
संविधान पर हुई बहस में प्रधानमंत्री मोदी लगभग दो घंटा बोले मगर ठीक वही बात नहीं बोले जो बोलनी थी। लोकसभा में अपने कुल 110 मिनट के प्रवचन में उन्होंने दसों दिशाओ में हाथ फैलाए, पांव चलाये मगर उस असली 11 वीं मध्य दिशा के पास तक नहीं फटके जो पूरी चर्चा का मध्य था। होता है, जब सच छुपाना होता है तो झूठ के साथ-साथ बहुत कुछ ऐसा आंय-बांय-सांय भी बताना होता है जिसका कोई पता, सिरा नहीं होता। खासतौर से तब जब बात उस उठाईगीरी और सेंधमारी की हो रही हो जो खुले खजाने और दिनदहाड़े की जा रही है। विडंबनाओं की स्थिति ही नहीं होती उसकी धजा और आडम्बर भी होते हैं, उसकी भाषा और व्यंजनायें भी होती हैं। यही थीं जो पूरी निर्लज्जता के साथ भारतीय संसद के दोनों सदनों में कुल 4 दिन चली उस बहस के समाहार में दिए गए इधर मोदी के भाषण और उधर अमित शाह द्वारा की गयी उनकी खराब कार्बन कॉपी में नुमायां थे। जिसे संविधान के लागू किये जाने की 75 वीं सालगिरह के मौके पर किया गया था। ऐसा होना लाजिमी भी था-बहस संविधान के महत्त्व और इस देश को रहने योग्य बनाने में उसके योगदान पर हो रही थी और सत्ता ऐसे संगठन की राजनीतिक भुजा के बाहुपाश की जकड़न में है जो इस संविधान के ही खिलाफ है।
लोकतन्त्र को रूप और सार, सिद्धान्त और बर्ताव दोनों ही तरीकों से चोटिल किया जा रहा है। संसदीय लोकतंत्र में होने वाले चुनाव शेक्सपीयर की दुखान्तिकाओं-ट्रेजेडीज-को पीछे छोड़ चुके हैं तो उनके जरिये चुने जाने वाले निकाय संसद और विधानसभाओं को मुम्बईया फिल्म वेलकम जैसी त्रासद कामेडी में बदला जा चुका है। इनमें जिसके लिए वे चुनी जातीं हैं को छोड़कर बाकी सब किया जा रहा, जो बोला जाना चाहिए उसे छोड़कर बाकी सब गरल, तरल और अनर्गल बोला और कहा जा रहा है। असहमति जताने, संगठित होने, विरोध करने और मांग उठाने के लिए जलूस, सभा, प्रदर्शन करने के संविधान में लिखे मूलभूत अधिकार लिखा पढ़ी में अभी भी है मगर बस लिखापढ़ी में ही हैं। थानेदार और तहसीलदार जैसे अदने अफसर तक उन्हें खूंटी पर टांग कर अंग्रेजी राज की मनमानी को भी पीछे छोड़ रहे हैं, उन्हें बेमानी और निरर्थक बना रहे हैं।
धर्मनिरपेक्षता, जो धर्म को राज करने या राजनीति का आधार न बनाने की सदियों पुरानी परम्परा का आधुनिक सूत्रीकरण है, आजाद भारत का तानाबाना है, की तो जैसे खाट खड़ी करके वाट ही लगाई जा रही है। धीमी तीव्रता के साथ आगे बढ़ने के रास्ते को छोड़कर अब यह कुनबा सीधे सप्तमसुर में रौद्र रस के समूहगान तक आ गया है। किसी भी धर्म, पूजा परम्परा को मानने या न मानने का मूलभूत अधिकार देने वाले संविधान की शपथ लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने मोहन यादव ने ऐलान कर दिया है कि अब वे ‘छाती पर पांव रखकर राम और कृष्ण की बात सुनायेंगे और उन्हें सुननी पड़ेंगी’ तक आ गए हैं। सारे सरकारी दफ्तरों, थानों और चौकियों में मूर्तियां पधराने के बाद कुछ करोड़ रुपये खर्च करके अपनी राजधानी के राजभवन में विशाल मन्दिर का निर्माण कर संवैधानिक समझ का तर्पण करने पर आमादा है।
