Sunday, May 31, 2026
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जनसंख्या नियंत्रण को उठाने होंगे कठोर कदम

Samvad 50

 


ramesh thakurबढ़ती जनसंख्या का मुद्दा नि:संदेह चिंतनीय है और सियासी रूप से चुभने वाला भी? केंद्र सरकार इसपर कोई कठोर निर्णय ले भी ले, तो हंगामा कटना भी स्वाभाविक है, जो पूर्व में देखने को भी मिला। पर, सौ आने सच है कि जनसंख्या विस्फोट बिना सरकारी सख्ती से थमने वाला नहीं? हालांकि कोशिशें बहुतेरी हुर्इं, लेकिन सभी विफल साबित हुईं। अनुमानित करीब 140-150 करोड़ के बीच लोगों की विशाल आबादी के साथ हमारा देश अव्वल पायदान पर खड़ा हो गया है। ये आंकड़ा किसी को भी चैन से सोने नहीं देता। सोचने पर मजबूर करता है कि आगे होगा क्या? इसलिए ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ के मायने को खासकर प्रत्येक हिंदुस्तानियों को समझना अति आवश्यक है। भारत में जनसंख्या की फुलस्पीड ने चीन को भी पछाड़ दिया है। 2011 से अधिकृत जनगणना भारत में नहीं हुई, जब होगी तो उसके आंकड़े भी बुखार चढ़ाएंगे। जनसंख्या 150 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। इतनी आबादी के लिए भारत की धरती भी कम पड़ेगी। आज विश्व जनसंख्या दिवस है जो सालाना 11 जुलाई को मनाए जाने वाला सार्वजनिक रूप से सामुहिक और संयुक्त सरकारी व सामाजिक कार्यक्रम है जिसका मकसद युद्वस्तर पर बढ़ती जनसंख्या पर वैश्विक में चेतना जागृत करना मात्र है। इस दिवस का आयोजन वर्ष 1989 में संयुक्त राष्ट्र की गवर्निंग काउंसिल द्वारा आरंभ किया गया था। विभिन्न मुल्कों में आज तमाम कार्यक्रमों के जरिए जनमानस को जनसंख्या के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता किया जाएगा। जैसे कि परिवार नियोजन, लिंग समानता, गरीबी, मातृ स्वास्थ्य और मानव अधिकारों के प्रति चेताना। संयुक्त राष्ट्र ने नवंबर 2022 के मध्य तक विश्व की जनसंख्या 8.0 बिलियन होने का अनुमान लगाया था। लेकिन ये आंकड़े उससे पहले ही पूरा हो गया। डॉ0 केसी जकारिया को ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ का जनक माना जाता है।

इस समय सबसे अधिक जनसंख्या वाले 10 देशों में भारत टॉप पर है। बाकी, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, ब्राजील, नाइजीरिया, बांग्लादेश, रूस और मैक्सिको हैं। मौजूदा वक्त में विश्व के करीब 156 देशों के बराबर जनसंख्या केवल भारत में हैं। भारत के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश जिसकी अकेली की आबादी दो पड़ोसी मुल्क नेपाल और पाकिस्तान के बराबर है। इसलिए विश्व जनसंख्या दिवस समारोह एक दिन के आयोजन से कहीं आगे बढ़कर वैश्विक जनसंख्या वृद्धि की चुनौतियों और अवसरों पर वैश्विक संवाद और कार्रवाई को बढ़ावा देता है। ये दिन जनसंख्या संबंधी मुद्दों को समग्र और टिकाऊ तरीके से संबोधित करने की आवश्यकता की एक महत्वपूर्ण याद दिलाता है। जागरूकता बढ़ाने और कार्रवाई को बढ़ावा देने के जरिए, यह दिन संतुलित और न्यायसंगत भविष्य हासिल करने के वैश्विक प्रयासों में योगदान भी देता है।

जनसंख्या वृद्धि का प्रबंधन पर्यावरणीय स्थिरता की जटिलता से भी जुड़ा है। समुचा संसार जनसंख्या से जुड़ी चुनौतियों को पहचानने और उनका समाधान करने का दम तो भरता है। लेकिन कदम बीच रास्तें में ही रूक जाते हैं या फिर रोक दिए जाते हैं। संसार में बीते दो दशकों में जितनी आबादी बढ़ी, उतनी पहले कभी नहीं? जनसंख्या बढ़ोतरी की गति अगर यूं ही बरकरार रही, तो जमीन और संसाधनों को छीनने के लिए लोग एक-दूसरे के जान के प्यासे होंगे। कमोबेश, ऐसी स्थिति बननी भी आरंभ हो गई हैं। पार्किंग को लेकर झगड़ा आम हो गए हैं। आवसीय घर और जंगल तो कम पड़ते ही जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या के चलते बेरोजगारों की बड़ी फौज हर मुल्क में खड़ी है। कुलमिलाकर आधुनिक समय में पनपी हर समस्या की जड़ एक ही है और वो है जनसंख्या? इस नासूर समस्या से कैसे निपटा जाए, कौन सा रास्ता खोजा जाए? इसके लिए हुकूमत को गंभीरता से सोचना होगा। बिना सरकारी सख्ती से बात नहीं बनने वाली? अकल्पनीय निर्णय जैसे जम्मू-कश्मीर से जब धारा 370 हटी, तब लोगों में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर भी उम्मीदें जगी। केंद्र सरकार ने काम आगे बढ़ाया भी था, लेकिन विरोध इतना जबरदस्त शुरू हुआ, जिससे कदम पीछे खींचने पड़े, लेकिन केंद्र के एजेंडे में ये मुद्दा अब भी विचारणीय है।

इस सब्जेक्ट पर वैश्विक जागरूकता की दरकार है। जनसंख्या के पहिए को रोकने के लिए वैश्विक सहयोग की जरूरत है। जो साझा जनसंख्या चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और साझेदारी को बढ़ावा दे सके। जनसंख्या नियंत्रण को लेकर भारत में कुछ विसंगतियां और भ्रम की स्थितियां भी हैं। एक वर्ग नहीं चाहता कि ऐसा कोई कानून अमल में आए जिससे उन्हें बच्चों को पैदा करने से तौबा करना पड़े। जबकि, पढ़ा लिखा समाज नियंत्रण का पक्षधर है। फिर चाहे वो हिंदू हो या कोई अन्य धर्म-जात का। इसके लिए केंद्र सरकार को 370 की भांति बोल्ड निर्णय लेना होगा। आज के खास दिवस पर आयोजित समारोह में मानवाधिकारों, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों और प्रजनन अधिकारों को बनाए रखने के महत्व पर भी प्रकाश डाला जाता है। स्वैच्छिक परिवार नियोजन सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने से व्यक्तियों को अपने स्वास्थ्य और कल्याण के बारे में सूचित करने का विकल्प और अधिकार भी प्रदान होते हैं, जिनमें समग्र सामाजिक सशक्तिकरण में योगदान भी निहित होते हैं। जनसंख्या नियंत्रण काननू की दिशा में केंद्र सरकार को तेजी से कदम बढ़ाने ही होंगे। वरना, स्थिति अनियंत्रित हो जाएगी।


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