फैसलों में देरी और नतीजतन विकास की गति धीमी पड़ जाती है। असल में, छुट्टियों के मामले में काफी हद तक सरकारी क्षेत्र को निजी क्षेत्र से सीखने की जरूरत है, क्योंकि जायज नहीं लगता कि एक निजी कामगार काम में जुटा है, उधर दूसरा सरकारी बंदा आराम फरमा रहा है। ऐसे में, देश और समाज कैसे तरक्की कर सकता है? भारत को आर्थिक मोर्चे पर सुदृढ़ बनने के लिए काम तो करना होगा, काम का कोई शॉर्टकट नहीं है, और छुट्टियां तरक्की को हासिल करने का जरिया हरगिज नहीं हैं।
अपने देश में सालाना 21 सार्वजनिक अवकाश होते हैं, जबकि दुनिया के 195 देशों में हर साल औसत 11 सार्वजनिक अवकाश ही होते हैं। सवाल है कि आॅटो-रिक्शा वाले, या खोमचे- ढाबे वाले, या फिर कारोबारी, अगर काम पर आ कर दशहरा, दीवाली, गुरुपूरब, ईद जैसे बड़े त्योहार भी मना सकते हैं, तो फिर सरकारी कर्मियों को इतनी छुट्टियों की जरूरत क्यों है?
गत गुरुवार (14 अप्रैल) और शुक्रवार (15 अप्रैल) सार्वजनिक अवकाश यानी पब्लिक हॉलिडे रहे, फिर शनि-रविवार साप्ताहिक अवकाश मिलाकर चार दिन सरकारी छुट्टियां रहीं। लगातार छुट्टियों के ऐसे मौके हर साल दो-चार बार आते हैं। खुदा-न-खास्ता कोई हड़ताल या बंद जुड़ गया, तो छुट्टियां और बढ़ जाती हैं। हमारे देश में पहले से छुट्टियां कम नहीं हैं, ऊपर आलम यह है कि वोट बैंक को लुभाने के लिए नए-नए समुदायों के तीज-पर्व और महापुरुषों के जन्म-मरण से जुड़े अवकाश और बढ़ते जा रहे हैं।
बैंकों की महीने में दो शनिवार छुट्टी चालू हुए ज्यादा साल कहां हुए हैं। इतनी छुट्टियां अन्य किसी देश में नहीं बढ़ रहीं। महामारी के चलते बीते दो सालों के दौरान यूं ही छुट्टियां ज्यादा, काम कम हुआ है। दिल्ली में तो बीते साल रही-सही कसर वायु प्रदूषण ने सरकारी कार्यालयों को बंद कर पूरी कर दी। आगे भी प्रदूषण से जुड़ी छुट्टियों की मार झेलनी पड़ सकती है। कहने को तो बेशक वर्क फ्रॉम होम होता है, लेकिन सरकारी दफ़्तरों में तो इस का मतलब छुट्टी ही समझिए। यानी साल में करीब छह महीने कामकाज ठप रहता है। देश को अरबों रुपये का नुकसान होना जाहिर-सी बात है।
कैसे भी हालात रहें, लेकिन एक सरकारी कर्मी को चार महीने से अधिक छुट्टियां मिलती ही हैं। इसमें साप्ताहिक अवकाश के साथ-साथ आकस्मिक अवकाश (केजुअल लीव), बीमारी की छुट्टी (मेडिकल लीव), अर्जित अवकाश (पीएल) और त्योहारों की छुट्टियां भी शामिल हैं। न्यायालय तो स्कूल-कॉलेजों की तरह गर्मी-सर्दी की छुट्टियां तक करते हैं। इस हद तक माना जाता है कि सरकारी नौकरी का आकर्षण तनख़्वाह से ज्यादा छुट्टियों की मौज है। बिना काम के अच्छे-खासे वेतन की इंतजाम केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए ही है।
