Sunday, May 26, 2024
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हिंसा से देश का होगा नुकसान

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lalit kumarपिछले कुछ महीनों से देश में फैलती नफरती सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं एक-एक करके सभी राज्यों को अपनी चपेट में लेती जा रही है। हर घटना की हिंसा का पैटर्न हिंदू-मुस्लिम और सामाजिक ध्रुवीकरण पर टिका होता है। राज्य दर राज्य बढ़ती हिंसा की घटनाएं जिस तरीके से उग्र रूप लेती जा रही हैं, इससे भारत के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। यदि आने वाले समय में इस तरह की हिंसा कहीं और ज्यादा न बढ़ने लगे इस पर अभी से विचार करना बहुत जरूरी है। चुनावी लाभ पाने के लिए राजनीतिक पार्टियां बहुसंख्यकवाद और धार्मिक ध्रुवीकरण कराकर सत्ता में पहुंचने के लिए कुछ भी कराने के लिए तैयार है। हरियाणा जिले के नूहू और मेवात जिलों में 31 जुलाई को विश्व हिंदू परिषद द्वारा ब्रजमंडल यात्रा के दौरान भड़की हिंसा भी किसी न किसी की सोची समझी साजिश का ही परिणाम है।

आज हरियाणा हिंसा की चपेट में आ चुका है। इस हिंसा में लगभग सौ से ज्यादा गाड़ियों को जला डाला और भारी तोड़फोड़ की वजह से करोड़ों रुपयों की संपत्ति को हिंसा की भेंट चढ़ा दिया गया। उग्र भीड़ ने पुलिस पर हमला किया, जिसमें दो होमगार्ड समेत पचास से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो गए। इस हिंसा के कारण हरियाणा में अब ऐसे हालात बन चुके है कि पड़ोसी राज्यों से आए ज्यादतर प्रवासी मजदूर पलायन करने को मजबूर हो चुके है।

हरियाणा में उठी हिंसा की लपटें अब राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों तक जा पहुंची है। जिनमें मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ और सहारनपुर जिले शामिल है, जहां लगातार बजरंग दल कार्यकर्ताओं की भीड़ सड़कों पर आंदोलन करने पर आतुर हो चुकी हैं। अगर याद हो तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर दंगा, जो जुलाई 2013 में हुआ था।

मुजफ्फरनगर हत्याकांड भी कुछ ऐसी ही सोची समझी साजिश का परिणाम था और देखते ही देखते मुज्जफरनगर हत्याकांड ने सांप्रदायिक रूप लेकर गांव और कस्बों में दंगे की शक्ल लेनी शुरू कर दी थी। इस देंगे की लपटों ने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अपने आगोश में ले लिया था।

जिस कारण हिंदू और मुस्लिम का तुष्टिकरण बड़े पैमाने पर हुआ। जहां बड़ी तादाद में दंगे भड़के और काफी लोग उसके शिकार हुए। मुजफ्फरनगर दंगे का नाम सुनते ही आज भी लोगों की रूह कांप उठती है। क्योंकि इस दंगे की वजह से हालात इतने भयावह हो चुके थे कि कब ओर कहां किसकी हत्या कर दी जाए, किसी को कुछ पता ही नही चलता था, लेकिन इस दंगे का लाभ कुछ राजनीतिक पार्टियों को जरूर मिला था।

इस दंगे के कारण न जाने कितने लोगों के घर उजाड़ दिए गए और कितने लोग बेघर हो हुए उसका डर आज भी लोगों के जेहन में बना हुआ हैं। अब सवाल यही उठता है कि धार्मिक तुष्टीकरण का सबसे ज्यादा शिकार आखिर मजदूर वर्ग ही होते है। वह अपना पेट पालने के लिए दो वक्त की रोटी के लिए हाड़ तोड़ मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालते है, लेकिन इस तरह की हिंसा में सबसे पहले ऐसे ही लोगों को आसानी से शिकार बनाया जाता है।

मध्यम परिवार के बच्चे जो आज सोशल मीडिया पर रील बनाने में सबसे ज्यादा व्यस्त हैं, उन तक जब इस तरह की घटनाएं पहुंचती हैं, तो सबसे ज्यादा वही फेक न्यूज का शिकार होते हैं। क्योंकि उनके दिमाग में नफरत सोच का ऐसा बीज बो दिया जाता है, जिससे वह ऊपर नहीं उठ पाते।

