Tuesday, April 21, 2026
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गांधी की राह पर राहुल

Samvad 1


Tanveer Jafreeदेश ने वह इतिहास भी देखा है जब जून 1975 में आपातकाल की घोषणा करने व स्वतंत्र मीडिया को केंद्रीय सत्ता द्वारा नियंत्रित करने जैसे प्रयासों के बाद ‘तानाशाह’ के रूप में प्रचारित की इंदिरा गांधी को देश की जनता ने सत्ता से हटा दिया था। उस समय इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व विश्व के बड़े व लोकप्रिय नेताओं में हुआ करता था। 5 वर्ष पूर्व ही इंदिरा गांधी के फैसलों की बदौलत पाकिस्तान विभाजित हुआ था और बांग्लादेश नमक नया राष्ट अस्तित्व में आया था। इंदिरा गांधी के सबल व कुशल नेतृत्व में ही भारतीय सेना ने 13 दिवसीय युद्ध के बाद 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना के 93,000 से अधिक सैनिकों का आत्मसमर्पण कराया था। इस निर्णायक जीत के बाद ही भारत एशिया में एक प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित हो गया था।

इंदिरा गांधी की इतनी महान राजनैतिक शख़्सियत होने के बावजूद देश की जनता ने उनके किसी भी तानाशाही प्रयासों को स्वीकार नहीं किया और आपातकाल हटने के बाद होने वाले चुनाव में 1977 में उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया। जनता पार्टी की सरकार बनते ही इंदिरा गांधी को सताने व उन पर मुकदमे चलाने व जांच कमीशन बिठाने का सिलसिला शुरू हुआ। जनता यह भी गौर से देखती रही।

इंदिरा गांधी व उनके पुत्र संजय गांधी पर अनेक मुकदमे चलने लगे। यहां तक कि 3 अक्टूबर 1977 को सीबीआई के अधिकारियों ने शाम सवा 5 बजे इंदिरा गांधी को उनके घर से गिरफ़्तार कर लिया। दरअसल लाल कृष्ण आडवाणी सहित और भी कई नेता आपातकाल के दौरान विपक्षी नेताओं के साथ हुई कथित ज्यादती का बदला लेने की गरज से इंदिरा गांधी को गिरफ़्तार कर उन्हें जेल भेज कर अपमानित करना चाहते थे।

बिना सुबूत के और केवल बदला लेने की गरज से की गई इस गिरफ़्तारी में भी जब कानूनी कार्यवाही शुरू हुई और जज ने इंदिरा गांधी पर लगाए जा रहे भ्रष्टाचारों के सबूत तलब किए तो उस समय भी अभियोग पक्ष (सरकार) के पास इंदिरा गांधी को अपराधी साबित करने का के लिए कोई सबूत नहीं था। परिणाम स्वरूप इंदिरा गांधी को अदालत ने बरी कर दिया।

और जब जनता पार्टी में सर फुटव्वल मची तो इंदिरा गांधी की राजनैतिक सूझबूझ के चलते 1979 में देश में लोकसभा के उपचुनाव हुए। और मात्र ढाई वर्ष पूर्व सत्ता से तानाशाही जैसे आरोपों में सत्ता से हटने वाली इंदिरा गांधी की सत्ता में पुन: वापसी हुई। इसी लिण् इंदिरा गांधी से बदला लेने हेतु की गयी इस गिरफ़्तारी को ‘आॅपरेशन ब्लंडर’ का नाम दिया गया था।

कुछ वैसे ही या उससे भी बदतर हालात देश में एक बार फिर नजर आ रहे हैं। राष्ट्र निर्माता प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को वर्तमान सत्ताधारियों व उनकी विचारधारा के लोगों द्वारा खूब अपमानित किया जा रहा है। उनकी उपलब्धियों को छुपाकर उनके चरित्र व तमाम राजनैतिक फैसलों को दोषपूर्ण बताया जाता है।

सोनिया गांधी व उनके पुत्र कांग्रेस अध्यक्ष रहे राहुल गांधी को अनेक मामलों में फंसाने की कोशिशें की जा रही है। नेशनल हेराल्ड से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग केस के नाम पर 75 वर्षीय सोनिया गांधी व राहुल गांधी से उन्हें कई बार ईडी के कार्यालय बुलाकर लंबी पूछताछ की गई। यह भी राजनीतिक द्वेष की भावना से की गई कार्रवाई थी।

गांधी नेहरू परिवार से नफरत का यह सिलसिला राहुल गांधी को घेरने उन्हें अपमानित करने व सताने के रूप में भी लगातार सामने आ रहा है। इसकी भी वजह यह है कि सत्ता की जिस दुखती नब्ज पर राहुल हाथ रखते हैं, वह साहस विपक्ष का कोई भी नेता नहीं दिखा पाता। राहुल के परिवार की पृष्ठभूमि ही ऐसी है कि उन्हें डराना धमकाना आसान काम नहीं।

पिता राजीव गांधी और दादी इंदिरा गांधी जैसे शहीदों की गोद में पले व खेले राहुल को कम से कम वे लोग डराने धमकाने में तो सफल हरगिज नहीं हो सकते जिनकी अपनी पृष्ठभूमि, संस्कार व परवरिश केवल अंग्रेजों की खुशामद करने, नफरत के बीज बोने व सांप्रदायिकता फैलाने की हो?

इसी कोशिश के तहत बड़े ही सुनियोजित तरीके से राहुल गांधी पर अनेक भाजपा शासित राज्यों में भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा विभिन्न मामलों में कई मुकद्द्मे दर्ज करा दिए गए हैं। ऐसे ही। ‘मोदी सरनेम’ वाले एक आपराधिक मानहानि के मामले में गुजरात में सूरत की एक निचली अदालत ने राहुल गांधी को दो वर्ष के कारावास की अधिकतम सजा सुना डाली।

सूरत के इस अदालती आदेश के खिलाफ जब राहुल गांधी गुजरात हाईकोर्ट तो आश्चर्यजनक तरीके से उन्हें वहां से भी राहत नहीं मिली। लोकसभाध्यक्ष ने आनन फानन में राहुल की लोकसभा सदस्यता निलंबित की। यहां तक कि कुछ ही दिनों के भीतर उनसे उनका सरकारी बंगला भी खाली करवा लिया।

सत्ता द्वारा राहुल गांधी को बदनाम,परेशान व अपमानित करने के तमाम प्रयासों के बीच इन सब की परवाह किए बिना वे कभी लगभग चार हजार किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा में पैदल चलकर देश की जनता से रूबरू होते हैं व शांति, प्रेम,सद्भाव व भाईचारे का पैगाम देते हैं। लोकसभा की सदस्यता जाने के बाद तो राहुल जनता के दिलों के और भी करीब पहुंचते नजर आए।

कभी ट्रक में सवारी करते दिखाई दिए तो कभी मोटर साईकिल मिस्त्री की दुकान पर मिस्त्रियों के बीच बैठते, कभी सब्जी मंडी में सब्जी व्यवसाइयों से मिलते तो कभी किसानों के साथ खेतों में धान की रोपाई करते नजर आये और कभी कुलियों से मुलाकात करते दिखाई दिये। यानी सत्ता द्वारा दबाने व षड़यंत्र करने की तमाम कोशिशों के बावजूद ‘गांधी’ की राह पर आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं राहुल।


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