Monday, March 16, 2026
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जिंदगी न मिलेगी दोबारा, जेनेरिक पर आईएमए ने चढ़ाई आस्तीन

  • प्राइवेट डाक्टर्स के लिए इंडियन मेडिकल काउंसिल की अनिवार्यता नहीं मंजूर
  • डाक्टर्स का तर्क इलाज सस्ता करना है तो मेडिसिन कीमत कंट्रोल पर ध्यान दे सरकार
  • सरकार की दो टूक, यदि प्रैक्टिस करनी है तो जेनेरिक दवाएं लिखनी ही होंगी जरूरी
  • प्रिस्क्रिप्शन में जेनेरिक दवाएं न लिखने पर सजा के अलावा प्रैक्टिस का लाइसेंस निरस्त करने की चेतावनी

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मरीजों को सस्ता इलाज के नाम पर सरकारी के साथ अब प्राइवेट डाक्टर्स को भी जेनरिक दवाओं की अनिवार्यता पर आईएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) ने आस्तीन चढ़ा ली हैं। आईएमए का तर्क है कि मरीज की जिंदगी की कीमत पर कोई भी समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिंदगी ना मिलेगी दोबारा। आईएमए व हॉस्पिटल बोर्ड आॅफ इंडिया ने जेरेरिक दवाओं की अनिवार्यता को लेकर सरकार की कथित जिद्द के इतर तर्क दिया है कि जिन जेरेरिक दवाओं की पैरवी की जा रही है, उनको लेकर जल्दबाजी किया जाना मुनासिब नहीं।

जहां मरीज की जीवन रक्षा का प्रश्न है तो किसी भी चिकित्सक की पहली प्राथमिकता उसके मरीज का स्वास्थ्य व जीवन बचाना होता है, मरीज की जिंदगी जब दांव पर लगी हो तो फिर दवा की की कीमत न तो डाक्टर देखते हैं ना ही मरीज के तीमारदार। दोनों का ही प्रयास होता है कि भले ही कितना ही खर्च क्यों न हो जाए मरीज ठीक हो जाए और उसकी जिंदगी बच जाए।

तनातनी बढ़ने की आशंका

सस्ती दवाओं के नाम पर जेरेरिक दवाओं की सरकार की जिद्द और आईएमए के मरीज को जिंदगी न मिलेगी दोबारा, इसलिए सस्ते इलाज के नाम पर जेनेरिक का रिस्क नहीं के आदर्श वाक्य के चलते आने वाले दिनों में इस मामले को लेकर तनातनी से इंकार नहीं किया जा सकता। आईएमए मरीज बचाना पहली प्राथमिकता है। इसके लिए किसी भी कंपनी की दवा प्रिस्क्रिप्शन में लिखने में कोई हिचक नहीं। जानकारों का मानना है कि ऐसी स्थिति में आने वाले दिनों में तनातनी के आसार नजर आ रहे हैं।

सजा के साथ डाक्टर का लाइसेंस भी होगा निरस्त

प्रिस्क्रिप्शन में जेनेरिक दवाएं अनिवार्य रूप से लिखने पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन तैयार नहीं है। आईएमए ने इसकी अनिवार्यता को लेकर राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) के नियमों को वापस लेने की मांग की है। आईएमए का कहना है कि सभी दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित होने तक इस नियम को अनिवार्य न रखा जाए।

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आईएमए और इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस के सदस्यों ने इसको लेकर पूर्व में स्वास्थ्य मंत्री से मुलाकात की थी और एनएमसी के नियमों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की थी। वहीं एनएमसी ने अपने पंजीकृत चिकित्सकों के आचरण से संबंधित विनियमों में कहा है कि सभी डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखनी होंगी, ऐसा न करने पर उन्हें सजा मिलेगी और उनका लाइसेंस भी एक अवधि के लिए निलंबित किया जा सकता है।

ऐसे हुई फसाद की शुरुआत

इस सारे फसाद की शुरुआत तब हुई जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जेनेरिक दवाएं लिखने की अनिवार्यता को लेकर एक आदेश जारी कर दिया। सरकार का का तर्क है कि सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों की तर्ज पर प्राइवेट डाक्टर भी मरीजों को ज्यादा से ज्यादा जेनेरिक दवाएं ही लिखें, ताकि मरीजों को सस्ता इलाज मिल सके। इसके लिए सरकार ने जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कराने को जगह-जगह प्रधानमंत्री जन औषधी केंद्र भी खोले हैं। यह भी कहा गया कि जेनेरिक भी वहीं काम करती है जो ब्रांडेड कंपनी की महंगी दवा काम करती है।

जल्दबाजी न करें सरकार

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के स्टेट प्रेसिडेंट डा. अनिल श्रीवास्तव का कहना है कि जेरेरिक को लेकर सरकार का रूख मुनासिब नहीं है। बेहतर यह होगा कि जेनेरिक दवाओं के रिसर्च व उनके परिणाम को सामने आने दिया जाए।

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जहां तक सस्ता इलाज की बात है तो जो ब्रांडेड कंपनी है उनकी कीमत कम कराना सरकार के नियंत्रण में है। ब्रांडेड कंपनी की महंगी दवाओं का दाम कम कर भी सरकार लोगों को सस्ता इलाज मुहैय्या करा सकती है।

डाक्टर के लिए मरीज का जीवन पहले

हॉस्पिटल बोर्ड आॅफ इंडिया के स्टेट सेक्रेटरी डा. शिशिर जैन प्रिस्क्रिप्शन में जेनेरिक दवाओं की एनएमसी की अनिवार्यता के रूख से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि जब कोई मरीज नाजुक अवस्था में लाया जाता है तो परिजन एक ही बात कहते हैं

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इसको बचा लीजिए दवा कितनी भी महंगी क्यों न हो चिंता ना कीजिए। डाक्टर के लिए सामने जब मरीज की जिंदगी दांव पर लगी हो तो उस वक्त दवा के मूल्य को नहीं देखा जा सकता।

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