उल्लेखनीय है कि महामारी से उपजी आर्थिक मंदी के दौर में भी सरकारी कर्मचारियों को रत्ती भर आर्थिक नुकसान नहीं झेलना पड़ा। हालांकि अब निजी क्षेत्र में भी छुट्टियों की कमी नहीं रही। यह अलग बात है कि सरकारी की भांति प्राइवेट दफ्तरों और कारखानों में बात-बेबात पर छुट्टियां नहीं होतीं। ज्यादातर अखबार भी अब होली और दीवाली पर बंद रहते हैं।
विडंबना है कि ‘आराम हराम है’ हिंदुस्तानी नारा है, लेकिन इस पर हमारे से ज्यादा और बेहतर अमल दूसरे देश करते हैं। गौरतलब है कि भारतीय कैलेंडर में 21 सार्वजनिक अवकाश हैं, जबकि अमेरिका और फ्रांस में 11-11, ब्रिटेन में 8, आॅस्ट्रेलिया में 7 और चीन में 6 सार्वजनिक अवकाश होते हैं। विकास के मद्देनजर भारत इनसे काफी पीछे है। दुनिया के 195 देशों में हर साल औसत 11 सार्वजनिक अवकाश होते हैं।
वैसे, ईरान में सबसे ज्यादा सालाना 27 सार्वजनिक अवकाश होते हैं, सबसे कम नॉर्वे में केवल दो। खास बात है कि चीन, जापान जैसे विकसित देशों में आकस्मिक अवकाश और बीमारी की छुट्टी जैसी व्यवस्था नहीं होती। अर्जित अवकाश भी साल में तीनेक हफ्ते का होता हैं। उन देशों की तरक्की का एक बड़ा कारण यह है कि लोग छुट्टी परस्त नहीं हैं, और काम को महत्व देते हैं।
समझना होगा है कि छुट्टी एक सुविधा है, इसे अपने देश में अधिकार ही मान लिया गया है। हर सुविधा और अधिकार का उपयोग करने का तौर-तरीका और कायदा-कानून होता है। तौर-तरीका खुद अपनाया जाता है, कायदे-कानून का पालन करना पड़ता है।
लेकिन हमारे यहां अधिकार की बातें ज्यादा होती हैं, कर्तव्य की कम। हालांकि जरूरत पड़ने पर छुट्टी लेने में हर्ज नहीं है, लेकिन छुट्टी लेने के नियमों-उपनियमों का पालन करना अधिक आवश्यक है-पहला, बीमारी की छुट्टी हो या आकस्मिक अवकाश, हर तरह की छुट्टी की पूर्व सूचना देना जरूरी है। ड्यूटी शुरू होने से काफी पहले विभागाध्यक्ष को अपनी छुट्टी की बाबत सूचित करना जरूरी है। क्योंकि समय पर गैर हाजिर रहने की सूचना न मिलने से सुचारू कामकाज बाधित होता है। साथ ही, अन्य साथियों का काम बढ़ जाता है-किसी शिफ्ट में अगर चार बंदें हैं और एक गैर हाजिर है, तो काम गड़बड़ाना स्वाभाविक है।
क्योंकि उसका काम बाकी तीनों को करना पड़ता है। दूसरा, दो दिन से ज्यादा मेडिकल लीव से लौटने के बाद छुट्टी की अर्जी के साथ डाक्टर का प्रमाणपत्र देना चाहिए। बीमारी की छुट्टी बार-बार लेने का मतलब है कि छुट्टी लेने वाला अमूमन बीमार रहता है। आगे चल कर, इसका कुप्रभाव नौकरी पर पड़ सकता है क्योंकि सेहतमंद ही उन्नति करता है। तीसरा, त्योहार की छुट्टी के लिए पहले से आवेदन कर विभागाध्यक्ष से मंजूरी लेनी चाहिए। चौथा, अर्जित अवकाश के लिए आवेदन कम से कम 15 दिन पहले किया जाना चाहिए। याद रखिए कि किसी भी छुट्टी की पूर्व सूचना न मिलने पर कर्मी को दफ्तर से गैर-हाजिर माना जाता है।
