Wednesday, March 4, 2026
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नेताओं का खेल से दूर रहना ही अच्छा

SAMVAD


26 21खिलाड़ी कोई भी हो, देश का मान-सम्मान होते हैं। कोई भी देश हो वह हमेशा अपने खिलाड़ियों पर गर्व करता है, क्योंकि खिलाड़ी तमाम मुश्किलें झेलते हुए अपनी अथक मेहनत और बहुत कुछ सहकर देश के लिए पदक जीतते हैं। वास्तव में खिलाड़ियों की जीत ही देश की जीत होती है, लेकिन आज खिलाड़ी उनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार, यौन उत्पीड़न को लेकर सड़क पर उतर आए हैं, यह बहुत ही गंभीर व संवेदनशील है कि आज खिलाड़ियों की आवाज को अनदेखा किया जा रहा है।

वास्तव में, यौन उत्पीड़न के आरोप बड़े गंभीर आरोप होते हैं और इन आरोपों पर प्रारंभिक जांच की जरूरत है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कुश्ती स्पर्धाओं और प्रतियोगिताओं में विभिन्न पदक जीतने वाली खेल प्रतिभाओं/महिला खिलाड़ियों को आज अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर धरने पर बैठना पड़ा है।

भारतीय कुश्ती महासंघ का भारत में ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व में नाम है और यह हमारे देश के खेल मंत्रालय और भारतीय कुश्ती महासंघ के लिए अच्छी बात नहीं कही जा सकती है कि एक जिम्मेदार पदाधिकारी के खिलाफ यौन दुर्व्यवहार के आरोप लगे हैं।

आरोपों के पीछे आखिर सच्चाई क्या है, वह तो हर हाल में सामने आनी ही चाहिए ताकि दूध का दूध व पानी का पानी किया जा सके। महिला खिलाड़ियों के साथ यौन शोषण का मामला अब तूल पकड़ता चला जा रहा है और अब तो जंतर- मंतर पर महिला पहलवानों के धरने पर विभिन्न विपक्षी राजनीतिज्ञ, सरकार पर हमलावर नेता, खापों व अन्य संगठनों के पदाधिकारी तक जुटने लगे हैं।

मीडिया में भी इस मामले को लेकर रह-रहकर खूब खबरें आ रही हैं। जब महिला खिलाड़ी इतने गंभीर आरोप लगा रही हैं तो इसके पीछे कुछ न कुछ तो बात जरूर है। यह पहली बार नहीं है जब महिला पहलवान इस प्रकार से आगे आर्इं हैं। इससे पहले भी इस मामले में उनके द्वारा आंदोलन किया गया था। उस समय यानी कि माह जनवरी-2023 में खेल मंत्रालय द्वारा जांच के लिए मशहूर बॉक्सर मैरी कॉम की अगुआई में एक समिति का गठन किया गया था।

गठित समिति द्वारा हालांकि रिपोर्ट सौंप दी गई है लेकिन इसके कोई अंतिम निहितार्थ/ निष्कर्ष की घोषणा न होने से महिला पहलवान क्षुब्ध होकर जंतर-मंतर पर धरने पर बैठ गई हैं। यहां तक कि महिला पहलवानों ने देश के विभिन्न राजनीतिक दलों, किसान, खाप व महिला संगठनों से भी इस संदर्भ में समर्थन मांगा है।

प्रसिद्ध खिलाड़ी बजरंग पूनिया ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह आरोप तक लगाया है कि जिन सात महिला पहलवानों ने यौन शोषण की शिकायत की है, उन पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। पैसों का लालच भी दिया जा रहा है। यह हमारे देश की विडंबना ही है कि आज खेलों तक में राजनीति का प्रवेश हो गया है। वास्तव में खेल राजनीति से हमेशा परे होने चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो, खेलों में राजनीति का कोई भी स्थान नहीं होना चाहिए।

खेलों में जब राजनीति का स्थान हो जाता है तो इससे खिलाड़ी, खेल तो प्रभावित होते ही हैं, विश्व पटल पर भी हम खेलों के क्षेत्र में पिछड़ते चले जाते हैं। आज खेलों में राजनीति का बड़ा खेल हो रहा है। वास्तव में कहना गलत नहीं होगा कि आज के समय में भारत में खेल और राजनीति का रिश्ता चोली दामन का है। यहां तक कि बहुत बार यह समझना तक मुश्किल हो जाता है कि खेलों में राजनीति है या फिर राजनीति में खेल।

आज खेलों में वित्तीय अनियमितताएं देखने को मिलती हैं, खिलाड़ियों के चयन तक में घपला होता है, खिलाड़ियों पर अत्याचार तक होते हैं, तो यह बहुत ही संवेदनशील व गंभीर बात है। राजनीतिक दलों से जुड़े लोग ही देश के खेलों पर कुंडली मारकर बैठे हैं। आखिर ऐसा क्यों है? खेलों में अनाप शनाप पैसा, नेम एंड फेम भी कहीं न कहीं इन लोगों को खेलों से जोड़े रखता है। बहुत ही दुखद है कि आज खेल व राजनीति का घालमेल चल रहा है।

अधिकतर मामलों में खेल संघों से जुड़े राजनेताओं का संबंधित खेल से दूर-दूर तक कोई भी वास्ता तक नहीं होता है लेकिन ये खेल संघों के जरिए अपने रसूख, अपने कद को और बढ़ाने में कामयाब जरूर हो जाते हैं।

बहरहाल, समूचे प्रकरण में कौन दोषी है, कौन नहीं, कौन सच्चा है और कौन झूठा, यह बात तो जांच में ही सामने आ पाएगी, लेकिन देश के लिए पदक जीतने वाले हमारे खिलाड़ियों को अपनी मांगों को लेकर धरना देना पड़े, ऐसी स्थिति को चिंताजनक ही कहा जा सकता है। विश्व पटल पर आज खेलों में बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धा है लेकिन ऐसे विवादों से हमारे देश में खेल, खिलाड़ियों व उनकी गरिमा को लगातार ठेस पहुंच रही है।

आरोप प्रत्यारोप से छवि बिगड़ती ही है। खिलाड़ियों के साथ दुर्व्यवहार, हिंसा, अत्याचार, अनियमितताओं से खिलाड़ियों के हौसले कहीं न कहीं पस्त ही होते हैं और वे खेलों में अपना ध्यान नहीं लगा पाते हैं। उनकी एकाग्रता, उनका ध्यान, उनकी ऊर्जा इससे भंग होती है। खेल का वातावरण तक इससे प्रभावित होता है। यहां तक कि इससे भारतीय खेल व्यवस्था की प्रतिष्ठा तक को भी आंच आती है।

ऐसे मामलों में शिकायत निवारण को प्राथमिकता देने तथा पारदर्शी व्यवस्था बनाने की जरूरत है। खिलाड़ी यदि आरोप लगा रहे हैं तो उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। ऐसी नौबत वास्तव में आनी ही नहीं चाहिए थी कि खिलाड़ियों को जंतर मंतर पर प्रदर्शन तक करना पड़े। इस बात की भी प्रबल संभावना है कि लोग अपनी बेटियों को खेलों के लिये भेजने तक में संकोच करने लगे। देश को मामले पर आत्ममंथन करने की जरूरत है।


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