लोकसभा में प्रधानमंत्री, राज्यसभा में गृह मंत्री सारी संवैधानिक और संसदीय मर्यादा को ताक पर रखकर सीधे-सीधे मुस्लिम विरोधी नफरत भड़काने वाले भाषण दे रहे हैं। अब तो न्यायपालिका को भी इसी संविधान विरोधी मुहिम के विनाश रथ में जोत दिया गया है। चन्द्रचूड़ी गोलमाल की अंगुली पकड़ कर छुटकी अदालतों द्वारा अपनी न्यायिक सीमाओं से बाहर जाकर ‘मस्जिद के नीचे क्या है, दरगाह के पीछे क्या है’ का खतरनाक खेल जैसे काफी नहीं था-इसलिए अब हाईकोर्ट जज भी खो-खो खेलने उतार दिए गए हैं। जज शेखर कुमार यादव के विश्व हिन्दू परिषद की सभा में जाकर दिए ‘कठमुल्ला’ और ‘अब तो बहुसंख्यकों के हिसाब से देश चलेगा’ जैसे घोर संविधान विरोधी और आपराधिक बयान से पल्ला झाड़ने की दिखावे की औपचारिकता भी नहीं की जा रही; खुद योगी आदित्यनाथ उसकी सराहना करते घूम रहे हैं। और इस जज की आलोचना को ‘सत्य बोलने वाले को धमकाया जाना’ करार दे रहे हैं।
कॉरपोरेट नियंत्रित गोदी मीडिया पहले ही विषाणुओं के सतत प्रवाह का जरिया बनाया जा चुका था अब कार्यपालिका, विधायिका का साम्प्रदायिकीकरण और असंवैधानिकीकरण किया जा रहा है। संविधान की एक और खूबी, बहुभाषी, बहुविध भारत की एकता को अक्षुण्ण बनाये रखने वाली खूबी उसका राज्यों का एक संघ होना, घोषित रूप से संघीय गणराज्य होना है। मोदी राज में राज्यों के अधिकारों को कम से और कमतर करते-करते अब ‘एक देश एक चुनाव’ के नाम पर संघीय गणराज्य की पूरी समझदारी को उलट दिया जा रहा है। संविधान पर होने वाली बहस में इन सब पर चर्चा होनी चाहिए थी। इस बात का गम्भीर आत्मावलोकन होना चाहिये था कि 75 वर्ष पहले लागू किये गए भारत के संविधान ने आगामी वर्षों में देश को जिस दिशा में ले जाने का रास्ता दिखाया गया था उस पर कितना चला गया? यदि नहीं चला गया तो अब उस दिशा में बढ़ने की क्या योजना बननी चाहिए। यह खुलासा होना चाहिए था कि संविधान की आत्मा कहे जाने वाले हिस्से भाग 3 और 4 का क्या हुआ?
संविधान के अनुच्छेद 36 से 51 तक में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में लिखे संपत्ति के केन्द्रीकरण को उलटने, अधिकतम और न्यूनतम आमदनी में 10 और 1 से अधिक का अंतर न होने देने, देश की आमदनी का वितरण ऊपर की बजाय नीचे की आबादी में करने और देश को समाजवाद की राह पर ले जाने के मंसूबे कहां तक पहुंचे आदि इत्यादि! बहस इस बात पर होनी चाहिए थी कि सबको शिक्षा सबको काम, समान काम के लिए समान वेतन और जमीन के बंटवारे, समाज की चेतना को वैज्ञानिक रुझान वाला बनाने के काम कहां तक पहुंचे।
मगर ठीक इन्हीं सबको तो छुपाना था इसलिए खाली-पीली गाल बजाये गए, झूठी उपलब्धियों के ढोल सुनाये गए। कुल जमा 110 मिनट के भाषण में जो 11 संकल्प-जो उन्होंने खुद नहीं लिए जनता और राजनीतिक पार्टियों के लिए गिनाये हैं-उनमें भी बेरोजगारी, महंगाई, खेती किसानी की बदहाली और मजदूरों की जिन्दगी की मुहाली, असमानता की चौड़ी से भयावह गहरी होती खाई जैसी देश और उसकी जनता की की प्रमुख समस्याओं का जिक्र तक नहीं है। संविधान का उल्लेख भी 7 वें नम्बर के संकल्प में है सो भी ‘संविधान का सम्मान हो और राजनीतिक स्वार्थ के लिए उसे हथियार न बनाया जाए’ जैसे द्विअर्थी सूत्रीकरण में है। असली अर्थ इन शब्दों के बीच है और वह यह है कि संविधान की रक्षा करने जैसी बातें करना इसे राजनीति स्वार्थ के लिए हथियार बनाना माना जाएगा। मोदी और शाह दोनों के भाषणों की खास बात यह थी कि इन दोनों ही ने मनुस्मृति से असंबद्धता जाहिर करना तो दूर उसका नाम नहीं लिया। यदि संविधान खतरे में पड़ता है या असुरक्षित होता लगता है तो उसे बचाने के लिए भी हम भारत के लोगों को ही मैदान में उतरना होगा।