बड़ा सवाल उठता है कि भारतीय रेल, पुलिस-फौज, दमकल वगैरह साल में 365 दिन चौबीसों घंटे काम कर सकते हैं, तो सरकारी कार्यालयों को आए दिन अलां-फलां मौकों-अवसरों के चलते बंद क्यों किया जाता है? इससे आम जनता को जो परेशानी होती है, सो अलग। रोज-रोज छुट्टियों से फैसलों में देरी और नतीजतन विकास की गति धीमी पड़ जाती है।
असल में, छुट्टियों के मामले में काफी हद तक सरकारी क्षेत्र को निजी क्षेत्र से सीखने की जरूरत है, क्योंकि जायज नहीं लगता कि एक निजी कामगार काम में जुटा है, उधर दूसरा सरकारी बंदा आराम फरमा रहा है। ऐसे में, देश और समाज कैसे तरक्की कर सकता है? भारत को आर्थिक मोर्चे पर सुदृढ़ बनने के लिए काम तो करना होगा, काम का कोई शॉर्टकट नहीं है, और छुट्टियां तरक्की को हासिल करने का जरिया हरगिज नहीं हैं।
अकेले रविवार साप्ताहिक अवकाश के अतिरिक्त केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालय रोजाना खुलने चाहिए। कह सकते हैं कि शनिवार दफ़्तर खोलने पर शीघ्र पुनर्विचार की जरूरत है। ऐसा करने से, साल में 52 कार्य दिवसों की बढ़ोतरी हो जाएगी। कंप्यूटर युग का आगाज करने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मध्य 1980 के दशक में पांच दिवसीय कार्य सप्ताह और दो दिन साप्ताहिक अवकाश की शुरुआत करते वक्त सोचा न होगा कि सरकारी दफ्तरों के कामकाज का रवैया ढुलमुल ही रहता है। इसी प्रकार, आकस्मिक अवकाश बढ़ा कर तमाम धर्मों के त्योहार-उत्सवों पर होने वाले सार्वजनिक अवकाशों को खत्म करना भी हितकारी रहेगा।
इस तरह सरकारी कार्यालय भी खुले रहेंगे और त्योहार मनाने वाले समुदाय के कर्मी त्योहार मना भी लेंगे। इसके पीछे दलील है कि आॅटो-रिक्शा चलाने वाले, या खोमचे-ढाबे वाले, या फिर कारोबारी, अगर काम पर आ कर दशहरा, दीवाली, गुरुपूरब, ईद जैसे बड़े त्योहार भी मना सकते हैं, तो फिर सरकारी कर्मचारियों को छुट्टी की आखिर जरूरत क्यों है?
छुट्टियां घटाने का एक और तरीका आजमाया जा सकता है -15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर को राष्ट्रीय अवकाश रखने की बजाय इन दिनों पर 8 घंटे के कार्य घंटों को उल्टा 2-4 घंटे बढ़ा कर। आजादी के मस्तानों को ज्यादा काम करके ही सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है, न कि सो कर, या सिनेमा- पिकनिक मना कर।
जरा सोचिए कि अगर स्वतंत्रता सेनानी आलसी होते, तो आज शायद हम आजाद भी न होते। एक सवाल और है कि नेताओं के देहांत पर राजकीय और राष्ट्रीय शोक तक तो ठीक है, लेकिन तत्काल अवकाश करने का तौर-तरीका अपनाने का चलन उचित नहीं लगता। अलविदा लेने वाली शख्सियत केवल सरकारी कर्मचारियों के तो नहीं थे, बल्कि समूचे समाज के थे। फिर क्या औचित्य है कि सरकारी लोग अवकाश करें, और गैरसरकारी काम करें।
अमिताभ स.


