Tuesday, March 17, 2026
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जल बचाना ही आज की प्राथमिकता

Nazariya 22


दुनिया का 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से घिरा है। बावजूद इसके पीने योग्य पानी लगभग 3 फीसदी ही है। बढ़ती जनसंख्या व औद्योगिकीकरण के चलते दुनिया पीने योग्य पानी की कमी का समाना कर रही है। पानी की बबार्दी व जल प्रदूषण को रोकना आज विश्व नागरिक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। जल के महत्व को समझाने व स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में रियो डि जेनेरियों में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में विश्व जल दिवस मनाने की पहल की थी। साल 1993 ई. से प्रति वर्ष विश्व जल दिवस मनाया जाने लगा। विश्व जल दिवस ताजे पानी के प्रति व जल संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए मनाया जाता है। भारत के लोग भी पीने योग्य स्वच्छ पानी की कमी से जूझ रहे हैं। रेगिस्तानी इलाकों में पानी की किल्लत आम बात है। केंद्र सरकार ने हर नल जल योजना के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ जल पहुंचाने के लिए एक अच्छी पहल की शुरुआत की है। सरकार का काम है हर घर में स्वच्छ जल की आपूर्ति सुनिश्चित करना लेकिन नागरिक दायित्व है कि उस जल को जरूरत के हिसाब से ही खर्च करना।

भारतीय संस्कृति में जल को देवता के रूप में प्रतिष्ठा दी गई है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लिखा है कि ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच तत्व से बना शरीरा’। यानी कि शरीर निर्माण में जल एक प्रमुख तत्व है। इसीलिए कहा जाता है कि जल ही जीवन है। बिना जल के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। धरती पर मौजूद सभी सजीव प्राणियों के जीवन का आधार जल ही है। लेकिन विडंबना इस बात की है कि जो हमारे जीवन का आधार तत्व है उसके प्रति हम उतने ही उदासीन होते चले जा रहे हैं। परिणाम स्वरूप जल संकट पूरी दुनिया के लिए एक मुसीबत बनता जा रहा है। कहा तो यह भी जाता है कि जल संकट से विश्व युद्ध का भी खतरा है। जल को स्वच्छ रखना और उसकी हिफाजत करना नागरिकों की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। जल अमूल्य प्राकृतिक संसाधन है। जल को उपभोग की चीज नहीं है क्योंकि जो उपभोग की चीज है उसके प्रति दोहन का भाव पैदा होता है। बड़ी बड़ी कंपनियां महंगे दामों में बोतल बंद पानी बेचने के व्यवसाय कर रही हैं।

दुनिया भले ही पिछले 30 वर्षों से जल दिवस मना रही हो भारतीय संस्कृति में सदियों से जल के महत्व और उसके संरक्षण पर जोर दिया गया है। धार्मिक अनुष्ठानों में जल को विशेष महत्व दिया गया है। तुलसी ने रामचरित मानस में दिखाया है कि रामराज्य में सभी नदियों में निर्मल जल बहता रहता है इससे मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु पक्षी भी सुखपूर्वक जीवनयापन करते हैं। वे मानस के बालकांड में लिखते हैं कि ‘सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं’। नदियों को जीवनदायिनी इसीलिए कहा गया है। आज नदियां सूखती जा रही हैं। तालाब और कुओं का अस्तित्व मिट गया है। सरकारी उपक्रम से जो तालाब बनवाएं जा रहे हैं उसमें पानी ही नहीं हैं। वर्षा जल संचय का प्रबंधन बेहद कमजोर हैं। भू जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। जैसे धरती को बढ़ाया नहीं जा सकती है। उसी तरह जल को बढ़ाया नहीं जा सकता है। हम उसका संरक्षण करके बचा सकते हैं। अपनी अवश्यकतानुसार जल का प्रयोग कर उसकी हिफाजत कर सकते हैं।
धरती पर मौजूद प्राकृतिक संसाधनों पर आने वाली पीढ़ियों का अधिकार है। हमें अपनी जरूरत के हिसाब से ही जल की खपत करनी चाहिए। तमाम अध्ययन बताते हैं कि लोग अपनी जरूरत से ज्यादा पानी बर्बाद करते हैं। पानी बबार्दी को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर संवेदनशीलता पैदा करना बेहद अनिवार्य हो गया है। गोस्वामी जी मानस के उत्तरकांड में रामराज्य का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि ‘सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी। सागर निज मरजादां रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं। सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा’। रामराज्य की शोभा का बखान करते हुए तुलसीदास जी नदियों, तालाबों का वर्णन करना नहीं भूलते हैं। तालाबों व नदियों में जल की शोभा से सभी प्राणियों में प्रसन्नता है। समुद्र की विकरालाता से सब परिचित हैं। समुद्र में आने वाली सुनामी भारी जन धन की बर्बादी कर तबाही मचा देती है। लेकिन रामराज्य में समुद्र भी अपनी मर्यादा में है। यही प्रकृति का संतुलन है। इस्लाम में कहा गया है कि अगर दरिया किनारे पर भी हो, तो उतना ही पानी खर्च करो, जितने की जरूरत है।

मनुष्य अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर प्राकृतिक आपदाओं को आमंत्रण देता है। मनुष्य पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली अपनाकर पर्यावरण संतुलन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है। धरती पर जल सीमित प्राकृतिक संसाधन है। इसे जिम्मेदारी के साथ खर्च करना मानवीय कर्तव्य है। जिस देश में निर्जला व्रत रहने तथा उपासना के समय जल चढ़ाने तथा नदियों को मां के समान मानकर पूजा करने की समृद्ध परंपरा रही हो वहां तो जल को बर्बाद करना एक अधर्म कार्य माना गया है। इसलिए विश्व जल दिवस औपचारिकता नहीं बल्कि जल संरक्षण का संकल्प लेकर आता है। चैन्नई पहले से ही डार्क जोन में है। बेगलरू से पानी की किल्लत की कमी लगातार आ रही है। जल ही जीवन है। अगर जल ही नहीं बचेगा तो जीवन कैसे बचेगा। यह बात हर किसी को ध्यान में रखी होगी। पानी बिन सब सून है।


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