ऐसे ही युवाओं को राष्ट्रवाद का चोला उठाकर सबसे आगे किया जाता है और फिर दंगाइयों की गोली का शिकार भी वही युवा होते हैं या होते हैं वह लोग जो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने की चाह में उनको बाहर भेजना चाहते हैं। लेकिन कहीं न कहीं उनके बच्चे जब अपने दोस्तों के कहे में आकर अगर गलती से भी इस राह पर चल पड़ते हैं, तो वह आखिरकार दंगों की आग की चपेट आ जाते है। दंगे की लपटें जहां तक भी पहुंचती है उसका असर मध्यम वर्ग के युवाओं पर सबसे पहले पड़ता है।

ऐसा ही कुछ बरेली में कावड़ यात्रा के दौरान देखा गया। यानी कांवड़ यात्रा के दौरान सांप्रदायिक माहौल को खराब करने की फिर से कोशिश की गई थी। जिसमें कांवड़ यात्रियों द्वारा डीजे बंद कराने को लेकर बरेली आईपीएस अधिकारी प्रभाकर चौधरी ने समय रहते अगर कदम नहीं उठाया होता तो काफी जन हानि हो सकती थी, लेकिन उनकी ईमानदारी और उनकी अच्छी जूझबूझ ने ही बरेली में हिंसा होने से बचा ली।

जिस कारण प्रभाकर चौधरी को इसका अंजाम भुगतना पड़ा और उनका बरेली से तबादला करके लखनऊ कर दिया। यानी एक ईमानदार अधिकारी अगर ईमानदारी से काम करता है तो उसको काम करने नहीं दिया जाता। राजनीतिक पार्टियां युवाओं को दंगाई बनाकर अपनी कुर्सी बचाने के लिए मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों को सबसे आगे करती है।

चुनाव जीतने के बाद जब यही युवा रोजगार मांगने सड़कों पर उतरते हैं तो सरकार में बैठे वहीं नेता युवाओं पर लाठियां और गोलियां चलवाते हैं और कहते हैं कि रोजगार की मांग करने वाले ये युवा देशद्रोही हैं। सरकारी काम में बाधा पहुंचा रहे हैं, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कुल मिलाकर उन पर तरह-तरह की धाराएं लगाकर उनके उज्जवल भविष्य के सपने को जेल की सलाखों में कैद कर दिया जाता है।

आम चुनाव आने से पहले धीरे-धीरे हिंसा की आग में झुलसता भारत अब एक नया मोड़ लेता जा रहा है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि देश में होने वाली इस तरह की हिंसा और ज्यादा बढ़ सकती हैं। यानी पूरे देश को मणिपुर की तरह नफरती हिंसा की चपेट में झोंकने का काम किया जा रहा है।

कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा इस तरह के काम कराए जा रहे हैं या नफरती भाषण और नफरती माहौल बनाकर देश की सत्ता पाने के लिए राजनेताओं ने अभी से बिसात बिछानी शुरू कर दी है। वर्ष 2024 को ध्यान में रखते हुए कुछ राजनीतिक दलों के लिए हिंसा का यही पैटर्न पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने में मदद करेगा।

यानी राजनेताओं की छवि पर उठते सवाल और उनकी खामोशी बहुत कुछ बयां करती है कि आखिर यह सब किसकी शह पर हो रहा है और देश में बैठे हुक्मरान अगर इन हिंसा की आग पर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं तो यकीनन भारत का भविष्य किस ओर जायेगा यह किसी से नहीं छिपेगा। आज भारत में जो हो रहा हैं वह किसी से छिपा नही हैं।

खासकर विदेशी मीडिया भारत पर लगातार नजर बने हुए हैं। सोशल मीडिया पर खबरों की पहुंच सर्वव्यापी हो चुकी है। भारत जिस तरीके से अंदरूनी कलह से झुलस रहा हैं। उस पर आर्थिक रूप से समृद्व होने के लाले भविष्य में कभी भी पड़ सकते हैं।


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