
मक्का में कई प्रकार के रोग लगते हैं। यदि उनका उपचार न किया जाए तो फसल नष्ट हो सकती है। इसलिए रोगों का निदान जरूरी है। हम बता रहे हैं मक्का में लगने वाले रोग और उनका प्रबंधन…
मक्का का तुलासिता रोग
भारत में मक्का तुलासिता रोग हिमालय के तराई क्षेत्रों मे उग्रता से आता है। मक्का की उपज उत्पादन मे इस रोग के कारण 63 प्रतिशत तक की हानि प्रतिवेदित की गई है।
लक्षण : इस रोग के लक्षण पत्तियों पर लंबे, बड़े, हल्के पीले, भूरे रंग के और ऊतकक्षय (मृत ऊतक) धारियों के रूप में प्रकट होते हैं तथा पत्तियों की निचली सतह पर ऊन के जैसी सफेद रंग की कवक की कवक जाल दिखाई पड़ती है। पौधे की वृद्धि में कमी होने के कारण पौधा लंबाई में छोटा रह जाता है और पुष्पमंजरी कुरूप हो जाती है।
भुट्टे के निर्माण आंशिक या पूर्णतया नहीं हो पाता और यदि भुट्टे का निर्माण हो भी जाता है तो उसमें दाना नहीं बन पाता है तथा रोग की उग्र अवस्था में संपूर्ण पौधा सूखकर भूसे के रंग का हो जाता है।
प्रबंधन : रोगरोधी किस्मों को उगाना जैसे-डीएमआर-1, 2, 3, 4, 5, गंगा-5, अमरिलो और फिल आदि। फसल चक्र 3-4 वर्ष का अपनाएं। रोगग्रस्त पौधों एवं फसल अवशेषों को जला कर नष्ट करें।
बीज उपचार: रिडोमिल 25हढ 4 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें। खड़ी फसल में रिडोमिल 6 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर बुवाई के तीन सप्ताह बाद छिड़काव करें।
डंठल गलन रोग
मक्का का डंठल गलन रोग कई देशों में पाया जाता है जैसे की संयुक्त राज्य अमेरीका, इजरायल, ग्रीस, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, भारत और नेपाल आदि। भारत में यह रोग कुछ राज्यों जैसे- उत्तर प्रदेश, बिहार, कश्मीर, राजस्थान और आंध्र प्रदेश आदि में उग्र अवस्था में पाया जाता है। यह रोग भारी मात्र में हानि पहुंचाता है।
लक्षण : रोग के लक्षण सर्वप्रथम पौधे के परिपक्व होने के पूर्व से ही दिखाई देने लगते हैं। रोगग्रस्त पौधों की ऊपरी पत्तियां प्रारम्भ में मुरझा तथा अंत में सूख जाती हैं जो शीघ्र ही पौधे की निचली पत्तियों की ओर वृद्धि करता है। डंठल गलन रोग के लक्षण पौधों के ऊपरी भाग (शीर्ष) या पौधों के आधार से प्रारम्भ होते हैं।
आधार गलन रोग में पौधे की पत्तियां पीली और प्रभावित ऊतक भूरे रंग के तथा मुलायम पानी में भीगे हुए दिखाई पड़ते हैं, जबकि शीर्ष गलन रोग के लक्षण पौधे के ऊपरी भाग पर झुलसा के रूप में प्रकट होते हैं तथा पौधे के ऊपरी भाग में गलन हो जाती है और अंत में सम्पूर्ण पौधा सूखा हुआ दिखाई देता है।
प्रबंधन : फसल चक्र अपनाएं। रोगग्रस्त फसल अवशेषों को नष्ट एवं जला दें।मक्के के पौधे के आस पास पानी का ठहराव नहीं हो। जनजाति किस्मों की बुवाई करना जैसे- डीकेई-9770, 9712 9740, 9555, 9727, 9560 और सीएम-113 7 क्लोरोसिन @ 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मृदा को दस-दस के अंतराल पर पुष्प बनने से पहले भिगोएं।
मक्के का लीफ ब्लाइट
मक्का का यह रोग एक महत्वपूर्ण है तथा यह रोग विश्वव्यापी एवं जहां पर मक्का की खेती की जाती है उन जगहों पर रोग पाया जाता है। इस रोग के कारण भारत में प्रत्येक राज्य, जहां मक्का की खेती की जाती है वहां पर मक्के का रोग लगता है। यह रोग ज्यादातर 41-70 प्रतिशत तक उत्पादन में हानि पहुंचाता है।
लक्षण : मक्के की पत्तियों की शिराओं के बीच में पीले एवं भूरे अंडाकार धब्बे बनते हैं, जो बाद में लंबे होकर चौकोर हो जाते हैं। इनसे पत्तियां जली हुई दिखाई देने लगती हैं ।
प्रबंधन : रोगग्रस्त पौधों को जला दें। फसल चक्र अपनाएं। रोगरहित प्रजातियों की बुवाई करना जैसे- सीएम-104,105, एससी-24-(92)-3-2-1-1, सुवन-1, एससी- 7-2-1-2-6-1, और सीएम-116 7
दो से चार छिड़काव डाईथेन जेड -78 और डाईथेन एम-45 @ 2.5 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोग के लक्षण दिखाई देने पर छिड़काव करें।
मक्के का टर्सिकम पत्ती झुलसा रोग
मक्के का टर्सिकम पत्ती झुलसा रोग को उत्तरी झुलसा रोग के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग मक्का उत्पादित देशों में मक्का उत्पादन में एक प्रमुख बाधा है। भारत में यह रोग उन सभी राज्यों में पाया जाता है, जिन राज्यों में मक्के की खेती की जाती है। इस रोग के कारण फसल उपज में लगभग 70 प्रतिशत तक की हानि प्रतिवेदित की गई है।
लक्षण : रोग के लक्षण आसानी से पत्तियों पर पहचाने जा सकते हैं। रोग के लक्षण पत्तियों पर छोटे-छोटे अंडाकार या गोलाकार जल में भीगे हुए जैसे दिखाई देते हैं, जो बाद में सर्वप्रथम लंबे तर्कू आकार उत्तकक्षय (मृत ऊतक) हो जाते हैं।
प्रारम्भ में रोग के लक्षण पौधों की निचली पत्तियों से आरम्भ होकर कुछ समय पश्चात पौधों की ऊपरी पत्तियों की ओर बढ़ता है। अनुकूल वातावरण मिलने पर धब्बों की संख्या एवं उनके आकार में वृद्धि होती है और धीरे-धीरे धब्बे पौधों की जड़ को छोड़कर सभी भागों पर फैल जाते हैं। धब्बों की सघनता अधिक हो जाती है और आपस में मिल जाते हैं जिससे सम्पूर्ण पत्तियां झुलसी हुई दिखाई देते हैं।
प्रबंधन : रोगग्रस्त फसल अवशेषों को नष्ट एवं जला दें। रोग रोधी किस्मों की बुवाई करना जैसे- गंगा-4, हिम-123, वीएल-43, हिम-129, केएच-810 और प्रभात इत्यादि। दो से तीन छिड़काव डाईथेन जेड-78 @ 2.5 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोग के लक्षण दिखाई देने पर सात दिन के अंतराल पर करें।
-एमके अग्रवाल


