
उत्तर प्रदेश के हाथरस में सत्संग समापन के बाद मची भगदड़ में कई लोगों की जान चली गई। इस घटना ने न केवल विचलित किया है, बल्कि ऐसे आयोजनों को लेकर कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। सिकंदराराऊ के निकट फुलराई गांव में कथित बाबा नारायण दास उर्फ भोले बाबा का एकदिवसीय सत्संग शिविर का समापन कार्यक्रम चल रहा था। जैसे ही बाबा का काफिला शिविर से निकला बाबा के अनुयायियों ने भीड़ को बाहर निकलने से रोक दिया। तेज गर्मी और उमस भरी दोपहर में श्रद्धालु घर जाने को आतुर थे और देखते ही देखते भीड़ इस कदर भगदड़ में तब्दील हो गई कि जो नीचे गिरा वह दोबारा उठ नहीं पाया। बिडम्बना देखिए कि जो बाबा खुद को भगवान मानता है, लोगों को जीवन दान देने का दावा करता है। वही इन मौत की वजह बन गया। खुद को गरीबों का मसीहा बताने वाले बाबा घटना के बाद से फरार हैं। यहां तक की मासूम लोगों की चीख पुकार सुनने के लिए प्रशासन की व्यवस्था भी माकूल नहीं थी। बाबा के शिविर स्थल पर लाशों का अंबार लग गया। लोग अपनों की तलाश में रोते बिलखते दिखे। घटना का मंजर कितना दर्दनाक रहा होगा कि इस घटना को देखकर एक पुलिस कांस्टेबल की हार्ट अटैक से मौत हो गई। इतनी मौतों के बाद भी बाबा का एफआइआर में नाम न होना चौंकाता है और बताता है कि बाबाओं से सरकारों का क्या रिश्ता रहता है। इंटरनेशनल जर्नल आॅफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन के अध्ययन की मानें तो भारत में भगदड़ के 79 फीसदी मामले धार्मिक सभाओं या तीर्थ यात्राओं के दौरान होते हैं। किसी भी धार्मिक सभा के आयोजन से पूर्व प्रशासन से अनुमति लिए जाने का नियम है तो फिर क्यों ऐसे आयोजनों में नियमों की अनदेखी की जाती है? ऐसे हादसों के कारण इन आयोजनों में सुरक्षा उपाय की अनदेखी पर सवाल उठाते हैं? सवाल तो यह भी है कि 17 साल पहले पुलिस की नौकरी छोड़ कथा वाचक बने बाबा में ऐसा क्या सम्मोहन था कि उत्तर प्रदेश ही नहीं मध्य प्रदेश, हरियाणा तक के श्रद्धालु भारी संख्या में बाबा की एक झलक पाने के लिए पहुंच गए?
इस घटना के बाद प्रशासन द्वारा जांच, मुआवजा और कार्रवाई की बात कही जा रही है लेकिन उन परिवारों का क्या जिन्होंने अपनों को खोया है? क्या मुआवजे का मरहम उन परिवारों का दर्द भर पाएगा? सवाल तो यह भी है कि इतने बड़े आयोजनों में पुलिस प्रशासन की कोई जवाबदेही नहीं होती क्या? क्या पुलिस प्र्रशासन को नहीं देखना चाहिए था कि जहां आयोजन हो रहा है, वहां की व्यवस्था कैसी है? सुरक्षा के प्रबंध कैसे हैं? जाहिर सी बात है कि हर घटना की तरह इस हादसे की भी लीपापोती शुरू कर दी गई है। तभी तो इतनी मौत के दोषी बाबा के नाम पर एफआईआर तक दर्ज नहीं की गई। क्या बिना राजनीतिक संरक्षण के ऐसे बाबाओं की दुकान फल- फूल सकती है। सवाल बहुतेरे है लेकिन जवाब किसी के पास नहीं। सवाल तो यह भी है कि ऐसे हादसों के हो जाने के बाद ही पुलिस प्रशासन क्यों जगाता है? क्यों पिछले हादसों से जिम्मेदार कोई सबक नहीं सीखते। सैकड़ों की संख्या में हुई मौत का जिम्मेदार आखिर कौन है? क्या किसी की कोई जवाबदेही तय नहीं की जाएगी? क्या इतनी मौतों का जिम्मेदार कोई नहीं?
भारत में धार्मिक आयोजनों में इस तरह के हादसों की एक लंबी फेहरिस्त है। बीते दिनों मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के बेलेश्वर महादेव मंदिर में रामनवमी के दिन एक बावड़ी की छत ढहने से 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के समय वहां धार्मिक आयोजन चल रहा था। उसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे। इससे पहले जनवरी 2022 में वैष्णो देवी मंदिर में मची भगदड़ में 10 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। अक्तूबर 2018 में पंजाब के अमृतसर में दशहरे पर रावण दहन को देखने में भीड़ रेलवे ट्रैक पर आ गई। इस दौरान ट्रेन की चपेट में आकर 60 लोगों की मौत हो गई थी। इसी तरह से अप्रैल 2016 में केरल के कोल्लम में एक मंदिर में आग लगने से 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। धार्मिक स्थलों में लोग अपने परिवार के साथ सलामती की दुआएं मांगने जाते हैं लेकिन जब धार्मिक स्थल ही मौत की रंग भूमि में तब्दील हो जाए तो फिर व्यवस्था और व्यवस्थापक दोनों पर ही सवाल उठना लाजिमी है। वैसे भी धर्म भगवान बनने की इजाजत नहीं देता, लेकिन कुछ तथाकथित लोग भगवान बनने और सबकुछ ठीक कर देने का ढोंग रच रहे हैं और ताज्जुब की बात है कि देश की अधिकांश जनसंख्या भी ऐसे बहकावे में आ रही है। यही वजह है कि लोगों की जान इतनी सस्ती हो चली है। कभी भगदड़ से तो कभी प्रशासन की बदइंतजामी की वजह से ही इस तरह के हादसे होते हैं। प्रशासन व सरकार चंद रुपयों का मरहम लगाकर उनकी मौत की कीमत चुकाने की कोशिश करती हैं। उनकी मौत पर मुआवजे का ऐलान करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है। ऐसे में सचेत स्वयं को करना होगा, वरना धर्म के धंधेबाज अपना व्यवसाय यूं ही चलाते रहेंगे और लोगों की जान यूं ही जाती रहेगी। जनता भी खामोशी से सब देखती रहेगी।


