Wednesday, May 6, 2026
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दादा ध्यानचंद की हॉकी झांसी रवाना

  • दुनिया में भारत के राष्टÑीय खेल हॉकी की अलग पहचान बनाने वाले ध्यानचंद की हॉकी मेरठ से झांसी रवाना
  • मेजर ध्यानचंद के परिवार के नजदीकी सतीश पंडित ने बताई हॉकी की विशेषताएं

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: भारत के स्टॉर व हॉकी के जादूगर के नाम से जाने जानें वाले मेजर ध्यानचंद का मेरठ से गहरा नाता रहा है। ध्यानचंद जिस हॉकी से खेलते थे वह मेरठ में ही बनाई जाती थी। ऐसी ही एक हॉकी मेरठ में आज भी मौजूद रही जिसे अब उनकी गृह जनपद झांसी भेजा जा रहा है। ध्यानचंद के परिवार के बेहद करीबी सतीश पंडित ने मेजर ध्यानचंद के परिवार व हॉकी की विशेषताओं के बारे में जानकारी दी।

मेरठ में बनी हॉकी से खेलता है पूरा परिवार

मेजर ध्यानचंद ने जिस हॉकी से अपने खेल को धार दी वह मेरठ की ही कंपनी में बनी है। हॉकी का निर्माण पंडित सोहन लाल ने किया था। मेजर ध्यानचंद के लिए मेरठ में कुल 4 हॉकी बनाई गई थी जिनमे से एक हॉकी आज भी कंपनी के पास थी। जिसे अब ध्यानचंद के गृह नगर झांसी में एक टूर्नामेंट में रखा जाएगा।

इसके बाद इसे वहीं पर म्यूजियम में बतौर धरोहर के रूप मे रखा जाएगा। मेजर जब भी किसी मैच में खेलने जाते थे तो पंडित सोहन लाल के यहां से हॉकी ले जाते थे और जब मैच समाप्त हो जाता था तो उसे वापस उन्हीं के पास साफ करके रख देते थे।

खेलते समय मेजर की हॉकी में मिट्टी नहीं लगती थी

ध्यानचंद के परिवार के नजदीकी सतीश पंडित ने बताया कि जिस समय मेजर मैच खेलते थे उस समय उनकी हॉकी जमीन पर नहीं लगती थी। इसी वजह से उनकी हॉकी पर कभी मिट्टी नहीं लगती थी। थोड़ी बहुत मिट्टी लग भी जाती थी तो मेजर उसे मैच के दौरान ही साफ करते रहते थे।

उनको अपनी हॉकी स्टिक से बहुत प्यार था इसी वहज से वह कभी उसे गंदा नही रहने देते थे। आज भी मेजर ध्यानचंद के परिवार के सभी सदस्य हॉकी खेलते है वह भी मेरठ में बनी हॉकियों से ही। सतीश पंडित ने कहा कि भले ही आज जो हॉकी उनके हाथ में है उससे मेजर ज्यादा मैच नहीं खेले होगें। लेकिन उनका किसी हॉकी को छूना ही एक अविस्मरणीय पल की तरह है।

सैंपल की हॉकी से किए थे दो गोल

मेजर ध्यानचंद की यादों को ताजा करते हुए सतीश पंडित ने बताया कि एक बार हॉकी निर्माता पंडित सोहन लाल मेरठ पुलिस लाइन में एक टूर्नामेंट के दौरान सैंपल लेकर पहुंचे थे। सोहन लाल ने ध्यानचंद को अपना सैंपल दिखाते हुए कहा कि जरा देखकर बताएं यह कैसी है। इसके बाद मेजर ध्याचंद ने उस सैंपल की हॉकी से दो गोल दाग कर हॉकी की गुणवत्ता को साबित किया था।

इसके बाद दो गोल मारने के बाद अपनी जेब से रूमाल निकाला और सैंपल की हॉकी को साफ करते हुए वापस कर दिया। जिस हॉकी से गोल किए गए थे उसपर एक मामूली निशान तक नहीं आया था। यानी मेजर ध्यानचंद हॉकी के जादूगर ऐसे ही नहीं कहे जाते, उनकी पकड़ हॉकी पर इतनी साफ थी कि वह हॉकी को जमीन पर नहीं लगने देते थे।

50 से 60 के दशक तक मेरठ में रहे थे ध्यानचंद

हॉकी बनाने वाली कंपनी के मालिक अरूण शर्मा ने बताया कि उनक कंपनी 1915 में ही मेरठ में स्थापित हो गई थी। लेकिन उन्होंने 65 साल पहले मेजर के लिए हॉकी का निर्माण किया। मेरठ में पजाब सैंटर यूनिट में रहते हुए ध्यानचंद को मेजर की उपाधी मिली थी। 1956 में मेजर ध्यानचंद पंजाब लाइंस यूनिट से रिटायर हो गए इसके बाद भी वह लंबे समय तक मेरठ में ही रहे।

मेजर को भारत रत्न नहीं मिलने का अफसोस

मेजर ध्यानचंद के परिवार से गहरा नाता रखनें वाले सतीश पंडित ने बताया कि मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न मिलना चाहिए था लेकिन नहीं मिला। आज भी उनके परिवार के लोग यह पुरस्कार मिलने की आस लगाए हुए है। हालांकि मौजूदा केन्द्र सरकार को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि मेरठ में प्रदेश का पहला खेल विश्व विद्यालय मेजर ध्यानचंद के नाम से बनाए जाने का वह स्वागत करते हैं, लेकिन मेजर को भारत रत्न मिलना चाहिए। उन्होंने मेजर के बेटे अशोक को उनके पिता के नाम से बनने वाले खेल विश्व विद्यालय में वीसी के पद पर नियुक्त करनें की भी मांग की हैं।

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