- मेडिकल कॉलेज में बुजुर्गों पर हुआ सर्वे, आधे से ज्यादा हाइपरटेंशन के शिकार
- 76 प्रतिशत बुजुर्ग बीमार, सिर्फ 24 प्रतिशत ही स्वस्थ
- इनमें 46 प्रतिशत डिप्रेशन का शिकार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: जब अपने ही अपनों को दुश्वार लगने लगें तो और दुश्वारियां बढ़नी शुरू हो जाती हैं। यही लम्हा दुनिया का सबसे तकलीफदेह लम्हा बन जाता है। उम्र के ढलान पर जब अपनों से रुसवाई मिलती है तो इंसान टूट जाता है, जीते जी मर जाता है।
अपनों का परायापन जब महसूस होने लगता है तो स्वभाविक रूप से इंसान बीमारियों की दहलीज पर जा खड़ा होता है। यह निष्कर्ष निकला है उस सर्वे मेें जो लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज मेरठ की कम्यूनिटी मेडिसिन की रिसर्च स्कॉलर डॉ. दरख्शां सय्यदैन और डॉ. सीमा जैन ने किया है।
दरअसल, इन दोनों चिकित्सकों ने 11 हजार की कम्यूनिटी वाले एक इलाके के 220 ऐसे लोगों पर एक सर्वे किया जो कि हाई रिस्क ग्रुप में आते हैं। सर्वे में उन्होंने यह पता करने की कोशिश की कि उम्र के ढलान पर पहुंच कर गुमसुम रहने वाले बुजुर्ग वास्तव में आखिर किस जद्दोजहद से जूझ रहे हैं।

सर्वे हुआ तो रिजल्ट भी सामने आया। पता यह चला कि जो बुुजुर्ग अकेलेपन के शिकार हैं और घरों में तन्हाई के आलम में जिन्दगी गुजार रहे हैं, उनमें से ही अधिकतर लोग बीमारी के दायरे में हैं। सर्वे के दौरान जो टॉप फाइव बीमारी सामने आर्इं जिनसे यह बुजुर्ग पीढ़ित पाए गए
उनमें आॅर्थोराइटिस, हाइपरटेंशन, एनीमिया और गैसर्टोराइटिस शामिल हैं। बड़ी संख्या में डिप्रेशन के शिकार लोग भी मिले। यह आंकड़ा 46 प्रतिशत मिला। इन 220 लोगों में से कुल 76 प्रतिशत बुजुर्ग लोग विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त मिले जबकि सिर्फ 24 प्रतिशत लोग ही स्वस्थ्य मिले।
समाज से जुड़े बुजुर्ग
सर्वे में यह पाया गया कि जो बुजुर्ग सामाजिक स्तर पर सक्रिय हैं। अथवा धार्मिक क्रियाओं में अपना समय देते हैं जैसे कथाओं में जाते हैं या नमाज पढ़ते हैं, वो अपेक्षाकृत ज्यादा स्वस्थ और एक्टिव हैं। उनमें बीमारियों का ग्राफ नीचे है।
तन्हाई सबसे बड़ा रोग
जिन बुजुर्गों के बच्चे नौकरी पेशा हैं और घरों से दूर हैं या फिर पढ़ाई के लिए बाहर गए हुए हैं अथवा जिन बुजुर्गों को उनके घर वालों ने अकेला छोड़ दिया या फिर पति अथवा पत्नी में से किसी की मृत्यु हो गई हो, तो ऐसे घरों के बुजुर्ग ज्यादा बीमार हैं। इसकी वजह यह है कि यह बुजुर्ग अकेलेपन की वजह से आपस में कोई इंटरेक्शन नहीं कर पाते। इनको घरों में फ्रेंडली माहौल नहीं मिल पाता जिसके चलते यह बीमार हो जाते हैं।
ओल्डऐज क्लब और खेलों का लें सहारा
डॉ. दरख्शां के अनुसार इस प्रकार के लोगों की उनके स्तर से काउंसलिंग भी की जाती है। वो कहती हैं कि यदि ऐसे बुजुर्ग सामाजिक सक्रियता दिखाएं और बाहर जाकर लोगों से मिले और बोले तो उनकी यह समस्या दूर हो सकती है।

इसके अलावा ऐसे लोग ओल्डऐज क्लब के साथ साथ विभिन्न प्रकार के खेलों का सहारा भी ले सकते हैं। डॉ. सीमा जैन के अनुसार व्यक्ति की फिजिकली हेल्थ से ज्यादा महत्तवपूर्ण उसकी मेंटल हेल्थ है।

